Monday, October 14th, 2019
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ये पब्लिक है सब जानती है- अब नो उल्लू बनाविंग

Your+Voice+Your+Vote+logo{सोनाली बोस **}आज देश लोकसभा चुनाव के छठे दौर के मतदान का साक्षी बनने जा रहा है। लेकिन इस बार के लोकसभा चुनाव मेँ एक बात ख़ास रही है और वो है बेतुकी बयान बाज़ी और अलगाव की राजनीति।अब तक हम सभी इस चुनाव के बीत चुके दौरोँ मेँ कई तरह के उतार चढ़ाव के गवाह बने हैँ।इन चुनावोँ ने अब तक अपने हिस्से के प्यार और नफरत को झेल लिया है और जैसे जैसे चुनावी पारा चढ़ता जा रहा है नफरत और अलगाव की राजनीति भी बढ़ती ही जा रही है। राहु केतु की तरह ओछी मानसिकता और भड़काउ बयान बाज़ी ने देश की आबो हवा को दुश्वार कर दिया है।वैमनस्यकारी बर्ताव, बदनामी की राजनीति और सांप्रदायिकता को इस तरह से महिमामंडित किया जा रहा है जैसे कि आज राजनीति का असली मतलब यही रह गया हो। परस्पर दोषारोपण करना तो जैसे हर पार्टी का अहम शगल हो चुका है। देश की आबो हवा मेँ आज सिर्फ नफरत और इल्ज़ाम के वायरस घुम रहे हैँ। ऐसा कोई भाषण सुने तो जैसे सदियाँ बीत चुकी हैँ जब किसी ने आपसी सौहार्द बढ़ाने और देश के हित को सर्वोपरी रखने की बात की हो। सारे TV channels इन भड़काउ और झगड़ालु वाद विवाद से अटे पड़े हैँ। सारे के सारे नेता अपने सभी 'इल्ज़ामी' असलहे लेकर एक दुसरे को जितना नीचा दिखा सकते हैँ दिखा रहे हैँ।

लेकिन अब लगता है कि जितनी जल्दी हो, ये चुनावी माहौल खत्म हो जाये तो अच्छा हो। जिस तरह से तमाम पार्टीयाँ मतदाताओँ को लुभाने के लिये गन्दी राजनीति का उपयोग कर रही हैँ, उसे देखकर अब कोफ्त हो रही है। ऐसा लग रहा है कि जैसे कि हम लोकसभा चुनाव के साक्षी नहीँ बल्कि किसी सर्कस के दर्शक हैँ जहाँ पर रिंग मास्टर जानवरोँ को हड़काने और क़ाबू मेँ करने के लिए कोड़े को हर कोने मेँ लहराये जा रहा है। अब लगने लगा हिअ कि इस चुनाव से जल्दी छुटकारा बस जैसे तैसे मिल ही जाये। क्योंकि एक सर्कस का तमाशा तो झेला जा सकता है लेकिन जिस तरह का माहौल इन चुनावो मेँ बन रहा है उसने इन लोकसभा चुनावोँ का अब तक का सबसे घिनौना चुनाव करार दिया है। वोटर्स को लुभाने के लिए तमाम आक्रामक प्रचार प्रसार और शत्रुता पूर्ण हथकंडे अपनाये जा रहे हैँ। और ये हम सभी जानते हैँ कि इस तरह के माहौल को बनाने का पूरा श्रेय किसे जाता है। एक ने इस वैमनस्य और दोषारोपण की शुरुआत की और बाकि सभी पार्टीयाँ भी उसी भेड़चाल मेँ बाख़ुशी शामिल हो गई।

