तनवीर जाफरी*,,
            भारत वर्ष में अशोक सम्राट, महात्मा बुद्ध से लेकर महात्मा गांधी तक कई ऐसे महापुरूषों ने जन्म लिया जो आज भी पूरे विE के लिए अहिंसा का प्रतीक माने जाते हैं। महात्मा गांधी ने तो ऐसे युग में जन्म लिया जबकि हमारा देश अंग्रेज  हुकूमत का गुलाम था। अंग्रेज अपनी बर्बरता चतुराई, रणनीति तथा क्वफूट डालो और राज करों जैसी नीतियों  के लिए विश्व प्रसिद्ध थे। उनके शासन काल में जब भी भारत को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने का कोई अभियान या आन्दोलन इस देश में छेड़ा जाता तो यह उस आन्दोलन को बबरता पूर्वक कुचल दिया करते थे। उसी दौरान महात्मा गांधी को एक युक्त  सूझी कि चूंकि हम अंग्रेजों का मुकाबला ताकत या हथियारों से नहीं कर सकते अतज् शांति और अहिंसा रूपी हथियारों का प्रयोग अंग्रेजों  के विरूद्ध किया जाना ही एक समझदारी भरा कदम होगा। हालांकि  उस समय देश की आजादी की लड़ाई में अपनी जान को हथेली पर लिए और सर पर कफन बांध कर निकले तमाम देश भक्त मतवाले गांधी जी के इस अंहिसात्मक सत्याग्रह के तरीकों से पूर्णतया सहमत नहीं थे। उसके बावजूद दुनिया ने देखा कि अहिंसा के इस महान पुजारी ने अपने शांति, अहिंसा और  सत्याग्रह जैसे बह्म अस्त्रों का प्रयोग करते हुए  भारत को आçखरकार अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त करवा ही दिया।
        गांधी जी ने आजादी की लड़ाई में शांति और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए जिन अस्त्रों का प्रयोग करने की सलाह भारतवासियों  विशेषकर स्वतन्त्रता संग्राम में सक्रिय सेनानियों व कांग्रेस जनों को दी थी उनमें शांतिपूर्ण प्रदर्शन, भूख हड़ताल, असहयोग आन्दोलन, सत्याग्रह,धरना, सांकेतिक व्रत तथा विरोध स्वरूप स्वैçच्छक बंद आदि उपाय शामिल थे। इन्हीं अहिंसक अस्त्रों से भयभीत होकर अंग्रेज देश छोड़कर चले गए। भारत स्वाधीन हो गया। अहिंसा के उस महान दूत को अंग्रेज़ तो जान से मार देने का साहस न जुटा सके परन्तु हमारे ही देश के एक घोर सा प्रदायिकता वादी एवं कट्टरपंथी विचारधारा का पाठ पढ़े हुए एक हत्यारे ने गांधी जी को  कत्ल कर डाला। बेशक आज गांधी जी हमारे बीच नहीं हैं परन्तु उनके द्वारा दिखाए गए शांति और अहिंसा के आदर्शों को आज भी न केवल पूरा देश बल्कि पूरा विश्व पूरे आदर व स मान के साथ स्वीकार करता है। गांधी जी के उन शांति प्रिय विरोध, प्रदर्शन के अस्त्रों का प्रयोग आज भी इस देश में समय समय पर न सिर्फ गांधी वादियों या कांग्रेसजनों द्वारा ही किया जाता है बल्कि गांधीवादी विचारधारा का विरोध करने वाले लोग भी समय समय पर उन गांधीवादी लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों का सहारा लेते रहते हैं।
