Monday, July 13th, 2020

मोदी के राजनीतिक धर्म की धरा पर विपक्षी राजनीति के सारे तिलिस्म ध्वस्त

- डॉ डीपी शर्मा - 
 
घनघोर संकटों से जूझती भारत की जनता में विश्वास के बीज, मोदी की मोहक मुद्रा और  राजनैतिक धर्म के भाषण से निकलते हैं जिनका तोड़ आज भी भारतीय लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक पार्टी के पास नहीं है । यही वह विश्वास है जो रोजगार खोकर, भूखा रहकर, संकटों को झेल कर भी भारत की जनता को बिना किसी विद्रोह के मोदी के साथ खड़ा कर देता है। यही विश्वास और ईमानदारी का फलसफा मोदी की राजनीतिक कुशलता एवं जनता के विश्वास को दर्शाता है।

यह लोगों को आश्चर्यचकित करता है कि आखिर मोदी ने अपने संकटमोचन भारतीय भाषणों में ना तो किसी प्रवासी संकट और ना ही रोजगार के नुकसान को स्वीकार किया परंतु फिर भी भारत की जनता बिना किसी गुस्से एवं विद्रोह के केवल खामोश है, उसके साथ खड़ी है।

विपक्ष के तर्क और कुतर्क एवं सामाजिक मीडिया पर सच और झूठ के बवंडरों के बावजूद भी ऐसा लगता है कि सब कुछ स्थिर सा है।

यदि नरेंद्र मोदी एक सामान्य राजनीतिज्ञ होते, तो प्रधानमंत्री होते हुए भी उनकी लोकप्रियता आज देश और दुनिया में उच्चिष्टता के इस शिखर पर नहीं होती । एक सर्वेक्षण के मुताबिक, तीन में से दो कामकाजी भारतीयों को 24 मार्च को घोषित देश-व्यापी लॉकडाउन के कारण अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है। परिणामी यह हुआ कि दो महीने से अधिक समय के लिए एक प्रवासी संकट को दूर करने में सरकार पूर्ण रूप से सफल नहीं रही और विपक्ष ने येन केन प्रकारेण सारे जतन किए कि जनता सड़क पर आ जाए मगर विश्वास के तरकश से निकले हुए मोदी के शब्द वाण इन सभी हमलावरी तीरों पर भारी पड़े।

ऐसा देखने में आया कि लॉकडाउन के बाद से आधे भारतीय परिवारों ने मोदी के बिना आवाहन के अपने भोजन की संख्या कम कर दी है। फिर भी, आश्चर्यजनक रूप से, मोदी के साथ कोई गुस्सा नहीं है, जो हमेशा की तरह उनकी प्रखर होती छवि एवं लोकप्रियता को दर्शाता है।

वर्तमान माहौल में यह बात कई लोगों को अचंभित कर सकती है कि जब मोदी ने 12 मई को राष्ट्र को संबोधित किया, तो उन्होंने प्रवासी संकट को एक बार भी स्वीकार नहीं किया, और केवल उनके प्रति सहानुभूति व्यक्त अपने संबोधन में आगे बढ़ गए। उन्होंने नौकरियों की भी अभूतपूर्व हानि, आवश्यक वस्तुओं खाद्यान्न की पुरानी कमी को ना तो स्वीकार किया, और न ही सरासर हताशा का माहौल जैसा कुछ भी मंजर स्वीकार देश में महसूस होने दिया। पूरे भाषण में प्रधानमंत्री मोदी एक स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की तरह सामान्य  मुद्रा में अपने राष्ट्रीय भाषण को शुरू से आखिर तक सहजता के साथ नजर आए। अपने सभी निर्णयों के साथ में मजबूती के साथ खड़े रहते हुए जिस प्रकार उन्होंने 2016 में विमुद्रीकरण के कारण आजीविका के थोडे नुकसान मगर ज्यादा बवंडर को स्वीकार नहीं किया, यह उनकी राजनीतिक परिपक्वता एवं सूझबूझ के साथ विपक्ष के बिखराव एवं स्पष्ट राजनीतिक दशा एवं दिशा की कमी को दर्शाता है।

तब सवाल उठता है कि आखिर क्यों बड़े पैमाने पर पीड़ित जनता के बाद भी मोदी को कोई राजनीतिक चुनौती का सामना क्यों नहीं करना पड़ता है? आखिर क्यों विपक्ष के प्रहार एवं सामाजिक मीडिया पर तर्क, कुतर्क के महासमर के बीच भी न वह अभिमानी, न पहुंच से बाहर, या ज्यादातर लोगों के प्रति उपेक्षा रखने वाले व्यक्ति के रूप में नजर नहीं आते है? यहां तक कि कभी कभार राजनीतिक मजबूरियों के चलते वह सचेत रूप से जनता के दुखों को नजरअंदाज भी करते नजर आते हैं।

