Sunday, October 20th, 2019
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मानवता के लिए खतरा है वैश्विक अतिवाद

– तनवीर जाफरी –

न्यूज़ीलैंड के क्राईस्टचर्च शहर में स्थित अलनूर मस्जिद में नमाज़ पढऩे वालों पर हुए हमले में 49 लोगों के मारे जाने के बाद न्यूज़ीलैंड जैसा शांतिप्रिय देश भी आतंक प्रभावित देशों की सूची में शामिल हो गया। बताया जाता है कि आस्ट्रेलिया निवासी 28 वर्षीय बे्रन्टन टैरन्ट नामक युवक ने पांच स्वचालित बंदूकों का इस्तेमाल करते हुए क्राईस्टचर्च की दो मस्जिदों में एक के बाद एक हमले किए तथा अपने माथे पर कैमरा लगाकर इस पूरे वीभत्स हत्याकांड का वीडियो फेसबुक व इंस्टाग्राम पर लाईव प्रसारित किया। पूरे विश्व में सभी धर्म व समुदाय के लोगों ने इस आतंकी घटना की कड़ी निंदा की है। स्वयं न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा अल्र्डर्न ने इस हमले को न केवल आतंकवादी हमला बताया बल्कि यह भी कहा कि यह दिन न्यूज़ीलैंड के इतिहास का सबसे काला दिन है। इसे देश के इतिहास का अब तक का सबसे घातक हमला भी बताया गया। उन्होंने कहा कि यह घटना हमें बताती है कि बुरे लोग हमेशा हमारे बीच मौजूद होते हैं और वह कभी भी ऐसे हमले कर सकते हैं। उन्होंने इस हमलावर को दक्षिणपंथी आतंकवादी बताया। न्यूज़ीलैंड में सरकारी इमारतों पर राष्ट्रीय ध्वज को आधा झुकाया गया तथा नगर में होने वाले अनेक खेल व मनोरंजन के कार्यक्रम रद्द कर दिए गए। न्यूज़ीलैंड प्रशासन ने मृतकों के कफन दफन में मुस्लिम समुदाय को पूरा सहयोग दिया। जहां पीडि़तों का इलाज हो रहा था उसके निकट बॉटेनिकल गार्डन की दीवार को मृतकों को श्रद्धासुमन अर्पित करने हेतु समर्पित किया गया। संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद्,लंदन के हाईट पार्क,ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी,हेलसिंकी के िफनलेडिया हॉल, आस्ट्रेलिया के पर्थ,बर्मिंघम तथा विश्व के अनेक स्थानों से मस्जिद में मारे गए लोगों के प्रति शोक सभा करने तथा उन्हें विभिन्न तरीकों से श्रद्धांजलि देने के समाचार प्राप्त हुए।

क्राईस्टचर्च में दो मस्जिदों पर हुए इस हमले के बाद एक बार फिर यह सोचने की ज़रूरत है कि आिखर अतिवादी व कट्टर विचारधारा किसी भी धर्म या नस्ल अथवा समुदाय के व्यक्ति को  मानसिक रूप से इतना विक्षिप्त कैसे बना देती है कि कोई अतिवादी व्यक्ति किसी भी धर्मस्थान पर तथा वहां मौजूद श्रद्धालुओं पर जानलेवा हमला करने पर आमादा हो जाता है? मस्जिद में नमाजि़यों पर हमले की यह कोई पहली घटना नहीं है। पाकिस्तान,सीरिया,इराक,भारत तथा और भी कई देशों में मस्जिद में नमाजि़यों पर हमले किए जा चुके हैं। सच तो यह है कि मस्जिदों व दरगाहों पर सबसे अधिक हमले स्वयं मुसलमानों के ही दूसरे समुदाय से संबंध रखने वाले अतिवादी गुटों द्वारा किए जाते रहे हैं। पाकिस्तान व अफगानिस्तान में शिया व अहमदिया समुदाय की मस्जिदें व इमामाबाड़े तो अक्सर अतिवादियों का निशाना बनते रहे हैं। इराक व सीरिया में तो कई ऐतिहासिक मकबरों को इन्हीं उग्रपंथियों द्वारा ध्वस्त कर दिया गया। दुनिया के कई देशों में ईसाई धर्म के आराधना स्थल चर्च को भी निशाना बनाया गया। ईसाई श्रद्धालुओं को मारा गया व चर्च की पवित्र इमारत को क्षतिग्रस्त किया गया। इसी प्रकार भारत में कई ऐतिहासिक मंदिर भी आतंकियों के निशाने पर रहे। इनमें अक्षरधाम मंदिर,रघुनाथ मंदिर,संकटमोचन वाराणसी जैसे देश के प्रमुख मंदिर शामिल हैं।