अच्छा एक बात बताईये तो, इन सभी राजनीतिक पार्टीयोँ की इस तरह के खेल मेँ शामिल होना मजबूरी है लेकिन हमारी और आपकी(वोटर्स) क्या मजबूरी है? आख़िर हम सभी भी क्योँ इस घिनौने मुखौटे को पहनने को मजबूर हो रहे हैँ? हम इन सभी को ये इम्प्रेशन क्यूँ दे रहे हैँ कि हमेँ भी इस तरह की फालतू बातोँ से बड़ा रोमांच हो रहा है? क्या अभी भी वो वक़्त नहीँ आया है कि जहाँ हम ये कह सकेँ  कि 'अब बस!!! बहुत हुआ, इस तरह के घिनौने खेल मेँ हम आपका साथ नहीँ देंगे और आपके काम के आधार पर ही अपना वोट देंगे।' क्या अब भी हम इस बेइमान , घमंडी और नकली चेहरे के पार नहीँ देख पा रहे हैँ? क्योँ हम अभी भी इन सस्ती चालबाज़ियोँ को नहीँ समझ पा रहे हैँ?

हमारे देश का लोकतंत्र विश्व मेँ सबसे बड़ा है। सारे संसार की नज़रेँ हमारे इन लोकसभा के चुनावोँ पर टिकी हुई हैँ। ये चुनाव हमारे नागरिक कर्त्तव्य और बालिग होने के गुरुर का चरमोत्कर्ष है। और इस बार तो युवा शक्ति और उत्साह भी उछाल पर है। सभी नये वोटर्स अपने पहले पहले मतदान के प्रति बेहद उत्साहित हैँ। और हमेशा यही देखा गया है कि हमारे मुल्क़ के सबसे नीचले तबक़े के वोटर्स सबसे ज़्यादा बढ़ चढ़ कर चुनावो मेँ भागीदारी करते हैँ। भले  ही आज मीडिया इन चुनावोँ को राजनीति दल, नेताओँ और नतीजोँ के बीच ही संभालता रहे लेकिन आज का मतदाता अपनी ताक़त पहचान चुका है, वो अब ये समझ चुका है कि सबसे अहम हथियार उसके पास है और वो हे उसका मत। और अगर वो मतदान एक दिन वोट डालने नहीँ जाता है तो ना तो इन चुनावोँ का कोई मायने रह जायेगा और ना ही हमारे लोकतंत्र का। वाह, मुबारक़ हो!!!  आखिर हम अपनी ताक़त पहचान चुके हैँ। आज हमारा मतदाता हमेँ यही समझाना चाहता है कि उसे अपने फैसलोँ के लिये किसी ''Father Frazer Mascarenhas'' के समझाइश की कोई ज़रुरत नहीँ है। अपने बारे मेँ फैसले लेने मेँ वो सक्षम है।

अच्छा तो फिर ये बताईये, आखिर आज ये नौबत आई ही कैसे कि हमारे इन तथाकथित 'पालनहारोँ' की नज़रोँ मेँ हम इतने बेवकूफ़ हो गये हैँ कि उन्हेँ हमारे दिमाग को काबू मेँ करने के लिये इतने सारे प्रपंचो का सहारा लेना पड़ रहा है? जी हाँ, आज ये सभी जनता को बेवकूफ ही समझ रहे हैँ। अब भी वक़्त है अगर हम सभी चाहेँ तो इन सभी नेताओँ और पार्टीयोँ को अपनी ताक़त का एहसास बेहतर तरिके से करा सकते हैँ। हमेँ किसी आज़म ख़ान, अमित शाह, शाज़िया इल्मी, गिरीराज सिँह या फिर किसी तोगड़िया की कोई ज़रुरत नही है, आखिर बुद्धी और ताक़त का ठेका इन सबने नहीँ लिया हुआ है। जनता के पैरोकार बनने की इन्हेँ कोई ज़रुरत नहीँ है। जनता अपना भला बूरा बखूबी समझ सकती है।

