शिव कुमार झा टिल्लू की 15 कविताएँ

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 शिव कुमार झा टिल्लू की 15 कविताएँ

* स्नेहलता बोस की टिप्पणी  :  प्रतिभा उम्र और किसी बंधन के मोहताज़ नहीं होते ,इस सहज कथन को यथार्थपरक रूप से शिव कुमार जी की कवितायें प्रमाणित करती हैं .इनकी कविताओं मेंअविकल भाव हैं , संत्रास है , आकुलता है,  मानो श्रृंगार , नीति और वैराग्य की गहराईयाँ हैं. ये समस्या के साथ समाधान भी दर्शातें हैं . मंच की छद्म लोकप्रियता की आश से विलग गंभीर भावों का अनुखन संयोजन आपकी काव्य-कुशलता है .आप मन और ह्रदय से नहीं वरेण्य आत्मा से रचना करते हैं ,  जहाँ आशुत्व का नैसर्गिक प्रवाह स्पष्ट दर्शित होता है .  नवकवितावाद के इस क्रांति युग में आप कही- कही परम्परा से जकड़े दिखाई तो देते है पर वह परम्परा समाज के लिए एक लक्ष्मण रेखा जैसी सिद्ध होगी  क्योंकि..”कितना भी आगे चले जाए ज़माना हमें तो पथ पर ही होगा चलना “.ऐसे कुशल कवित्व के नव सारथी में संभावनाएं दिखाई दे रही हैं  जो लुप्त हो रही अभिव्यंजनात्मक प्रगीत काव्य के रक्षार्थ आवश्यक  भी है!! शुभकामना !!

* स्नेहलता बोस

 शिक्षा श्री अवार्ड -2013 ” से पुरस्कृत शिक्षक व् साहित्यकार

 शिव कुमार झा टिल्लू की 15 कविताएँ

 1.  चिरयति करूँ  या  कविता लिखूँ

रीति छोह से आकुल गात
थी वो विकल अमावस रात
क्षण में  लोहित अचल प्रतिबिम्ब
मायावरण सुमनावलि  बिम्ब
मंजुल प्रीति की सौरभ रेखा
वैरागी मन ने कभी था देखा
तत्क्षण उस लंगड़े की गाथा
वक्र  खलक से ठनका माथा
दीन मौलवी घनघोर मचाए
दे बाबू !स्वर किसी को ना भाए
अपलक सोचता कैसी  दुनियाँ ?
दानवीर सब बन बैठे  बनियाँ
व्यापारी-वजीर  गठरी सहलाता
चाकर का भविष्य -निधि खाता
सोचते  उभरा मन में  एक चित्र
घटना अविरल कलुष विचित्र
रोजी चाहत में एक अवला आई
सेठ मत्त देख धवल तरुणाई
काम के बदले लूटा अस्मत
उसके अंश में कैसी किस्मत ?
इस गुनधुन में हो गया भोर
सुन विहग वृन्द के चहचह शोर
बिम्ब से बिम्ब टकराकर लुप्त
हुई आशु काव्य की किरण विलुप्त
भाव सदृश अदृश्य सा साया
क्यों मैं अंतर में  कवि मन पाया !
पर दुःख को हथियार बनाकर
अपने सुख का  का कल्प सजाकर
परबुद्धि -दुष्ट प्रतिक्षण गाते हैं
पर अपनी विपत्ति में पछताते हैं
जल विलग मीन  का अंतिम काल
देख पथिक पथ चला सकाल
ऐसे चितवन में रहकर मैं
क्या अश्रूपूरित नयन से देखूँ !
हाथ माथ पर लिए सोचता
शूलबेधित तन से क्या सीखूँ !
किंकर्तव्यविमूढ़ विषुवत  पर
चिरयति करूँ या कविता लिखूँ !!!