यूं तो मोदी का अपना एक अलग ही निराला स्टाइल है जिसमें वह सामान्य राजनीतिक एकांकी विश्लेषक के रूप में काम करते हैं। इस बात को यूं कह सकते हैं कि उनकी अपील केवल राजनीतिक नहीं होती बल्कि धार्मिक नैतिक एवं पारिवारिक शब्दों एवं संवेदनाओं से भरी होती है। कभी कभी तो मोदी की अपील अर्ध-धार्मिक या अर्ध राजनीतिक भी नजर आती है । जाने-माने राजनीतिक वैज्ञानिक विश्लेषक मॉरिस जोन्स ने भारतीय राजनीति के लिए ‘साधु मुहावरे’ का इस्तेमाल किया था और यह आज मोदी पर सही तरीके से लागू होता हुआ नजर आता है कि "मोदी स्व-घोषित एक फकीर है, जो परिवार और भौतिक संपत्ति के लिए अनासक्त भाव से काम करता है। वह भारत को न केवल राजनीतिक रूप से, बल्कि सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक रूप से विश्व का नेतृत्व कराने के लिए राजनीति में आया है। यही कारण है कि वह केवल राजनीतिक आशक्ति एवं विश्वास ही नहीं, वल्कि भक्ति का भाव उत्पन्न करता है । यही भाव सामान्य से लेकर अति प्रतिष्ठित जनता के समूह तक उसकी हर बात पर विश्वास करने के लिए मजबूर करता है और उसके साथ खड़े रहने के लिए प्रतिबद्ध करता है। विपक्ष के बहुआयामी प्रहारों  के बीच भी यह भक्ति भाव उसकी सरकार के प्रदर्शन के लिए सबसे बड़ी प्रतिरक्षा का कवच बना हुआ है जो उसकी नेतृत्व क्षमता को फौलादी बनाता है, अभेद्य बनाता है।
आज मोदी के प्रति लोगों का विश्वास इतना दृढ है कि पीड़ितों को अपनी पीड़ा इसलिए नजर नहीं आती क्योंकि उनके पास रक्षा एवं विकास का विश्वास है जो दिग्भ्रमित विपक्ष एवं बिखराव  की पगडंडियों पर घूमते नेताओं के साथ नदारद नजर आता है।

ऐसा माना जाता है कि जब आप पीड़ित होते हैं, तो अपने पथ प्रदर्शक मसीहा को बर्खास्त नहीं करते, दरकिनार नहीं करते ठीक उसी प्रकार से जैसे भगवान को ना तो दरकिनार किया जा सकता और ना ही बर्खास्त सिर्फ विश्वास की डोर से अच्छे दिन के इंतजार में धैर्य को धारण करते हुए खामोश ही रहा जा सकता है।

 हाथों में आप अपने विश्वास को दोगुना करते हैं, क्योंकि भगवान आपको बताता है कि आपका दुख एक नियति के कारण है, जिसे टाला नहीं जा सकता अर्थात कम किया जा सकता है यदि धैर्य को धारण करते रहे। यह माना जाता है कि मोक्ष की दिशा में कांटेदार मार्ग तो होंगे ही मगर भगवान है तो विश्वास रखिए इन संकटों और कष्टों का वक्त गुजरने वाला है। एक बार जब मोदी ने दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों की पीड़ा का उल्लेख किया, तो उन्होंने इसे 'तपस्या' कहा - जो भविष्य की बेहतरी के लिए है, ठीक उसी तरह जैसे उन्होंने अपने विमुद्रीकरण के कदम को "भ्रष्टाचार के खिलाफ यज्ञ" के रूप में वर्णित किया था। जब उन्होंने 14 अप्रैल को पहला लॉकडाउन बढ़ाया, तो उन्होंने 'बलिदान' और 'तपस्या’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए जनता को इस के लिए तैयार रहने एवं आत्मसात करने का मंत्र दिया। ठीक उसी प्रकार जैसे गांधी लोगों को बताया करते थे कि भारत बलिदान और आत्म शुद्धि के माध्यम से स्वतंत्रता प्राप्त करेगा, जो सत्याग्रह का आधार था। मोदी ने लोगों से कहा कि वह अपने बलिदान और तपस्या के आधार पर 'आत्मनिर्भर राष्ट्र' का निर्माण करेंगे। अभी हाल का भरकम आर्थिक पैकेज एवं राष्ट्र के नाम एक नया संदेश इस बात को पूर्ण रूप से फलीभूत करता है कि देश अब नई दिशा में आगे बढ़ चुका है। ‌

यही कारण है कि उन्होंने भारत की प्राचीन महानता के आह्वान के साथ अपना भाषण शुरू किया।

वह कहते हैं कि "वह देश जो महान था, वह देश जो महान है, वह देश जिसे महान बनाना है, मेरे अकेले दम पर नहीं बल्कि पूरे सवा सौ करोड़ देशवासियों के दम पर।"
हकीकत के धरातल पर क्या होगा और क्या नहीं होगा ? यह तो वक्त एवं भगवान के बस की बात है परंतु देश के प्रति समर्पण एवं अर्पण का यह भाव और सबको साथ लेकर एक साथ जोड़ने की ललक ही मोदी को अजेय एवं अभेद्य भारतीय राजनीति के किले का बादशाह बनाता है।

