Monday, June 1st, 2020

शिव के राज में प्रदेश बना किसानों की कब्रगाह ?

- संजय रोकड़े -

sanjay-rokde-writer-sanjay-मध्यप्रदेश में किसानों के साथ अभी भी सत्ता पक्ष का रवैया दोगला ही है। इसी दोगलेपन के चलते प्रदेश में किसानों की ख़ुदकुशी और आंदोलन थमने का नाम ही नहीं ले रहा। अब किसानों ने होशंगाबाद जिले में रेलवे ट्रैक जाम कर अपना विरोध दर्ज किया है। इस विरोध-प्रदर्शन में सिवनी, बानापुर और तमाम मालवा अंचल के किसान शामिल थे। इतना सब कुछ होने के बावजूद शिवराजसिंह के कानों पर जूं तक नही रेंग रही है। अभी भी किसानों की ख़ुदकुशी का मामला थमने का नाम नहीं ले रहा। हर दूसरे दिन किसान खुदकुशी कर रहे है। गत 8 जून से अब तक राज्य में 17 किसान आत्महत्या कर चुके हैं जबकि देशभर में 35 किसानों की मौत की खबर है। प्रदेश में किसानों कीसबसे अधिक मौतें होने की खबरें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के गृह जिले सीहोर से आई है। सिहोर में सबसे अधिक किसानों ने आत्महत्याएं की है। पिछले 24 घंटे में शिवराज सिंह के विधानसभा क्षेत्र बुधनी में एक और सागर, टीकमगढ़, छतरपुर, छिंदवाड़ा और मंदसौर जिलों में 22 जून को पांच किसानों ने आत्महत्या की है। मुख्यमंत्री की बुधनी विधानसभा क्षेत्र के गुराडिया गांव में शत्रुघ्न मीणा ने जहर पीकर आत्महत्या कर ली। मीणा ने 21 जून को जहर पिया था। रिश्तेदारों के अनुसार उस पर 10 लाख का कर्ज था और कर्ज से परेशान होकर ही आत्महत्या की। काबिलेगौर हो कि शिवराज सिंह चौहान के गृह जिले सीहोर में इस महीने होने वाली यह छठवीं आत्महत्या है। इधर होशंगाबाद में भी 40 वर्षीय किसान बाबूलाल वर्मा ने खुद को आग के हवालेे कर दिया। इनके परिजनों की माने तो उसने एक साहूकार के उत्पीडऩ से तंग आकर यह कदम उठाया। बाबूलाल कर्ज की वजह से बहुत परेशान था। नरसिंहपुर जिले के 65 वर्षीय लक्ष्मी गुमास्ता ने भी कर्ज के चलते जहर खाकर जान दे दी है। मृतक किसान के परिजनों का कहना है कि उस पर चार लाख रुपये का कर्ज था जिसे वह लौटा नहीं पा रहा था। चर्चा है कि दो महीने पहले ही उसकी फसल आग लगने से तबाह हो गई थी, जिसका उसे मुआवजा तक नही मिला था। इसी तरह से सागर जिले में भी कर्ज के बोझ चलते एक किसान ने खुद को मौत के आगोश में समा लिया। इस किसान ने खुदकुशी से पहले लिखे सुसाइट नोट में लिखा था कि उसे साहूकार परेशान कर रहा था। छतरपुर जिले में नारायणपुर गांव के महेश तिवारी ने 22 जनू को अपने घर पर आत्महत्या कर ली, उन पर 2.5 लाख का कर्ज था। इसी प्रकार से 22 जून को ही टीकमगढ़ के ककरहवा गांव के सीकन कल्ला अहिरवार ने जहर खाकर अपनी जान दे दी। छिंदवाड़ा जिले में परासिया गांव के श्याम कुमार ने आत्महत्या कर ली। मंदसौर जिले में एक किसान ने कुएं में कूद कर जान दे दी। ये तो एक बानगी है प्रदेश में किसानों की आत्महत्या के मामलों की। यह प्रदेश किसानों की कब्रगाह बनता जा रहा है। जिस तरह से यहां किसान आत्महत्याएं कर रहे है वह, किसी आपात स्थिति से कम नहीं है। बावजूद इसके किसानों पर बढ़ते कर्ज और उनके साथ होने वाली जुल्म ज्यादतियों को नजर अंदाज कर शिवराज सिंह चौहान विपक्ष पर किसानों को भड़काने का आरोप लगाकर ये मानने को तैयार नही है कि वाकई किसान परेशान है। किसानों की मौतों व बदहाली को लेकर भोपाल से प्रकाशित एक दैनिक अखबार ने भी 23 जून को रिपोर्ट जारी की है, इस रिपोर्ट में साफ लिखा है कि पिछले 24 घंटे में प्रदेश में कर्ज से परेशान छह किसानों ने आत्महत्या कर ली है। मंदसौर गोलीबारी के बाद आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 26 हो गई है। इतनी मौतें होने के बाद भी मुख्यमंत्री बेवकूफ बनाने वाली नीति पर ही चल रहे है। किसान आंदोलन को शांत करने के लिए उपवास के दौरान जो वादे किए गए थे उन वादों पर भी अमल नही किया जा रहा है। किसानों का एक से दस जून तक का हिंसक आंदोलन बेनतीजा रहा। इस बीच सरकार ने