 2 कवि नहीं अग्निशामक हूँ

कवि नहीं अग्निशामक हूँ
नवकवितावादी की दृष्टि में
मृग-मारीच साहित्य भ्रामक हूँ ..
सुधि -श्रोता के समक्ष
मन के जेहन से गाता रहा
तालियों की गड़गड़ाहट में
अपने को भुलाता रहा
तब एकाएक कदम धंसा
जब कुटिल कांतिल आलोचक हंसा ..
प्रांजल कवि मन पर बज्र खसा
तीक्ष्ण शब्दवाण सुनकर
” गबैया ” का उच्छ्वास फंसा
यह जहान गोल कहाँ ?
आशुत्व का मोल कहाँ !!!!
उस अग्निशामक वाहन की तरह
अपने को एकात पाया
जो पूर्वा -चित्रा नक्षत्र में
क्षितिज़विहीन परिसर में
जंग से सड़ रहा
आर्थिक मन्दी के दौर में
किसी बीमार कम्पनी के
कार्मिक विभाग की तरह मर रहा…
मंच से उतरते ही
हुआ कवित्व बेहाल
प्रगतिवादी बने कराल
प्रयोगवादी छद्म आलोचना
का कर रहे तांडव …
मचा रहे भूचाल …
परम्परावादी कहकर …
भावहीनता का कलंक लगाकर
शिल्पक्षय का भय दिखाकर
प्रगीत काव्य को जला दिया
लयविहीन मुक्तक से
स्वरबद्ध छंद को गला दिया
परम्परा का इतना विरोध क्यों ?
आशु काव्य पथ पर
डेग-डेग अवरोध क्यों …
जब परंपरा से द्वेष है
मन में क्लेश है
आनुवांशिक अभियांत्रिकी करा लो
पिता बनकर संतान जन्मा लो
क्यों देते हो माता को कष्ट
कर दो युगधर्म परंपरा भ्रष्ट …
भावशिल्प साज को
अतुकांत के आवाज को
लेख तोड़कर पद्य बनाते रहो
गद्य काव्य सुनाते रहो
होगा साहित्य अनुगामी
आपका सन्देश दूरगामी
लेकिन याद रखना
जब भाषा होगी शुसुप्त
उस समय जलाना पड़ेगा
राग लय गति का प्रदीप्त
तत्क्षण याद आऊंगा
ढूँढ़ते रह जाओगे
हमें दूर पाओगे
तीक्ष्ण बैसाख की साख
जलाकर जब कर देगी राख
उस घड़ी यही सौतेली आशुपुत्री
लोक मंच बचाएगी
अग्निशामक वाहन की तरह
शीतल फुहार बरसाएगी
भाषा का गुण  गाएगी
सब का महत्व जानो
तुलसी रहीम पंत निराला
बच्चन -महादेवी की छाया का
दिनकर के इतिहास माया का
अंतर्मन से मूल्य पहचानो
रीति छोह की आह
अभिनंदन की चाह
भरमाओ नहीं बरसाओ
काव्य की आदि विधा
आशुत्व का प्रवाह …..

 3 एक आदर्श व्यक्तित्व

जब जब झाँकू अन्तः करण में
पुलकित होता अविरल गात
सहस्त्र जनो के तुम प्रतिपालक
हिय में बसते जैसे तात
समभाव दृष्टि से सबको देखा
सम्बल संजीव हो या उत्तम द्वारपाल
सुबह सबेरे सब की सुनते
प्रदीप परशुराम संग गोपाल
अमर दिवाकर मात्र दिवसपति
षष्टयाम् कर्मशील मेरे दिनेश
अल्पविरामी गांधी जैसे
कर्म अर्पण शाश्वत सन्देश
उच्च विचार आचरण सादा
मर्यादा के तनय प्रवीण
क्षण शीतल क्षण तप्त रेत सा
दीर्घकाल ना कांति मलीन
भौतिकता का विकल संत्रास नहीं
अंतर -बाहर एक समान
क्षण में हुए निलय पुनि वापस
अन्यत्र गए सहकर्मी महान
फीकी चाय झंटू के चूल्हे की
या हो आनंद का मशाला डोसा
चाकर- सहकर्मी के संग चखते
सुकू -लखन का लाल समोसा
शब्द विनम्र व्यवहार मित्रवत
नहीं माप सकता मैं लेखा
दीन सहचर को भी संग बिठाते
अहंकार का लेश ना रेखा
चले गए जो गुणधर्मी सहकर्मी
उनके ईमान को खूब संजोया
शिव प्रसाद के तात को लबलब
अर्थघट से सिनेह भिंगोया
चिरकालिक हो आपकी अर्चिस
काया स्वस्थ रहे प्रियवर
हो विष्णुप्रिया की निधि से संचित
भार्या संतति पूर्ण प्रखर

