श्रीमती कामा मंच पर गयीं और बोली- ‘मेरे देश की परिपाटी है, अपने राष्ट्रध्वज तले बोलना। खेद है कि इस समय मेरे पास देश का अपना झंडा नहीं है। पर कोई बात नहीं।क्षणभर में उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़ा और उसे झंडे के प्रतीक स्वरूप लहराते हुए कहा-‘‘यह है मेरे राष्ट्र की पताका, इसे प्रणाम करो।’’ ‘लांग लीव इंडयाके घोष से वह अंतर्राष्ट्रीय मंच गूंज उठा। मैडम  कामा ने आहृवान किया-‘‘भारतवासियों उठो और अत्याचार  के विरूद्ध सिर ऊंचा कर, सीना तानकर खड़े हो जाओ।
भारत की बेटी मैडम  भीकाजी कामा वह नाम है, जिन्होंने लंदन में सर्वप्रथम राष्ट्रीय ध्वज फहराया। उन्होंने मात्र 24 वर्ष की आयु में ही स्वतंत्र चेतना की बागडोर संभाली और देशवासियों में स्वाभिमान जगाने का सजग प्रयत्न किया। अंगरेजों के शोषण के खिलाफ लड़ने के लिए भारतीयों के मृतप्राय आत्मसम्मान को झकझोरा। ऐसे समय में जब स्त्रियों  को घर से बाहर निकलना दूभर था, रूढ़ीवादिता पैर पसारे थी, जब उन्होंने जाति धर्म-सप्रदाय के भेदभाव से परे स्त्री संस्थाओं को संगठित कियां महिलाओं को निपट, निर्धन, आभावग्रस्त जीवन से निकाल विकास पथ पर चलने का मार्ग प्रशस्त किया। देश की चेतना के बीज रोपित कर प्रेरणापुंज मैडम  कामा ने 35वर्षों तक लंदन, पेरिस, जेनेवा, वियना बर्लिन आदि स्थानों में अपनी प्रखर वाणी से विश्व जनमत एकत्र कर आंदोलनकारियों की पीढ़ी को प्रेरित किया। यह इस भारतीय बाला की अद्भूत नेतृत्व क्षमता थी कि उन्होंने देश में ही नहीं विदेशों में भी लगभग चार दशक तक प्रांति आंदोलन का पथ प्रदर्शन किया। उनकी देशभक्ति की अलख ने प्रांति के प्रकाशपुंज वीर सावरकर,लाला हरदयाल, श्यामजी कृष्ण वर्मा आदि की महान योजनाओं को प्रेरणा दी।
मुंबई के पारसी परिवार में जन्मी भीकाजी कामा की शिक्षा एलेग्जेंड्रिया गर्ल्स स्कूल में हुई। यहां शिक्षित करने का मूल उद्देश्य था-कामा को पश्चिमी संस्कृति में ढालना। परंतु भारत की यह देशभव्त बेटी तो देश सेवा के लिए जन्मीं थी। तमाम सुख-सुविधाओं सम्पन्नता के बावजूद उन्होंने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि संवेदनशीलता से भारत का असली खाका पढ़ लिया। उन्होंने देश की गरीबी,शोषण अत्याचार को बखूबी समझा और तभी से अंग्रेजों के अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष करने का संकल्प भी ले लिया। जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सन् 1885 में स्थापना हुई, तो वह स्वतंत्रता का ताना-बाना बुनने लगी। कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में शीर्ष नेताओं की योजनाओं भाषणों से प्रभावित हो वे सप्रिय रूप से स्वाधीनता संग्राम से जुड़ गई और खुलकर कार्य करने लगीं।
हर तरफ कामा के विचारों की चर्चा छिड़ी हुई थी। महिलाओं का जागृति अभियान आकार लेने लगा। यह सब उनके पिता सोराबजी पटेल को कतई रास नहीं लगा। उन्होंने कामा को रोकने के लिए सन् 1885 में कस्तमजी कामा से उनका विवाह कर दिया। देश के लिए समर्पित नेत्री का सौभाग्य ही था कि श्री कामा ने आरंभ में उनके कार्य करने पर कोई बंदिश नहीं लगाई, लेकिन अंग्रेजी राज्य सभ्यता के प्रशंसक श्री कामा को अपनी पत्नी का स्वाधीनता आंदोलन के लिए सप्रिय अभियान रास नहीं आया, उन्होंने उन्हें रोकने का प्रयास किया, अपने ध्येय से ब्याह कर चुकी कामा कब रूकने वाली थीं। वह तो देश सेवा के लिए ही जन्मी थीं।  
दैनिक कलह मतभेदों ने कामा दंपत्ति के वैवाहिक जीवन को तोड़ दिया। उसी समय मुंबई में प्लेग फैला, कामा व्यक्तिगत उलझनों को छोड़ राहत कार्य पीड़ितों की सेवा में जी-जान से जुट गई। कार्य की अधिकता ने उनके स्वास्थ्य पर विपरीत असर डाला बीमार होने के कारण शरीर में कमजोरी दिनों-दिन बढ़ती गई। श्री कामा को विकल्प सूझा क्यों मैडम  को विदेश भेज दिया ताकि देश से बाहर अलग माहौल में वह राष्ट्रभक्ति के भाव से दूर हो जायेंगी। इस विचार से उन्होंने अपनी पत्नी को 1902 में इलाज के लिए इंग्लैंड भेज दिया।  
उन्होंने वीर सावरकर द्वारा 1908 में 1857 के प्रथम भारतीय स्वाधीनता संग्राम की स्वर्ण जयंती मनाये जाने के अवसर पर भरपूर सहयोग दिया, क्योंकि यही वह आयोजन था, जिसके द्वारा 1857 की प्रांति को अंग्रेजों द्वारा मात्रगदरकहे जाने की धारणा को मिटाकर इसे भारत के प्रथम मुक्ति संग्राम का नाम दिया गया। उसी समय वीर सावरकर द्वारा 1857 की प्रांति पर लिखी पुस्तक के प्रकाशन को रोक दिया गया, तब मैडम  कामा ने गुप्त रूप से इस पुस्तक को छपवाकर भारत भेजने का दायित्व अपने ऊपर लिया। इसी पुस्तक को लाला हरदयाल, भगतसिंह, सुभाषचंद्र बोस आदि प्रांतिकारियों ने पुन:मुद्रित भी किया। मैडम  कामा को एक बात की टीस हमेशा रही कि वीर सावरकर को गिरफ्तारी से बचाने की योजना सफल हो सकी।
सन् 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध आरंभ हुआ। इंग्लैंड युद्ध में व्यस्त था, तब कामा ने अपनी गतिविधियां बढ़ाई मर्सीलीज की सैनिक छावनी तक जा पहुंची। इस पर फ्रांस सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और युद्ध की समाप्ति (1918)तक कैद रखा। अब मैडम  कामा थक चुकी थीं। 35 वर्ष तक देश से बाहर रहकर भारतीय स्वाधीनता के लिए प्रांति युद्ध चलाने वाली स्वाभिमानी भारतीय बाला को अपने देश की याद सताने लगी। वह अपनी वृद्धावस्था अपनी धरती पर बिताना चाहती थी। ब्रिटिश सरकार ने कई शर्ते रखीं, जिनमें राजनीति आंदोलन में भाग लेना प्रमुख था। मैडम  कामा ने उन्हें स्वीकार कर लिया और नवंबर 1935 में वे स्वदेश लौट आई। मां भारती के आंचल में सिर्फ 8 माह बिताने के बाद ही 13 अगस्त 1936 को उन्होंने यह संसार त्याग दिया। PLC.