शक, शक्की, शक्काइटिस

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{डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी**}
मैं सौ फीसद पत्रकार हूँ। क्या बात है किसी को कोई शक? शक का इलाज भी होता है बशर्ते शक्की चाहे तब। हमारे इर्दगिर्द कई ऐसे भी मानव प्राणी हैं, जिन्हें ‘शक्काइटिस’ नामक भयंकर बीमारी ने जकड़ रखा है। मैं चाहता हूँ कि इन लोगों को शक की इस बीमारी से निजात मिले। ऊपर वाले की मर्जी जब वह चाहेगा तभी ऐसा मुमकिन होगा। शक की बात चली तो अर्सा पहले के एक ऐसे व्यक्ति की याद आने लगी जो पेशे से चिकित्सक हैं। अच्छी खासी पढ़ाई करके (एम.बी.बी.एस. की) वह निजी प्रैक्टिस करना शुरू कर दिए थे। उनकी शादी हुई थी, वह बेचारे परेशान रहा करते थे।

किराए का आवास लेकर नई- नवेली पत्नी के साथ रहते थे। क्लीनिक थोड़ी दूर था। एकाध मरीज देखने के उपरान्त वह स्कूटर से अपने आवास चले जाया करते थे। एक दिन मुझसे रहा नहीं गया, मैंने पूंछा मित्र तुम ऐसा क्यों करते हो? वह बोले डियर तुम नहीं जानते आजकल की लड़कियाँ बड़ी चालाक होती हैं। मैं अचानक अपने आवास पर इसलिए जाता हूँ ताकि पता चल जाए मेरी धर्मपत्नी का किसी अन्य से इश्क तो नहीं करती। मैं रंगे हाथों पकड़ना चाहता हूँ। अभी तक सफलता नहीं मिली है। उस दिन बस इतना ही बात हो सकी थी। फिर कुछ दिन उपरान्त वह मिले मैंने उन्हें रोका और एक कप चाय का आफर दिया। वह मेरे आग्रह को न नहीं कर सके।
हम दोनों चाय की चुस्की ले रहे थे इसी बीच मैंने पूंछा अरे भाई साहब आज कुछ रिलैक्स नजर आ रहे हो। वह बोले हाँ डियर आज मेरा टेन्शन कुछ कम हुआ है। फिर उन्होंने सविस्तार जो बताया वह पाठकगण अब पढ़ें- चाय की चुस्की के बीच उन्होंने कहा डियर आज मैं एकाएक अपने आवास पर पहुँचा। स्कूटर कुछ दूरी पर रोक दिया था। अगला दरवाजा भीतर से बन्द था, मैं पिछले दरवाजे की तरफ चला गया। कई आवाज दिया दरवाजा नहीं खुला। मैं समझ गया कि किसी पुराने यार के साथ मेरी पत्नी रंगरेलियाँ मना रही होगी। फिर क्या था, मेरे अन्दर का पुरूष भड़क उठा, क्रोध से शरीर तपने लगा फिर जोर-जोर से दरवाजा पीटने लगा। यही नहीं अगले दरवाजे को बाहर से बन्द कर दिया था। वह इसलिए यदि उसका कोई यार उधर से निकल भागना चाहे तो ऐसा न कर सके। फिर पिछला दरवाजा जोर-जोर से पीटने लगा।
 भरी दोपहर में दरवाजा न खुलने पर मेरा शक यकीन में तब्दील होने लगा कि धर्मपत्नी का इश्क पहले से कई औरों के साथ चल रहा है। मैंने कहा डियर इस एपीसोड के क्लाइमेक्स पर आओ और अन्त में क्या हुआ वह बताओ। वह बोले यार तेज आवाज से दरवाजा पीटने पर धर्मपत्नी ने पिछला दरवाजा खोला। वह आँखें भींचते हुए आईं थी बोली अगले दरवाजे से क्यों नहीं आए। मैंने उनकी बात को अनसुना करते हुए आवास के अन्दर प्रवेश किया और जल्दी-जल्दी सभी कमरे, आँगन, बाथरूम सब देख डाला कहीं कुछ नहीं मिला। मेरी इस हरकत पर मेरी नई-नवेली पत्नी ने पूंछा क्या ढूंढ रहे हो? मैंने कहा इतनी देर क्यों कर दिया दरवाजा खोलने में? 
वह बोली खाना बनाने के बाद थकान लग गई थी, सो गई, गहरी नींद लग जाने की वजह से आप की आवाज सुन नहीं पाई थी। उस शक्की की इतनी बात ही सुनकर मुझे अन्दर ही अन्दर क्रोध आ गया था, लेकिन उसे यहसास नहीं होने दिया। चूँकि उसे ‘शक्काइटिस’ नामक रोग ने बुरी तरह से जकड़ लिया था, जिससे छुटकारा पाना उसके लिए नामुमकिन सा ही था। उस दिन की बात से मुझे बड़ा अजीब सा प्रतीत हुआ कि इस तरह के पढ़े-लिखे लोग शक्की क्यों होते हैं। आज तक एक बात मेरी समझ में नहीं आई वह यह कि क्या चरित्रहीनता सिर्फ स्त्रियों में ही होती है या फिर पुरूष जाति में भी यह गुण होता है। वैसे मैंने सिनेमा, टी.वी. सीरियल्स में देखा है कि स्त्रियाँ भी शक्की स्वभाव की होती हैं, और अपने पतियों की गतिविधियों पर स्वयं तो नजर रखती ही हैं, प्राइवेट जासूस भी लगा देती हैं। 
बहुतों की जुबानी भी सुना है कि फलाँ की बीवी और फलाँ के शौहर को ‘शक्काइटिस’ हो गया है। ऊपर वाले के फज़ल से अभी तक मैं इस रोग से बचा रहा। वैसे अब उम्र के इस पड़ाव पर मुझे यह रोग हो ही नहीं सकता। मैं अल्लाह ताला से गुजारिश करता हूँ कि यदि अपने बन्दों की जिन्दगी खुशहाल देखना चाहता है तो उन्हें शक्काइटिस रोग से महफूज रखें। पाठकों यहाँ अल्लाह के बन्दों में औरत-मर्द दोनों के बारे में कहा गया है। 
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unnamedडॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी
(वरिष्ठ पत्रकार/टिप्पणीकार)
अकबरपुर, अम्बेडकरनगर (उ.प्र.)
मो.नं. 9454908400
*लेखक स्वतंत्र पत्रकार है
*लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं और आई.एन.वी.सी  का इससे सहमत होना आवश्यक नहीं।

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