 4 परम्परावादिता

धरती आकाश
जूही पलाश
रागी कास
व्रत उपवास
अश्रु उच्छ्वास
दुर्गन्ध सुवास
देश प्रवास
इन नैसर्गिक चिंताओं से
भरा-परा  हमारा साहित्य इतिहास
परम्परावादिता का संत्रास
सीखने हेतु अनिवार्य ..
छद्म काल तक ..
नवकाव्यवाद ! प्रगतिवाद !! नवचेतनावाद  !!!
मात्र लेखनी में
कर्म तो वही प्रांजल ..
पिया देशान्तर की
अब क्यों करते चर्चा
प्रगीत को हास्यास्पद बना रही
हमारी वर्त्तमान  घिसी – पिटी काव्य
समझो ” चांदसी ” का पर्चा
अरे भाई ! अब चैट का ज़माना
इन वादिताओं से संज्ञान लेकर
नवल- धवल वाद बनाओ
क्यों अभी भी उलझा है ?
वृथा से बढ़कर सोचना होगा !
कॉर्पोरेट घराना बदल रहल …
सामाजिक उत्तरदायित्व
जैसे गंभीर  बिंदुओ पर सोच रहा
ग्लोबल वार्मिंग की चिंता
वाटर ट्रीटमेंट की सोच !!
हम माँ गंगे की पवित्र धारा में
लाश की राख डाल रहे !!!
एक बार मैंने
दिवाली में एक विस्फोटक पटाखा  जलाया था
गुरूजी आत्मा से दुखी हो गए
हमने तो ऐसी शिक्षा नहीं दी थी ?
अपने अंदर की ज्योति से
अलख को जगमगाओं वत्स !!!!
उस समय मुझे अटपटा लगा था ..
अब बीमारियों ने घेर लिया
दर्द की समझ आ गयी है
मैं भी तो एक दिन
समाज को बीमारी में
धकेल  रहा था
परम्परा मत .तोड़ो ..
मगर उनको छोडो …
जो समय से काफी पीछे छूट गए ..
हां परंपरा से स्नेह है
वांछित भी है !!!
उन्हें विुलप्त होती
परम्परा का नाम देकर
अजायबघर में सजाओ
मौलिक चिड़ियाखाना से निकालकर
हमारे विधान में बाबा साहेब ने
संशोधन के लिए  जगह छोड़ा था …
वो जानते थे ..
हर चीज की समीक्षा होनी चाहिए
हर कार्य का एक समय के बाद
मूल्यांकन प्रासंगिक है ..
नित्य नवीन शोध ..
क्या केवल विज्ञान-विधान  हेतु ..
जीवन के हर मोड़ पर
नवल दृष्टिकोण की जरुरत …
आर्य साहित्य को नवलवाद दो …
सन्तुलनता का वाद ..
प्रकृति के रक्षार्थ
जैव-अजैव सन्तुलनता !!!!!
नहीं तो साहित्य   क्या कहना
हमारी समस्त  जीवन लीला
हमारे गाँव की पाठशाला
दोनों सम्यक हो जाएगी ..
जहां सब कुछ है ….
मध्यान्ह भोजन है ..
मुफ्त की किताब है ..
गीत है संगीत है ….
मतलब पढ़ाई छोड़कर सबकुछ है ..
यही शिक्षा का स्तर है ..
हम सीसैट का प्रश्न भी ना समझ पाते ..
जो बिहार ..बुद्ध विहार..जैन आचार
नालंदा ..मिथिला …अंग ..
भोजभूमि की भूमि अनंग
आज यहाँ शिक्षा का
हो गया अंग-भंग
दूसरे की बात तो नहीं करना ..
क्या हमे  नहीं सुधरना.
यदि साहित्य समाज का दर्पण
तो फूटे दर्पण में मत देखो
अपना चेहरा अपना भाव
पीछेे से झाँक रही
अर्धांगिनी के कान्ति का ताव  ..
रीति-काव्य से
प्रेम गीत से
नार-पुआल से
गाँव के चौपाल से
आगे बढ़कर सोचो ..
साहित्य का रूप बदलो
साहित्य नहीं !!
ज्योति के स्रोत से
नवल ज्योति बनाओ
ज्योति का मूल
सर्वकामी है
शाश्वत  है
अर्चिस बदलो
आदित्य  नहीं
लेखन की मंशा बदलो
साहित्य नहीं !!

 5 “मॉडर्न ज़माना”

( स्वरचित मैथिली पद्य का हिंदी अनुवाद )
अनुवादक :शिव कुमार झा
साड़ी धोती मिल रुग्ण हुआ अब
घर-घर बरमूडा मिनी-स्कर्ट
आप भैया जी चुनड़ी ओढ़ें
भाभी पहनती रिमलेश -शर्ट
चाची मर्यादित बन बैठीं
चाचा गले में धर्म का बाना
नव-वधू के हाथ में बियर
कैसा यह मॉडर्न ज़माना ?
दिन भर की गिनती करूँ तो
छोटी वधू सात बार खाती
शाम प्रहर जब पति आते हैं
हाथ ब्रश लेकर उपवास बताती
अस्सी दशक में माँ से मम्मी
फिर मॉम अब हुई मम्मा
माँ के भाई का नाम क्या रखूँ ?
मामा पिघल बन गए झामा
अपने पुत्र ज्यादा प्यारा
विदेशी कुत्ता है अब लगता
पति -पुत्र बंगले में बैठे हैं
“टॉमी ” मैडम संग टहलता
चरण स्पर्श का श्राद्ध हुआ अब
छोटे बच्चे को भी उखड़ा बाय
भाभी अकेली मधुशाला में
नवल नेही संग नैन लड़ाये
संतति पश्चिम की बोली उगले
” माँ” हिंदी कैसे बोलें दैया ?
अंग्रेज़ी भाषा मगज घुसा नहीं
बिना समझे बोलती या!या!या!
तिलकोर -मखाना से मन भरमा
अब जीभ चढ़े ना मकई का लावा
पोपकोर्न चौमिन दलीय लिए
मोंछ ऐंठते बैठे बाबा