यूं कह सकते हैं कि आज मोदी निश्चित रूप से भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के नैतिक ब्रह्मांड में मसीहा बन चुके हैं। यद्यपि इस ब्रह्मांड में, भारत उस वक्त भी महान था, तब हमारे पास "800 साल की गुलामी" थी। वे आगे कहते हैं कि आजादी के बाद की गुलाम मानसिकता आज भी हमारे मनो मस्तिष्क पर हावी है। हमें इसको पूर्ण रूप से त्यागना होगा, तभी हम भारत को एक महानता के शिखर की तरफ ले जाते हुए विश्व गुरु भारत बना सकते हैं । यही नहीं वह अव्यक्त रूप में यह सहजता के साथ व्यक्त कर देते हैं कि इसी प्रयोजनार्थ तो वे भारतीय राजनीति में आए हैं और अपना मिशन पूरा करने के बाद ही वन गमन करेंगे, सन्यास लेंगे।

मोदी कहते हैं कि कोरोनोवायरस केवल एक संकट नहीं है बल्कि ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक चुनौती एवं भारत को विश्व गुरु बनाने का एक अवसर है। जिस वैचारिक ढांचे में दुनिया के अन्य नेता आज भारत के संकट मोचन उपायों को रखते हैं; वे सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भारत को एक महान राष्ट्र के रूप में संस्थापित करते हुए भविष्य की पुनर्जीवित राजनीतिक, तकनीकी एवं आर्थिक शक्तियों में एक नया उच्चतम स्थान प्रदान करते हैं। यही तो मोदी भारत के लिए अपने दृष्टिकोण को पूरा करने के लिए यह एक 'अवसर' समझते है।

यद्यपि दुनिया के दृष्टिकोण में बने इस ढांचे में, लोगों की पीड़ा, निंदा व  विश्वास का परीक्षण अभी भी होना है। राष्ट्र में लोगों का विश्वास, और मोदी के नेतृत्व में आशा की किरण कोई अकारण नहीं है कि बहुत से हताश लोग इस विश्वास में जकड़ जाएंगे और निराशा के लिए आत्महत्या करने के बजाय वे उनके दुख को धार्मिक एवं नैतिक अर्थ देने लगेंगे । मोदी ने उनसे आह्वान किया कि वे इस दुख को पार करने के लिए आत्महत्या की सोच से परे देश के साथ खड़े रहें, और तेजी से विकराल रूप से अस्तित्व में आई इस कोरोना महामारी को हराकर अपने परिवार, राज्य, राष्ट्र एवं विश्व को एक नए संदेश के साथ विजेता के रूप में अपनी पहचान कायम करें। उन्होंने कहा कि दुख मानवीय विश्वास को मजबूत करता है, इसे कमजोर नहीं करता। उन्होंने इस विश्वास को हाल ही में अपने अनुष्ठानों के माध्यम से अधिकांश भारतीय जनमानस से स्वीकार भी करवाया जो थाली और दीया के रूप में एक ऐतिहासिक नजीर पेश कर गया। मोदी ने एक युगपुरुष या मसीहा की तरह लोगों को सात प्रतिज्ञाएँ भी दीं, जिनमें ’बुजुर्गों की देखभाल’, गरीब लोगों की सहायता करना और अपने कार्यकर्ताओं के प्रति दयालुता दिखाना भी ’शामिल था। इस बीच, उन्होंने लाखों लोगों द्वारा देखे गए योग करते हुए अपने स्वयं के एनिमेटेड वीडियो भी जारी किए, ताकि लोग उनको सामान्य मनुष्य के रूप में देखते हुए अनुसरण कर सकें। इन उपायों के माध्यम से, वह भारत के सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक नेतृत्व के लिए अपने दावों मजबूत करते हुए इस रूप में खड़े नजर आए कि यही एकमात्र ऐसे योद्धा है जिनके सामने भारत को आज इस संकट की घड़ी में और कोई टक्कर नहीं दे सकता।
खूबियों के कारण मोदी आज एक व्यक्ति या प्रधानमंत्री नहीं रहे बल्कि वह भारत की जनता के हृदय में मोदी विचार के रूप में संस्थापित हो गये हैं।

घिरी है आज तूफानों में विपक्षी झूठ की ये कश्ती,
इसे मिलता है जाकर कब किनारा देखना ये है।

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परिचय - :
डॉ डीपी शर्मा
परामर्शक/ सलाहकार
 
अंतरराष्ट्रीय परामर्शक/ सलाहकार
यूनाइटेड नेशंस अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन
नेशनल ब्रांड एंबेसडर, स्वच्छ भारत अभियान
 
 
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