किसानों को कोई राहत नहीं दी है, बजाय इसके कि पुलिस गोलीबारी में छह किसान मारे गए। किसानों की मौतों को लेकर प्रदेश सरकार के मंत्री नरोत्तम मिश्रा का जो बयान सामने आया है वह भी हास्यास्पद है। नरोत्तम कहते है कि किसानों की आत्महत्या का मामला दुखद और गंभीर है, लेकिन किसान केवल कर्ज के चलते नही मर रहा है इसके विभिन्न कारण हो सकते है। आत्महत्य का एक मात्र कारण कर्ज नही है। शिवराज सरकार पहले भी यह साबित करने की नाकाम कोशिश करती रही है कि किसान निजी अवसाद, पारिवारिक विवाद, वैवाहिक जीवन या घरेलू समस्याओं के चलते आत्महत्या करते हैं। सरकार ने तो आंदोलन के दौरान यहां तक कहा था कि हिंसक आंदोलन करने वाले लोग किसान नहीं हैं, वे उपद्रवी और अराजक तत्व हैं। शिवराज आज भी वही नादानियां कर रहे है जो किसान आंदोनल के समय की गई थी। इन्ही हरकतों के चलते किसानों का गुस्सा शांत होने का नाम नही ले रहा है। यही कारण है कि यहां के किसानों ने सरकार के विरोध बतौर योगासन न कर 'शवासनÓ किया। यह अनोखा विरोध प्रदर्शन प्रदेश सरकार द्वारा किसानों की समस्या पर ध्यान नही देने के चलते ही कई अंचलों में हुआ। इस मौके पर किसानों ने साफ कहा कि हम- योग के विरोध में नहीं है बल्कि प्रदेश सरकार की नीतियों के विरोध में है। हालाकि देश भर में सरकार के योग दिवस के विरोध में किसानों ने 'शवासनÓ करके अपना गुस्सा जाहिर किया है। हालिया किसान आंदोलन के चलते साफ संकेत मिले है कि शिवराज चूक रहे हैं और कांग्रेस किसानों की नब्ज पकड़ रही है। बेशक अभी प्रदेश में किसानों का आंदोलन शांत हो गया है लेकिन अभी भी राख के अंदर चिंनगारी बुझी नही है। अब जब भी ये चिनगारी धधकेगी तब यह सरकार को अपने आगोश में लपेटेगी। पहले से अधिक मुसीबत में ड़ाल देगी और अब इसका असर दूर तक जाएगा। कुछ इस तरह कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को अशांत कर सकती है। जानकारों के मुताबिक अब यह सिर्फ पार्टी ही नहीं, बल्कि शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली सरकार के लिए भी खतरा साबित होगी। इधर 15 साल से राज्य की सत्ता से बाहर कांग्रेस और प्रदेश में उसका चेहरा-मोहरा बनने को तैयार ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए यह एक बड़े मौके की तरह सामने आएगी। शिवराज को किसानों की परेशानियों का गंभीरता का अंदाजा लगाना चाहिए। वर्तमान में मुरैना से सांसद और शिवराज की ही पिछली सरकार में मंत्री रहे अनूप मीडिय़ा से बातचीत में साफ कहते हैं, 'राज्य का खुुफिया तंत्र पूरी तरह असफल रहा है। शासन को आंदोलन की गंभीरता का अंदाजा होना चाहिए था लेकिन नही हुआ। मुख्यमंत्री से कुछ किसान नेताओं की मुलाकात और उनसे मिले आश्वासन के बाद शासन ने यह भरोसा कर लिया कि आंदोलन खत्म हो गया है जबकि ऐसा नहीं है। अभी भी किसान शांत नही है। अब अगर किसानों के बीच अशांति पैदा होती है तो इनकी आग की चपेट में हर कोई मरेगा। खैर। शिवराज अभी भी अपने वादों पर अमल की तरफ ध्यान नही दे रहे है। मुख्यमंत्री ने किसानों केे असंतोष को शांत करने के लिए उपवास के दौरान अनेक वादे किए थे लेकिन जैसे-जैसे वक्त टलते जा रहा है वैसे-वैसे वादों पर मिट्टी की परत चढ़ते जा रही है। बता दे कि मंदसौर गोलीकांड के मृतकों के परिवारों को सीएम ने पहले पांच लाख, फिर 10 लाख और इसके बाद बढा़कर एक करोड़ रुपए मुआवजा देने की घोषणा की थी लेकिन मुआवजे की यह रकम सरकारी नियम-कायदों के भंवर में उलझ कर रह गई है। इतनी बड़ी राशि देने का प्रावधान ही नहीं है। नतीजा यह हुआ कि अगले दिन मुआवजे का चेक दिला देने की घोषणा करने वाले शिवराज जब हादसे के आठ दिन बाद पीडि़त किसानों से मिलते है तब भी उनके हाथ खाली ही थे। यानी तब तक पीडि़तों को मुआवजा नहीं मिला था। यही नहीं, शिवराज ने उपवास तोड़ते समय ऐलान किया था कि समर्थन मूल्य से कम पर कृषि उपज खरीदने को कानून बनाकर अपराध की श्रेणी में शामिल किया जाएगा