 6  “स्नेह -निमंत्रण “

टपकूं तेरे विभा क्षीर को
बनकर स्वाति सीप
ब्रह्म विश्रांति की चारू शिल्पी
विजन धार में जलता दीप
नीरद नयन नलिनी सा मुख
लुभा न पाता यह स्नेहिल मन
मंद हेमंत का पवन निरंतर
कलुषित करता मेरा अर्पण
सही न जाती व्याल दृष्टि से
तेरी  यह दुत्कार
पाषाण बनीं क्यूँ अरी
प्रेयसीक्या यह स्नेह असार?
अंतर्तम में स्वांग नहीं
न किया कभी कीर किल्लोल
मनःज्वाल  चुभ बैठा मन में
किसे कहा तू बोल  ?
दृग आनन पर मत इठलाना
गेह गेह सौंदर्य भरे
शिशिर तुहिन तीर मुरझाई
वसंत ममुख गेंदा प्रसून मरे
मैं नहीं कहता करो समर्पित
अर्चिस आभा या अंतर्मन
स्वीकार करो सजल ह्रदय से
अमल कृष का स्नेह निमंत्रण

 7   ” लुप्त “

दड़क गए शिखर मेरु के
हिलकोरें सागर की लुप्त हुईं
रवि आभा जब मलिन दिखा –
नीरज पंखुड़ियाँ लुप्त हुईं
वात्सल्य स्नेह में भी छल है
संतति नियति का क्या कहना
प्रेम विवश दमड़ी के आगे
कुम्हिलात कुंदन गहना
स्वाती क्या ? पूर्वा  में भी
वारिद दामिनी सुसुप्त हुईं
समाज मुकुट गिरा कोठे पर
निलय रम्भा अब गुप्त हुईं
वैताल-झुण्ड अब तंत्र के रक्षक
छद्म स्वार्थी ताल मिलाते हैं
अंतर्तम में मेल नहीं
एक दूजे के बाल सहलाते हैं
जड़मति कलुषा सुयश पात्रा अब
मंजुल सर्वज्ञा विक्षिप्त हुईं
अश्व पाद में नहीं स्पंदन
गदह-टाप उद्दीप्त हुईं
सब प्रश्नों के एक ही उत्तर
विकसित युग में जीना है
माँ के क्षीर में स्वाद नहीं अब
रसायन दुग्ध को पीना है
चिपटान्न उपेक्षित की पोटली में
फास्ट फ़ूड प्रदीप्त हुईं
अर्थनीति के सबल जाल में
अन्य मेखला सिप्त हुईं

 8  कैसे मैं अंतिम नमन करूँ ?

कैसे मैं अंतिम नमन करूँ ?
आँचल को तूने किया कलुषित
पुत्र आशा के लोलुप सपनो में
करुणा धारिणी हो गयी पतित
नहीं उषा दर्शन नहीं दिव्य शिखा
वसुधा से पहले नरक दिखा
नहीं दिखा छोह अति मृदुल क्षेम
नहीं मोती माणिक्य रजत हेम
मात्र पांच मास मातृ गर्भ रही
जन परिजन से उपहास सही
तुच्छ समझ किया तूने  गर्भपात
बाला बचपन तज कुम्हिलात
है कौन सी शक्ति मनुसुत में ??
जो तनया  में नहीं दिखलाई
लक्ष्मी के रणहुंकारों से
वृद्ध  कुंवर में थी ज्वाला आई
दुःख एक मात्र यह तात प्रिया
माँ ने माँ का बलिदान दिया
सनातन पालिका एक नारी ने
वैदेही का अपमान किया
भव बंधन का कैसा दर्शन
अलभ्य नीर क्षीर विलग जीवन
तज गया प्राण तो अनल अर्पण
अमिय मधु से पुत्र किया तर्पण
एक बार मुझे भी बतलाती
सुधा पयोधि जीवन में बरसाती
लाती सतरंगी परिधान
पुत्र से बढ़कर करती सम्मान
देना आशीष मेरी जननी
नहीं बेटी  बन आऊँ अवनि
नहीं सूखे पुनि नव किसलय दल
नहीं जल से पहले मिले अनल …..