गान्धी और मोदी खेमे के Supporters अपने अपने उम्मीदवार को महान दिखाने मेँ जम कर जुटे हुए हैँ। और इसके लिये इन्हेँ एक दूसरे के character assassination से भी कोई गुरेज़ नहीँ है। जिन्हेँ 'नमो' से नफरत है उनके लिये मोदी का कम्युनल होना या उनकी निजी जीवन शैली पे सवाल उठाना सबसे बड़ा हथियार लगता है जिसे मोदी के विरुद्ध ब्रह्मास्त्र के रूप मेँ प्रयोग मेँ लाया जाता है। राहुल या 'रागा' विरोधी खेमे को उनके बचकानेपन का मखौल उड़ाने मेँ कोई शर्म नहीँ आती है। लेकिन इन सभी कारगुज़ारियोँ मेँ ये लोग ये भूल जाते हैँ कि जनता क़तई तौर पर बेवकूफ़ नही है। जनता भी अपने कान, और आंख खुली रखती है। और उम्मीदवार के काम और अनुभव के मद्देनज़र वो अपने लिये सबसे बेहतर उमीदवार चुनना जानती है। वो जानती है कि कौन है जो देश को बेहतर भविष्य दे सकता है और उसे ये भी मालुम है कि परस्पर विरोधी दल एक दूसरे को सिर्फ इसीलिये नीचा दिखा रहे हैँ ताकि वोटर्स को लुभा सकेँ। जनता को मोदी के good governance,विकास और बेहतर काम के तरिकोँ का भी पता है और वो ये भी जानती है कि राहुल गान्धी के सेक्युलर भारत का नक्शा कैसा होगा। इसीलिये अब पब्लिक को नो उल्लू बनाविंग!!!

आज 24 अप्रेल के दिन मोदी जी बनारस से अपने नामांकन का पर्चा दाखिल करने जायेंगे। दिन भर आज यही चर्चा का एक अहम मुद्दा रहेगा। लेकिन एक बात समझ नहीँ आती है कि अगर मोदी अपने आपको अगले प्रधानमंत्री के रूप मेँ देखने मेँ इतने  confident हैँ तो, उन्हेँ या उनके समर्थको को अरविन्द केजरीवाल जैसे नौसिखये नेता से इतना डरने या परेशान होने की क्या ज़रुरत है? अगर वो जानते हैँ कि 7 रेसकोर्स रॉड के अगले मालिक वो ही होंगे तो उन्हेँ इस तरह केजरीवाल की रैलियोँ और कैम्पैन के दौरान हंगामा मचाने की क्या आवश्यकता है? अजी, खुद पर और अपने काम पर भरोसा रखिये, जनता सब देख और परख रही है।

बहरहाल, लगता है कि अब मैँ अपने मुद्दे से यहाँ भटक रही हूँ...मैँ तो सिर्फ यही बताना और साबित करना चाहती हूँँ कि इस बार चुनाव किस दौर मेँ पहुंच चुके हैँ। किस किस तरिके से जनता की भावनाओँ और दिमाग के साथ खेला जा रहा है।आखिर ये किस किस्म की राजनीति है? लेकिन फिर भी मैँ यही दुआ करुंगी कि जब 16 मई के बाद देश को एक नई और चुनी हुई सरकार मिले तो वो देश के लिये एक नई सुबह लेकर आये जिसमेँ देश का भविष्य और उजला और संवरा नज़र आये। विपक्ष मेँ चाहे कोई भी बैठा हो, लेकिन वो बस ज़िम्मेदार हो जो सरकार को हर मोड़ पर सही और गलत की पहचान कराये और एक दूसरे की कमज़ोरी गिनाने और किचड़ उछालने के बजाये एक ज़िम्मेदार विरोधी बन कर उभरे ताकि हम सभी को एक उज्जवल और विकसित देश मिल सके। आमीन!

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 सोनाली बोस,

लेखिका सोनाली बोस  वरिष्ठ पत्रकार है , उप सम्पादक – अंतराष्ट्रीय समाचार एवम विचार निगम -

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Bhushan Kumar, says on October 4, 2014, 9:19 AM

“Great, thanks for sharing this article post.Really thank you! Really Great.”