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Saturday, October 31st, 2020

विश्व गुरू माना जाता था

आई एन वी सी न्यूज़  
जयपुर, 


राज्यपाल कलराज मिश्र ने कहा है कि भारतवर्ष को उसके प्राचीन ज्ञान के आधार पर ही “विश्व गुरू” माना जाता था। आज फिर इस गौरव की पुनस्र्थापना किए जाने की जरूरत है। इसमें शिक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण है जो प्राचीन साहित्य, ऋषि मनीषियों के किए गए कार्यों, साहित्य, ग्रन्थों द्वारा स्वयं ज्ञानार्जन करे, आत्मानुभूत करे एवं अपने विद्यार्थियों एवं समाज के लिए इस ज्ञान का उपयोग करे।


राज्यपाल शुक्रवार को जामडोली स्थित श्री केशव विद्यापीठ द्वारा संचालित श्री अग्रसेन स्नातकोत्तर शिक्षा महविद्यालय सी.टी.ई में आयोजित “भारतीय वाग्ड्मय के परिप्रेक्ष्य में शिक्षक-शिक्षा की संकल्पना” विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्रा को मुख्य अतिथि के रूप में सम्बोधित कर रहे थे।

श्री मिश्र ने कहा कि भारतीय ऋषि-मुनियों ने भौतिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्रा के हर विषय पर महान कार्य किया है। उनके दिए तर्क और किया गया कार्य अकाट्य है। ऋग्वेद संसार की पहली पुस्तक है और वेदों में संसारभर का ज्ञान समाहित है। रसायन, खगोलिकी, चिकित्सा, शल्य जैसे हर विषय पर प्राचीन मनीषियों ने विविधता के साथ कार्य किया है। उन्होंने चरक, वराहमिहिर, आर्यभट्ट, कौटिल्य जैसे कई विद्वानों के कृतित्व का उल्लेख करते हुए उनके कार्य को आज भी प्रासंगिक एवं काल खण्ड की सीमा से परे बताया।

उन्होंने कहा कि आज भारत के प्राचीन ज्ञान से सीखकर ही ओंकार थैरेपी, प्राणायाम एवं योग का डंका पूरे विश्व में बज रहा है। वसुधैव कुटुम्बकम से लेकर विभिन्न प्राचीर सिद्धान्तों एवं धारणाओं को विश्व आज भी महत्व दे रहा है। उन्होंने सभी शिक्षकों से आग्रह किया कि कौटिय के अर्थशास्त्रा एवं प्राचीन भारतीय ज्ञान ग्रन्थों का अध्ययन करें और देशप्रेम मूल्य आधारित शिक्षा के जरिए समाजोत्थान के महत्वपूर्ण कार्य में अपनी भूमिका निभाएं। उन्होंने कहा कि शिक्षक को हमारे देश में श्रद्धा की नजर से देखा जाता है, इस भाव को विद्यार्थी एवं समाज के लिए अपनी भूमिका से बनाए रखने की जिम्मेदारी भी शिक्षकों की है। श्री मिश्र ने इस मौके पर सभी उपस्थितियों को भारतीय संविधान की उद्देशिका एवं मूल कर्तव्यों का पठन कराया एवं उनके भावों को जीवन में उतारने का आह्वान किया।
केशव विद्यापीठ समिति के अध्यक्ष प्रो.जे.पी.सिंघल ने कहा कि भारतीय वाड्मय में ज्ञान का खजाना  छिपा है। आज इसे पुनःउद्घाटित किए जाने की जरूरत है। आज यूनेस्को शिक्षा के जिन स्तम्भों “लनिर्ंग टू नो, लर्निंग टू टू, लर्निंग टू लिव टुगेदर, लर्निग टू बी ह्यूमन” को मान्यता दे रहा है वह तो कई हजार वर्ष पूर्व ही “ज्ञानम् तृतीय नेत्राम्”, “कर्मन्ये वाधिकारस्ते” जैसे संदेशों में पहले ही बताया जा चुका है। उन्होंने कहा कि पाश्चात्य जगत में हमारे प्राचीन ज्ञान से लोग अभिभूत हैं और मान्यता देते हैं लेकिन हमारे देश में इस गौरव को अनुभव कर शिक्षा के क्षेत्रा में इसके अनुप्रयोग की जरूरत है।

संस्था के संयुक्त सचिव श्री अमरनाथ चंगोत्राा ने संस्था एवं उसके द्वारा किए जा रहे कार्योें का परिचय दिया। सहायक आचार्य संगोष्ठी समन्वयक डॉ.मीनू अग्रवाल ने भारतीय वाग्ड्मय की पृष्ठभूमि में शिक्षा के मूल तत्व की संकल्पना की जानकारी दी। विद्यालय की कोमल शर्मा ने काव्यात्मक गीत “ सेव है यज्ञ कुण्ड” की प्रस्तुति दी। इस अवसर पर महविद्यालय की प्राचार्य  एवं संगोष्ठी संचालक डॉ. रीटा शर्मा ने संगोष्ठी के विभिन्न सत्राों के बारे में जानकारी दी।

इस अवसर पर केशव विद्यापीठ समिति के सचिव श्री ओ.पी.गुप्ता, महाविद्यालय प्रबन्ध समिति के मंत्री श्री सूर्य नारायण सैनी उपस्थित थे। संगोष्ठी में देशभर से अनेक विश्वविद्यालयों के कुलपति, शिक्षा संकाय के अधिष्ठाता, शिक्षा विभागों के विभागाध्यक्ष, प्रोफेसर, शोधार्थी, शिक्षक शिक्षा महाविद्यालयों के प्राचार्य, संकाय सदस्य, प्रशिक्षणार्थियों समेत करीब 350 शिक्षाविद् हिस्सा ले रहे हैं।

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