 9  “अन्तर्द्वन्द्व “

जीने के पल मिले अनोखे
अंतर्मन से जी ना पाया
आशा में बैठा रहा प्यासा पर
मधुर सत्व रस पी ना पाया
शुष्क अश्क में धार नहीं अब
हिय में वसंत बहार नहीं अब
प्रतिक्षण रेत पर रगड़ रहा
चकमक बना कटार नहीं अब
खड़ा विवश गति-काल देखते
उजड़े मन को सी ना पाया
“अन्तर्द्वन्द्व” विकल धारा में
कर्म निलय पट बंद मिला
हर पौधे को समूल उखाड़ा
नहीं सलामत कंद मिला
कली-कली में काले धब्बे
कोई सुमन सही ना पाया
नीति आदि श्रृंगार वैराग्य का
सृष्टि में कोई मोल नहीं
जीवन गति यति और नियति में
भौतिक -भाग्य किल्लोल नहीं
सरल बाट पर चलो बटोही
कांचन धारा मिल जाएगी
अर्वाचीन कर्म नश्वर है
कलुष रैन ना टकराएगी
काल-मूल्य सदा पहचानो
सजल शांति का तान मिलेगा
अन्तर्द्वन्द्व के क्षितिज द्वार पर
पल-पल विप्लव गान मिलेगा ………

 10  ” सावन में परती “

कैसी यह विडम्बना
कैसा संयोग
घन -घन घनन के काल
स्वाती सा हाल
सूख रही धरती
सावन में परती
आपको क्या जनाब ?
घोषित कर दो सुखाड़..
फिर क्या…????
आपकी चांदी ही चांदी
जनता को बुखार …
ओ नभ के रक्षक
ओ व्योम के तक्षक
ओ सुरेन्द्र
मन्यानिल की प्रवाह …
आर्य की धरती पर भेजो
कोई रखवाला नहीं
कौन कहता है तुम नहीं
यदि तुम नहीं तो भारत कैसा
कैसा झारखंड
बुद्ध की बौद्धिक भूमि
का कैसा अस्तित्व ?
ये सारे रखवारे  भी…
तेरी तरफ ही देख रहे हैं
इन सामंतो की  पौबारह
मत होने दो
ऐसी धारा कलकल …
भेजो की किसान क्या
मजदूर भी अपनी बेटी का हाथ
अगले साल पीले करने की सोचे
अन्नपूर्णा के देश में
चिष्टान्न का भण्डारण हो….
ओ नभ के गरज
दिखा दे निराशावादियों को
भारत में भगवान है
अल्लाह है ,गॉड है
जिस रूप में दिखो
सदा अभिनन्दन
हे अभ्यागत .
इस स्नेह भूमि पर पुनि स्वागत …

 11″ हाय मेरी बिडंबना

मास्टर साहेब खुजला रहे थे
अपनी दाईं आँख ..
अर्द्धांगिनी धीरे से बोली
दूसरी आँख को भी करो स्पर्श
नहीं तो झगड़ा होना तय है …
मास्टर साहेब चिल्ला उठे
कैसी बिडंबना है ..
अरे भाई व्यथा होगी दाईं ओर
और खुजलाऊँ बाईं ओर
किस गुरूजी की हो चेली ?
प्राणनाथ मैं तो यह नहीं कहती
दाईं मत खुजलाएं
मैं तो कहती हूँ दाईं के साथ बाईं भी…
आगबबूला हो गए मास्टर साहेब .
डी. लिट और साहित्यकार
झल्लाते हुए निकाले भड़ास
मन का विकार ..
मेरे जन्म जन्म के
कर्मों का फल प्राणप्रिये
एक दन्त में जब पीड़ा हुई आपको
फिर डॉक्टर से दो दाँत
क्यों ना निकलवाई
मास्टर साहेब की चिल्लाहट सुन
घर भी गूंजने लगा ..
मानो रहा वह हँस
कैसे मास्टर गए हैं फँस
एकबार फिर शालीन स्वर में
अर्धांगिनी बोली ” अब तो हो गई सुदृढ़ ..
बड़ो की कही हुई बातेँ ”
करती हूँ प्रार्थना आपसे
आपको मेरी कसम
खुजला लें एक बार में दोनों आँखे
सिर्फ मेरे लिए
परिवार की शांति के लिए
नहीं तो तय है महाभारत रात तक
रुंधे स्वर में मास्टरसाहेब बोले
” हाय मेरी बिडंबना
मेरे घर की लक्षणा
आप जैसा कहें
किस्मत जो हैं मेरी
आपकी कसम!!!.

