Thursday, November 14th, 2019
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विपक्ष चुनौती देता नहीं दिख रहा

लखनऊ. उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) की 11 विधानसभा सीटों पर 21 अक्टूबर को होने वाले मतदान को लेकर बीजेपी (BJP) संगठन और योगी सरकार (Yogi Government) ने पूरी ताकत झोंक दी है. प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह (Swatantra Dev Singh), प्रदेश महामंत्री (संगठन) सुनील बंसल (Sunil Bansal) और अन्य पदाधिकारी पहले से ही मोर्चे पर जुटे हैं. उपचुनाव वाले क्षेत्रों में दौरे हो रहे हैं. अब खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (CM Yogi Adityanath) 15 अक्टूबर से तीन दिन में 11 जनसभाओं को संबोधित करेंगे. दूसरी तरफ विपक्ष महज ट्विटर तक ही सिमटा नजर आ रहा है. सपा, बसपा और कांग्रेस के प्रत्याशी खुद ही प्रचार की कमान संभाले हुए हैं.

वर्ष 2014 के बाद से पहली बार अलग-अलग लड़ रहे विपक्ष के लिए यह उपचुनाव काफी अहम हैं. खासकर साल 2022 से पहले विधानसभा उपचुनाव में खुद को बीजेपी के मुकाबले दिखाने के लिए यह आखिरी मौका है. ऐसे में इस चुनाव को वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले का सेमीफाइनल भी कहा जा रहा है, लेकिन अगर उपचुनाव की तैयारियों की बात करें तो सपा, बसपा और कांग्रेस के प्रत्याशी खुद ही अपने प्रचार में जुटे हैं. पार्टी का कोई बड़ा नेता क्षेत्र में अभी तक नहीं दिखा है. यह बात अलग है कि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, बसपा सुप्रीमो मायावती और कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी ट्विटर पर सरकार को अलग-अलग मुद्दों पर घेर रही हैं. लेकिन, जमीन पर प्रत्याशी और समर्थक ही जूझते नजर आ रहे हैं. ऐसे में जानकारों का मानना है कि बीजेपी के मजबूत संगठन से विपक्ष कैसे मुकाबला करेगा?

बसपा ने ही जारी की है स्टार प्रचारकों की लिस्ट

बहुजन समाज पार्टी (BSP) ही व्यवस्थित ढंग से जमीन पर काम करती नजर आ रही है. उसने अपने स्टार प्रचारकों की सूची के साथ ही जोनल इंचार्ज और भाईचारा कमेटी के जरिए चुनाव प्रचार में जुटी है. हालांकि, स्टार प्रचारकों की लिस्ट में मायावती नहीं हैं. मायावती की जगह उनके भतीजे आकाश आनंद और अन्य प्रमुख नेताओं को जिम्मेदारी दी गई है.


अकेला विपक्ष चुनौती देता नहीं दिख रहा

राजनीतिक मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल कहते हैं कि बीजेपी और बसपा को छोड़ दिया जाए तो इस चुनाव में सभी अन्य प्रमुख दल किसी एक व्यक्ति के नेतृत्व पर ही उम्मीद लगाए बैठी है. अखिलेश यादव पिछले दो महीने से सिर्फ यही संकेत देते रहे कि शिवपाल यादव पार्टी में आ रहे हैं कि नहीं. वह पार्टी संगठन को मजबूत करते नजर नहीं आए. उनकी पूरी कोशिश यही दिखी कि वह किसी दूसरे दल के नेताओं को पार्टी में ले आएं. ऐसा कुछ रमाकांत यादव को पार्टी में लेकर उन्होंने किया. अब वे पार्टी में आइसोलेट हो रहे हैं, क्योंकि पिछले तीन साल में उनके सभी फैसले गलत साबित हुए. ऐसा कुछ भी नहीं दिखा कि वे पार्टी को मजबूत कर रहे हैं. सिर्फ बसपा के नेतृत्व में एक सेंट्रल कमांड दिख रहा है. उधर, कांग्रेस ने जरूर संगठन को लेकर फैसले लिए हैं, लेकिन इतने कम समय में वह उपचुनाव में क्या असर दिखा पाएगी यह परिणाम ही बताएंगे. लिहाजा एडवांटेज बीजेपी के पास ही होगा. कुल मिलाकर विपक्ष नंबर दो के लिए ही जूझता नजर आ रहा है. मौजूदा समय में जब विपक्ष अकेला मैदान में है तो बीजेपी को चुनौती मिलती नहीं दिख रही है.

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