        ऐसे ही एक लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन के तरीके को क्वबंदं का नाम दिया गया है।  क्वबंदं का अर्थ  यह होता है कि यदि किसी शासकीय व्यवस्था के विरूद्ध किसी संगठन द्वारा  क्वबंदं का आuान किया गया है तथा जनता उस  क्वबंदं के आuान को अपना समथüन दे रही है तो वह स्वेच्छा से अपनी दुकान, व्यापारिक प्रतिष्ठान, उद्योग, व्यापार, शिक्षा आदि को विरोध स्वरूप क्वबंदं कर उस संगठन द्वारा आहूत  क्वबंदं में शामिल होकर व्यवस्था का विरोध करने वालों में स्वयं को ाी सç मलित कर सकती है। परन्तु दुभाüग्य की बात यह है कि आज तमाम संगठनों द्वारा समय समय पर उन गांधी वादी  तरीकों का प्रयोग तो जरूर किया जाता है परन्तु वास्तव में उनमें अहिंसा के स्थान पर हिंसा तथा स्वेच्छा की जगह अनिच्छा व लोकतांत्रिक तौर तरीकों  के इस्तेमाल के बजाए पूर्णतया ज़ोर-ज़बरदस्ती व धPे शाही वाले तरीकों  का प्रयोग होता दिखाई देता है। राजनैतिक विरोध की यह अलोकतांत्रिक कही जा सकने वाली प्रक्रिया एक समय देश में अपने उस चरम तक पहुंच गई थी जबकि  लगभग पूरे देश में हड़ताल , प्रदर्शन, तोड़फोड़, चत जाम तथा बंद जैसी घटनाएं आम हो चुकी थीं। देश में इन विरोध प्रदर्शनों ने अराजकता का रूप धारण कर लिया था। वैसे तो पूरा देश इस अशांति का सामना कर रहा था। परन्तु दुभाüग्यवश देश का सबसे पिछड़ा  व गरीब कहा जाने वाला बिहार राज्य इन घटनाओं में सबसे आगे था। यहां तक कि उसी दौरान बिहार में समस्तीपुर çजले में बिहार के ही सांसद एवं तत्कालीन रेल मंत्री  ललित नारायण मिश्रा की एक बम विस्फोट द्वारा एक सार्वजनिक कार्यक्रम में हत्या तक कर दी गई । यह घटना किसी आतंकवादी या अलगाववादी आन्दोलन के कारणवश हुई हत्या नहीं  बल्कि राजनैतिक विरोध प्रदर्शनों ने इस कद्र उग्र रूप धारण कर लिया था अथवा यह कहा जाए कि तमाम राजनैतिक व श्रमिक संगठनों  द्वारा सत्तारूढ़ इन्दिरा सरकार के विरूद्ध किये जा रहे रोष प्रदर्शन इतने उग्र हो चुके थे कि इनके परिणाम स्वरूप स्वतन्त्र भारत की पहली शीर्ष राजनैतिक हत्या ललित नारायण मिश्रा के रूप में  देश वासियों को देखनी पड़ी। प्रसिद्ध बड़ौदा डाईनामाईट काण्ड भी उसी जमाने की बात है जिसका आरोप जार्ज फर्नाडिज पर लगाया गया था।
        आçखरकार उपरोक्त हालात से तंग आकर व इन्हीं कारणों से देश की बिगड़ती हुई अर्थव्यवस्था को देखकर तथा अहिंसात्मक विरोध प्रदर्शन के तौर तरीकों को पूरी तरह हिंसापूर्ण होता हुआ देखकर इन्दिरा गांधी को देश में आपात काल की घोषणा करनी पड़ी थी।  आपात काल की घोषणा होते ही देश की कानून व्यवस्था पटरी पर आ गई। सभी प्रकार के धरने प्रदर्शन व हड़ताल प्रतिबंधित कर दिए गए। हालांकि तमाम नेता देश में की गई आपातकाल की घोषणा को लोकतंत्र की हत्या तथा तानाशाही जैसी संज्ञा दे रहे थे परन्तु वास्तविकता तो यही है कि आपातकाल की घोषणा होने से पूर्व जब ललित नारायण मिश्रा की हत्या हुई या भारतीय रेल के चPे जाम हुए, देश के तमाम बड़े व छोटे कल कारखाने ठप्प करा दिये गए, बड़ौदा डाईनामाईट कांड हुआ, उस समय तो देश में पूरा लोकतंत्र था। परन्तु क्या यह स ाी  घटनाएं  एक सच्चे लोकतंत्र की देन कही जाने वाली घटनाएं थीं?