 12  वान्या

दिवस शांति का भान नहीं अब
रात मिली न मन को चैन
कल्प एल्बम को अपलक निहारा
पृष्ठ -पृष्ठ पर चिपके दो मादक नैन
किस शिल्पी की रचना हो वान्या
किस माता के तन की छाया
हर मधुकर के कुञ्ज में ढूंढा
पर ऐसा मोहक रूप ना पाया
मात्र औपचारिक कथन नहीं तुम
व्यवहारिक पयोधि की निरंतर धारा
छोड़ो एक ही अर्चिस प्रेम पुंज का
छटे जीवन का घनन अंधियारा
सत ज्ञान दर्शन की कर्म अंग हो
नित भाव सरित विचार तरंग हो
दिवस विषय रहित स्वच्छ अनंग हो
रैन विप्लव सहधर्मी का उमंग हो
पल कर्म डगर का सभ्य पथिक हो
क्षण आचारहीन के लिए बधिक हो
सदा करुण दया से लिप्त विषय हो
तृण अर्पण साध्य साकार अजय हो
मर्यादा ऊँच नीच का लोचन संजय हो
शिक्षा सत्य सुनिश्चित शील विजय हो
दीक्षा धर्म वैदेही कर्म धनञ्जय हो
सदा प्रांजल जीवन का लक्ष्य अभय हो
चहुँदिशि अविरल दिव्य दृष्टि पुंज हो
सदा हरित सबल दाम्पत्य निकुंज हो
अब इक आशा बस तुझसे कामिनी
कोमल नलिनी दृष्टि से देखो भामिनी
प्रतिपल करो पालन अपने दारा धर्म का
ना हूँ ! मैं कंटक सेज ना कराल दामिनी

 13 लोग क्या कहेंगें ?

खुशियाँ मना रहे थे
घर से आये सारे लोग
लुफ्त उठा रहे थे
बहुरंगीव्यंजनों के स्वाद का !
मगर एक इंसान पड़ा था शांत
अपने घर में !
घटोत्कच्च की मृत्यु के बाद
राधेय की तरह उदास
नहीं अच्छा लग रहा था
अपने दल के और सेनानियों का उल्लास
खल रही थी अपनी कमी
डगमगा रहा था विश्वास
पर कर क्या सकते थे
मनानी पड़ेगी खुशियाँ
अनचाहे मन से
बोझिल नयन से
रेंगते तन से
चल दिए नव दुल्हन की तरह
रिसेप्शन पार्टी में
बेटी के ससुराल का रिसेप्शन
आ गए तो जाना ही होगा …
देखते ही समधी जी समझ गए
और कीजिये दिखाबा
मैंने तो कहा था
देवघर में ही कर लें शादी
जब कन्या मुझे थी पसंद
नहीं चाहिए था धन
तब क्यों करें प्रदर्शन ?
आ गए थे ना दिखाबे में
लोग क्या कहेंगें ..?
खिलाते रहें सबको भोज
आज मैं भी तो किया पार्टी
पर अपनी क्षमता से
रा मत मानना
यही कमी है हम बिहारियों की
घर बेचकर करते है दिखाबा
क्या मैंने माँगा था दहेज ?
तब आपने क्यों किया दिखाबा
अपने सबल होने का !
कही कमी थी
अरे मुझसे ले सकते थे
लेकिन आपको था डर
लग जाएगा कलंक
बेटी को बेचने का
तब उतना खर्च क्यों ?
मैं तो था तैयार सादगी भरे शादी के लिए ..
क्या कहूँगा अपने आप से
आप हुए बर्बाद
किसके संताप से ??
गलती केवल बेटे बाले का नहीं
दिखाबे के चक्कर का होता है ..
गुजरातियों को देखो
जिसमे बल होगा
जिसमे सम्बल होगा
वही करेगा खर्च
पक्ष की बात कहाँ..
अभी भी बता दीजिये
किससे लिए थे कर्ज ?
मानवता के लिए ..
चुपचाप चुका दूंगा .
आपको मानवधर्म की कसम
नहीं तो मैं बिन लिए
दहेज़ दानव कहलाऊंगा ?

 14  “लौटा प्रफुल्ल तरंग “

“लौटा प्रफुल्ल तरंग ”
शीतल वात का
रिमझिम बरसात का
शुष्क ह्रदय और विदीर्ण गात पर ……
सारे विह्वल रन्ध्र खुल गए
एक बिखरा पात का ..
ऋतुराज में सोह नहीं
बरखा रानी से तनिक मोह नहीं
शिशिर -ग्रीष्म से हुआ उचाट
हेमंत में पकड़ा था खाट …
याद नहीं कब हुआ सबेरा
इस नैमिषारण्य को नव ऋतु ने घेरा
किसी काल के सहज कल्पना की
अनचोके में हो गयी सिद्धि
नवल ऋतु आयी बनकर ऋद्धि
गेह में स्नेह का आ गया ज्वार
बिन कहे एक अनजाने रीति सारथी
लेकर आई एक कहार
दिखाने पवित्र प्रेम का धार
नहीं कोई विषयलिप्सा
नहीं आकुल पिपासा
प्राप्ति की नहीं कोई अभिलाषा
ना बदले की अनर्गल आशा
यहाँ है बंधन कर्म का
वहाँ तो धर्म का
बीच में भीषण अंध खाई
जिसमे भरी करुणाई
एक भाव का ही तो सहारा
पर अब मैं ना कहलाऊंगा बेचारा
क्योंकि मेरे पास है शक्ति
निश्श्वार्थ प्रेम
नहीं कोई सिनेह नेम
शास्वत यह शब्द
इस अतुल्य प्रेम से परे
सदा मेरी लेखनी रहेगी निःशब्द
अन्यत्र कैसे लुटाउँगा मैं ?
अपनी साधना का रंग
आराधना का उमंग
मेरे जीवन में आया विहान
लौटा प्रफुल्ल तरंग ..