लेकिन उनकी इस घोषणा से व्यापारी वर्ग नाराज हो गया। विरोध के साथ ही यह वर्ग कृषि मंडियों में समर्थन मूल्य से कम पर ही उपज खरीद रहा है और सरकार कुछ नहीं कर पा रही है। कानून बनना-बनाना तो अभी दूर की कोड़ी ही साबित हो रहा है। अभी तो लोगों को शिवराज के उपवास पर ही अचरज हुआ कि जब सरकार शिवराज की, प्रशासन उनका, पुलिस उनकी तो फिर यह किसके खिलाफ और क्यों? और भी कई सवाल उठे लेकिन जल्द ही मीडिय़ा ने इनका भी जवाब ढूंढ लिया और शिवराज के रणनीतिकारों को धता बताते हुए पूरी पोल पट्टी खोल दी। इसमें पता चला कि न तो शिवराज के उपवास की घोषणा अचानक हुई न ही वह अनिश्चितकालीन था। सब कुछ सोच-समझकर योजनाबद्ध तरीके से मुख्यमंत्री और सरकार की छवि पर लगे दाग साफ करने की गरज से किया गया था। एक चैनल पर आई खबर के मुताबिक नौ जून को जब शिवराज सिंह चौहान उपवास की घोषणा कर रहे थे तो उसी समय मंदसौर गोलीकांड के पीडि़त किसान परिवारों के सदस्यों को स्थानीय नेता भोपाल लाने के लिए राजी करने में जुटे थे, ताकि वे वहां मुख्यमंत्री से उपवास तोडऩे के लिए आग्रह कर सकें। इन परिवारों को भोपाल लाया भी गया और कथित रूप से उनके आग्रह पर शिवराज ने अनिश्चित कालीन उपवासÓ 28 घंटे में खत्म कर दिया। इस तरह की ड्रामेबाजी से शिवराज बाज नही आ रहे है। मुआवजे में देरी और किसानों की आत्महत्याओं से शिवराज की किरकिरी और कांग्रेस की नई जमीन तैयार हो रही है। ज़ाहिर तौर पर मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस और फिलहाल उसकी अगुवाई करते दिख रहे सिंधिया के लिए ये चीजें सरकार के खिलाफ जमीन तैयार करने में मददगार साबित हो रही है। शिवराज की इसी कुनीति का फायदा उठाकर कांग्रेस और उसके नेता किसानों का हिमायती बनने का दम भर रहे है। कंाग्रेस किसानों की समस्याओं की तरफ सरकार का ध्यान दिलाने के लिए प्रदेश के हर जिले में सत्याग्रह कर रही है। कांग्रेस के मुताबिक यह लड़ाई तब तक चलेगी जब तक मंदसौर गोलीकांड के लिए जिम्मेदार पुलिसकर्मियों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज नहीं हो जाते और आंदोलन के दौरान गिरफ्तार 300 किसानों को छोड़ नहीं दिया जाता है। यानी किसान आंदोलन ने कांग्रेस ही नहीं सिंधिया को भी आगामी चुनाव के लिहाज से उम्मीद की किरण दिखाई है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि वे अगले एक साल में इस उम्मीद को जमीनी हकीकत में कितना तब्दील कर पाते है। फिलहाल इतना तो तय है कि शिवराज किसानों को लेकर उलझते जा रहे है और इस उलझन के लिए कोई और नही बल्कि वे स्वंय है। प्रदेश का आगामी विधानसभा चुनाव अगर शिवराज के नेतृत्व में लड़ा गया तो मुश्किलें कम नही होगी। अभी तो राज्य में हर तरफ खासकर भाजपा कि ओर से दबी जुबान से ये आवाजें आ रही है कि शिवराज को हटाओं भाजपा को बचाओं। इसमें भी दोराय नही है कि अब शिवराज के प्रति आम जनता, प्रदेश भाजपा संगठन और अफसरों के बीच अंदर खानों में विरोध प्रबल होते जा रहा है, ऐसे समय में अगर प्रदेश का मुख्यमंत्री भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय को बनाया जाता है तो कुछ हद तक प्रदेश का माहौल शांत हो सकता है। एक बार फिर राज्य में भाजपा की सरकार बनने में भी आसानी हो सकती है।

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sanjay-rokde-writer-sanjay-rokde.-story-by-sanjay-rokde-sanjay-rokde-social-thinkerपरिचय – :
संजय रोकड़े
पत्रकार ,लेखक व् सामाजिक चिन्तक
संपर्क – : 09827277518 , 103, देवेन्द्र नगर अन्नपुर्णा रोड़ इंदौर
लेखक पत्रकारिता जगत से सरोकार रखने वाली पत्रिका मीडिय़ा रिलेशन का संपादन करते है और सम-सामयिक मुद्दों पर कलम भी चलाते है।
Disclaimer : The views expressed by the author in this feature are entirely his  own and do not necessarily reflect the views of INVC NEWS.

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