        बहरहाल, आज न तो देश में आपातकाल जैसी स्थिति है और सौभाग्यवश न ही आपात काल के पूर्व का अराजकतापूर्ण  वातावरण । परन्तु राजनैतिक विरोध के तमाम कारणों के चलते अब भी कभी-कभार भारत बंद या प्रदेश बंद जैसे आuान होते जरूर देखे जा सकते हैं। इसे महज एक इžोफाक कहें या राज्य का दुभाüग्य कि अभी भी  क्वबंदं के इस आuान में बिहार राज्य ही सबसे  आगे नजर आता है।  बेशक किसी भी शासकीय फैसले के विरोध में  क्वबंदं का आहवान करना किसी भी संगठन अथवा उससे जुड़े लोगों का लोकतांत्रिक अधिकार है। परन्तु वास्तव में क्वबंदं आçखर कहते किसे हैं? आज कल जिस प्रकार बंद का का आuान किया जाता है उसमें  अक्सर यह देखने को मिलता है कि आम लोगों के  व्यवस्ाायिक प्रतिष्ठानों, दुकानों व उद्योगों आदि को जोर जबरदस्ती से बल पूर्वक बंद कराने का प्रयास किया जाता है। यदि कोई व्यçक्त स्वेच्छा से बंद में शामिल नहीं होना चाहता तो उसे बंद कराने वालों की हिंसा या रोष का शिकार होना पड़ता है। यहां तक कि गरीब, रेहड़ी व ठेला गाड़ी तथा रिक्शा चालकों  तक को बंद में शरीक प्रदर्शन कारियों के आतंक का सामना करना पड़ता है। देखा जा सकता है कि बंद का आuान  करने वाले मु_ी भर प्रदर्शनकारी तलवारों व लाठी डंडों से लैस होकर अपने  क्वबन्दं के मिशन को पूरा करने के लिए सड़कों व बाजारों के बीच पूरी तरह भय और आतंक का वातावरण पैदा कर अपने क्वबंदं को कथित रूप से सफल बनाना चाहते हैं। पिछले दिनों पंजाब राज्य के कुछ शहरों में भी कुछ संगठनों द्वारा ज़ोर-ज़बरदस्ती के बल पर बाज़ार बंद करवाने के दौरान कुछ हिंसक घटनाएं घटी जिसमें कई लोग घायल हुए व पुलिस बल का भी प्रयोग हुआ।
        सवाल यह है कि क्या ऐसे अलोकतांत्रिक तरीके अपनाकर क्वबंदं को सफल बनाना आम जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों तथा स्वतंत्रता पूर्वक जीवन जीने के उनके मूलभूत अधिकारों का हनन नहीं है। विरोध प्रदर्शन, बन्द तथा हड़तालें  आदि हमारे शांतिपूर्ण  विरोध व्यक्त करने  के तरीकों में जरूर शामिल हैं। परन्तु हमें इन अधिकारों  का दुरूपयोग कतई नहीं करना चाहिए। हमें जहां अपना विरोध व्यक्त करने का अधिकार है वहीं हमें अपनी इच्छा को दूसरों की अनिच्छा पर थोपने का अधिकार हरगिज नहीं है। किसी भी बंद में उसी को शामिल किया जाना चाहिए जो स्वेच्छा से तथा वैचारिक रूप से क्वबंदं के आuान में शामिल होता है। हिंसात्मक तरीके अपनाकर  क्वबंदं को कथित रूप से सफल बनाकर जनता की हमददीü कतई नहीं प्राप्त की जा सकती।

**Tanveer Jafri ( columnist),(About the Author) Author  Tanveer Jafri, Former Member of Haryana Sahitya Academy (Shasi Parishad),is a writer & columnist based in Haryana, India.He is related with hundreds of most popular daily news papers, magazines & portals in India and abroad. Jafri, Almost  writes in the field of communal harmony, world peace, anti communalism, anti terrorism, national integration, national & international politics etc.He is a devoted social activist for world peace, unity, integrity & global brotherhood. Thousands articles of the author have been published in different newspapers, websites & news-portals throughout the world. He is also a recipient of so many awards in the field of Communal Harmony & other social activities.
(Email : tanveerjafriamb@gmail.com)

 

Tanveer Jafri ( columnist),
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*Disclaimer: The views expressed by the author in this feature are entirely his own and do not necessarily reflect the views of INVC

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