 15 सबकुछ देख रहा है चाँद

सबकुछ देख रहा है चाँद
अर्धांगिनी को आगे करके
तुम बिदक कर बैठे हो माँद
कैसा शार्दुल ! इसी पर मैंने
लगाया था दाँव अपने भविष्य का
बार बार नारियाँ होती है शिकार
पर तुम भीरु तो अपनी नारी को ही
अपने दायित्व से पलायन का
बना डाला हथियार
बोझिल आखों से करके इशारा
कहा था उन्होंने सिर्फ एक बार
सोच लेना मेरे जाने के बाद
कौन देगा साथ तुम्हारा
जब असाध्य व्याधि से पीड़ित
मुझे देखने नहीं आया कोई
मेरे मरने के बाद कौन देखेगा तुम्हे ?
बहुत पाखंडी समाज है हमारा
जो व्याल हैं हो वो किये हैं कब्जा विचार पर
जो शीलवान है वो कलंक से डरकर
स्वार्थ और डर से सम्हलकर
कात में दुबके रह जायेंगें
पापी तुम जैसी अवला को
छद्म बाहुबल से चिबायेंगे ..
खोजकर परखकर कोई इंसान
जो करे आत्मिक रूप से
अवला नारी नारी सम्मान
शर्त और चिंतन से चुनकर
उससे जुड़कर बचाना मान
नहीं तो फिर करते रहना
मेरे निर्वाण का अपमान !
नहीं मानी थी मैंने
उनकी अंतिम याचना
अरे वह महान पति मुझसे मेरी ही
रक्षा का भीख मांग रहा था
मैंने सोचा कैसे दूंगी धोखा
उस इंसान को
एक नन्हा आएगा आपके रूप में
स्वामी मुझे मजबूर ना करें
वो अंतिम बार रोये थे आत्मा से
आँखों में तो नहीं थी शक्ति
आंसू गिराने की
कितनी बड़ी गलती किया था मैंने
अपने पति के स्नेह को नहीं समझा ..
घर बसाना चाहिए था मुझे ..
समाज से डर नहीं था मुझेे
मैं तो डर रही थी अपने आप से
उस पति के दिए प्यार से …
फिर आये तुम
खिल गयी दुनिया मेरी
सोचा नवविपिन बनाकर
बनाऊंगा शार्दूल …व्याल
लेकिन क्या मेरा ही रुधिर मेरा काल
ब्लड कैंसर की तरह !!
शिक्षा ही नहीं है सबकुछ
जरूरी है सबल और सम्बल संस्कार
नारियाँ शिशु पैदा तो करती है.
लेकिन उसे मनुष्य बनाना
उसका बनना
भाग्य हो ना हो पर
निर्भर है संयोग पर ..
एकबार खुलकर बोल देते
चली जाती मैं
पर उनके पास नहीं
विहान की पुनरावृति के भरोसे
नए कर्मपथ की तलाश में
मैं इतनी कमजोर नहीं हूँ.
जीने की कला उन्ही से ही सही
भला सीखी तो थी मैंने
तेरा अपना चाँद तो छोटा है …
पर दिव्य गगन में घूमते हुए
सबकुछ देख रहा है चाँद
आपके अंतःकरण का गणित
जो कितना खोटा है…

शिव कुमार झा

shiv-kumar-jha-ki-kavitaen,SHIV KUMAR JHAशिक्षा : स्नातक प्रतिष्ठा,: स्नातकोत्तर , सूचना- प्राद्यौगिकी
साहित्यिक परिचय : पूर्व सहायक संपादक विदेह मैथिली पत्रिका (अवैतनिक )
सम्प्रति – : कार्यकारी संपादक , अप्पन मिथिला ( मुंबई से प्रकाशित मैथिली मासिक पत्रिका ) में अवैतनिक कार्यकारी संपादक

