Sunday, October 20th, 2019
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यह क्रूरता के अद्भुत साधारणीकरण का समय है

आई एन वी सी न्यूज़

नई दिल्ली  , यह सूचना का युग है लेकिन सूचना का विस्फोट ज्ञान का प्रसार है या नहीं इसमें संदेह है। हमारे समय में तर्क और विवेक का संकुचन हुआ है। सवाल पूछने में संकोच का अहोना इस संकुचन का लक्षण है। तर्क और विवेक के घटने से इंसानियत में भी कमी आई है। ऐसे समय में कबीर को पढ़ना उस मर्म को जानना है जिसे हम भूलते जा रहे हैं। सुप्रसिद्ध आलोचक और भक्ति साहित्य के विद्वान प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल ने ' हमारे समय में कबीर' विषय पर अपने व्याख्यान में कहा कि विवेक के प्रत्यावर्तन के इस समय में कबीर को याद करना आवश्यक है क्योंकि कबीर केवल अपने समय के पांखण्डियों -सत्ताधारियों की खिल्ली नहीं उड़ाते अपितु उनकी कविता किसी भी समय के पाखंड और सत्ता की निरंकुशता के खिलाफ है। प्रो अग्रवाल ने पोस्ट ट्रुथ के मुहावरे को सत्यातीत बताते हुए कहा कि यह ऐसा समय है जब दिल पत्थर का हो गया है और भावनाएं अद्भुत कोमल हो गई हैं। उन्होंने इसे आहत भावनाओं का समय बताते हुए कहा कि कबीर को धर्म के प्रचलित अर्थ की चिंता नहीं थी और यही नहीं उनकी भक्ति भी परम्परा से चली आ रही भक्ति से भिन्न है। उन्होंने कहा कि वास्तविक भक्ति विवेक के समर्पण में नहीं है। प्रो अग्रवाल ने कबीर को मूलत: तर्क और विवेक की संवेदना का कवि बताते हुए कहा कि कबीर की आलोचना का आधार अनुभव सिद्ध ज्ञान है जो उपलब्ध ज्ञान से असहमति दर्शाते हुए आई है। प्रो अग्रवाल ने कबीर के समय की चर्चा करते हुए उसे मध्यकाल मानने से इंकार करते हुए कहा कि उस समय भारत में व्यक्ति सत्ता का सम्मान होने लगा था वहीं हमारे समय में प्रबोधन के प्रधान मूल्यों का तेजी से क्षरण होना चिंता का विषय है। हमारे समय की व्यक्ति सत्ता को उन्होंने मनुष्य विरोधी ठहराते हुए कहा कि जब हमें दूसरे मनुष्य की जरूरत ही नहीं है तो दूसरे मनुष्य का दर्द भी हमारे पास नहीं पहुँच सकता। उन्होंने इसे ही विवेक के लौटने और भावनाओं के हावी होने का समय बताया। व्याख्यान के बाद युवा विद्यार्थियों से सवाल -जवाब सत्र में एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि पंजाब या दुनिया में कहीं भी ईश निंदा जैसे कानूनों का विरोध होना चाहिए क्योंकि ईश्वर भक्ति के सिद्धांतों के आधार पर ही यह कानून उचित नहीं है। देशप्रेम और राष्ट्रविरोधी नारों के सम्बन्ध में पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि देश के कानून में हम सबको भरोसा रखना चाहिए जिसमें ऐसे किसी भी अपराध के लिए सजा के प्रावधान हैं। उन्होंने कहा कि देशप्रेम बहुत बड़ी और गहरी भावना है जिसे हलके नारों और खेलों में हार-जीत से जोड़ देना नासमझी है। इससे पहले विभाग के सह आचार्य डॉ रामेश्वर राय ने दीपक सिन्हा से जुडी यादों को साझा किया और एक अध्यापक तथा मनुष्य के रूप में दीपक सिन्हा की असाधारणता की चर्चा की।  डॉ बिमलेन्दु तीर्थंकर ने पौधा भेंटकर प्रो अग्रवाल का स्वागत किया वहीं अंत में डॉ पलव ने स्मृति चिन्ह के तौर पर कलाकृति भेंट की। आयोजन में विभाग की प्रभारी डॉ रचना सिंह और अध्यापकों डॉ अभय रंजन, डॉ हरींद्र कुमार सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी तथा शोधार्थी उपस्थित थे। अंत में संयोजन कर रहे बी ए प्रतिष्ठा के विद्यार्थी सौरभ सिंह ने सभी का आभार व्यक्त किया। दीपक सिन्हा व्याख्यान के आयोजन के साथ प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल ने महाविद्यालय के भरतराम सेंटर में राजकमल प्रकाशन समूह द्वारा लगाईं गई पुस्तक प्रदर्शनी का उद्घाटन भी किया। यह प्रदर्शनी 28 सितम्बर तक चलेगी। प्रदर्शनी के संयोजक आमोद महेश्वरी ने बताया कि लगभग एक हजार पुस्तकों की इस प्रदर्शनी में साहित्य, भाषा और विद्यार्थियों के लिए उपयोगी विषयों की मानक किताबें प्रदर्शित की जा रही हैं।



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