साहित्यिक उपलब्धियाँ : प्रकाशित कृति

१ अंशु : मैथिली समालोचना ( 2013 AD श्रुति प्रकाशन नई दिल्ली २ क्षणप्रभा : मैथिली काव्य संकलन (2013 AD श्रुति प्रकाशन नई दिल्ली )इसके अतिरिक्त कवितायें , क्षणिकाएँ , कथा , लघु-कथा आदि विविध पत्र -पत्रिका में प्रकाशित
सम्प्रति :जमशेदपुर में टाटा मोटर्स की अधिशासी संस्था जे एम . ए. स्टोर्स लिमिटेड में महाप्रबंधक के पद पर कार्यरत

वर्तमान पता : जे. एम . ए. स्टोर्स लिमिटेड ,मैन रोड बिस्टुपुर  ,जमशेदपुर : ८३१००१ संपर्क – : ०९२०४०५८४०३,  मेल : shiva.kariyan@gmail.com

 

11 COMMENTS

  1. साभार श्रधेयी विदुषीगण और श्रद्धेय विद्वतजन …डॉ राधिका वर्मा जी , डॉ रेणुका शर्मा जी , मंजरी देव जी, रमणिका राजपुरोहित जी , डॉ दीपक आर्य जी, सुरैया हासमी जी , विमान शर्मा जी, शेफालिका दीदी , शेमल सुमन भाई साहेब…..आप लोगों के उत्सावर्धन को नमन !
    गीता मिश्रा जी को साभार …मैं तो हिन्दी में कहानी नहीं लिखता ..चंद लिखे भी तो मैथिली में पर आपके आग्रह को स्वीकार करते हुए जल्द ही अपनी कहानी के साथ मिलूंगा …..साभार ,
    शिव कुमार झा , जमशेदपुर

  2. सारगर्भित रचनाओं की एक श्रंखला अनुज शिव कुमार की – मोहित हूँ इनके सृजन संसार की गम्भीरता और गतिशीलता को देखकर – जीवन के हर भाव – अभाव – प्रभाव को समेटते हुए इनके काव्य-कौशल की सराहना करता हूँ और इनके साहित्यिक जीवन की सफलता की कामना करता हूँ। शुभमस्तु

  3. शिवकुमार जी की कवितायेँ बोलती हुई सी लगती है , जैसे शब्द नही सारस्वत प्रवाह हो ,कितनी देर तक सोचने को विवश कर देती है , कभी व्यवस्था के प्रति आक्रोश , कभी मूल्यों का ह्रास , कभी अनैतिकता का विकास। । आसमान की तरह रंग बदलते मानव को देख हताश। क्या नही है इनकी कविताओं में। ।
    किसी कवि या उसकी कविता को समझने के लिए संवेदनशील ह्रदय चाहिए , ना कि , तर्क वितर्क , संशय -असंशय भरी बातें। । कवि को अशेष धन्यवाद उनकी हिंदी – मैथिली , दोनों भाषाओँ की कविता के लिए ,और अपने ही मूल्यों पर जीने के लिए।

  4. सभी कविताएँ शानदार हैं ,आपके लेखन की कला को सलाम ! आपकी सभी पोस्ट पढ़नी पढ़ी !

  5. शिव कुमार झा जी….शानदार ,वाह क्या कविताएँ लिखी हैं ! पढ़ने के बाद लगा की आपकी तारीफ में कुछ लिखा जाए पर किसी एक कविता की तारीफ़ करना बहुत मुश्किल हैं !

  6. इतना सारी कविताएँ ,सबकी सब एक से बढकर ,आई एन वी सी न्यूज़ ने सच में सभी लिखने पढ़ने वालो के लियें एक नया घर बना दिया हैं ! दो घंटे कब गुजरे पता ही नहीं चला ! साभार ,बधाई आपको आपकी हर कविता के लियें !

  7. शिव कुमार झा जी जी बधाई ,साभार ,आपकी इस पोस्ट के बाद मैंने आपकी सभी पोस्ट पढ़ी हैं आप कमाल की टिप्पणी भी लिखते हैं ! आब आपकी कहानी का इन्तिज़ार हैं !

  8. शिव कुमार झा जी ,आपके बारे में डॉ राधिका जी ने आज ज़िक्र किया ! आपको पढ़ने के बाद लगा की आपके लेखन की तारीफ़ सच में सही थी ! आपकी हर कविता के लियें साभार

  9. शानदार कविताएँ ,काफी वक़त मशगूल रखा आपने ! साभार ! आपकी कलम को भी सलाम !

  10. 15 की 15 कविताएँ आपने आप में अव्वल हैं ! आपकी किसी एक कविता की तारीफ़ बहुत ही मुश्किल हो चली हैं ! सभी शानदार कविताओं के लिये धन्यवाद ! आपकी अगली पोस्ट का इन्तिज़ार रहेगा !

  11. शानदार ,हर कविता पढ़ने के बाद , बार बार पढ़ने का मन हुआ ! बधाई !

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