अतिवादियों द्वारा केवल धर्मस्थलों को ही निशाना नहीं बनाया जाता बल्कि कभी-कभी समाज को विभाजित करने वाले ऐसे लोगों के द्वारा विभिन्न धर्मों के धर्मग्रंथों को भी जलाया,फाड़ा व अपमानित किया जाता है। ऐसी घटनाएं अतिवादियों की सोच तथा उनकी शिक्षा के प्रति निश्चित रूप से सवाल खड़ा करती हैं। उदाहरण के तौर पर इस्लाम के बारे में गत् 1450 वर्षों से यही कहा व सुना जाता रहा है कि इस्लाम शांति,प्रेम,सद्भाव,समानता तथा भाईचारे का संदेश देने वाला धर्म है। परंतु जब स्वयं को इस्लामपरस्त कहने का दावा करने वाले लोग ही मस्जिदों में नमाजि़यों पर हमले करने लगें,बेगुनाह लोगों को जुलूसों व दरगाहों में कत्ल करने लगें,मंदिरों व गिरिजाघरों में मानवता की हत्या करने लगें तो यह सवाल पूछना स्वभाविक है कि क्या इन अतिवादियों ने इस्लाम से यही शिक्षा हासिल की है या फिर इन्हें गलत तरीके से शिक्षित किया गया है? वीभत्स सामूहिक हत्याकांड के वीडियो प्रसारित किए जाने का सिलसिला भी धर्म के स्वयंभू ठेकेदार आईएसआईएस द्वारा ही शुरु किया गया था। इसी प्रकार हज़रत ईसा मानवता के इतने बड़े पक्षधर थे कि उनके नाम से मसीहाई शब्द विश्वविख्यात हो गया। अब यदि कोई आस्ट्रेलियाई ईसाई नागरिक न्यूज़ीलैंड में नमाजि़यों की सामूहिक हत्या कर डाले या कोई अमेरिकी नागरिक कुरान शरीफ जलाने का सार्वजनिक प्रदर्शन कर मुसलमानों की भावनाओं को आहत करने का प्रयास करे या ईसाईयत के नाम पर संसार में वर्ग संघर्ष छेडऩे या सर्वशक्तिमान बनने की साजि़श रची जाने लगे तो इसे कम से कम हज़रत ईसा व बाईबल की बताई हुई शिक्षाएं तो नहीं कहा जा सकता?

इसी तरह महात्मा बुद्ध को भी दुनिया में शांति के दूत के रूप में जाना जाता है। परंतु बर्मा में रोहिंग्या मुसलमानों के साथ गत् कुछ वर्षों से बुद्ध समाज के लोगों का जो हिंसक व्यवहार देखा व सुना जा रहा है वह महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं के अनुरूप हरगिज़ नहीं है। खबरों के मुताबिक बौद्ध भिक्षु,म्यांमार की सेना तथा वहां के प्रशासन व आम नागरिक सभी ने मिलकर गरीब रोहिंग्या मुसलमानों के साथ हर वह अत्याचार किया जोकि संभव था। परंतु इसके लिए निश्चित रूप से महात्मा बुद्ध को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। भारत में बहुसंख्यक समाज के लोगों द्वारा अल्पसंख्यकों के साथ इसी प्रकार के अत्याचार किए जाने की खबरें सुनाई देती हैं। हिंसक भीड़ द्वारा समुदाय विशेष के लोगों को कई बार निशाना बनाया गया। परंतु उपरोक्त सभी घटनाएं ऐसी हैं जिसमें किसी भी धर्म से जुड़े हुए समग्र समाज का निश्चित रूप से कोई दोष नहीं है। अब क्राईस्टचर्च में मस्जिद पर हुए हमले को ही देख लें। मारने वाला एक व्यक्ति भले ही ईसाई समुदाय का क्यों न रहा हो परंतु इस घटना से सबसे अधिक सदमा भी विश्व के ईसाई बाहुल्य देशों को ही पहुंचा है। स्वयं न्यूज़ीलैंड इस हादसे से बहुत सदमे में है। इसी प्रकार भारतवर्ष में यदि किसी अल्पसंख्यक या दलित समाज का कोई व्यक्ति किसी दक्षिणपंथी व अतिवादी भीड़ का निशाना बनता है तो यहां का बहुसंख्यक समाज ही सबसे पहले इस प्रकार की घटना के विरोध में खड़ा होता है।

कहने का तात्पर्य यह है कि निश्चित रूप से पूरा संसार तथा संसार की व्यवस्था उदारवादी व शांतिप्रिय लोगों के द्वारा ही संचालित हो रही है। परंतु यह भी सच है कि इस शांतिप्रिय संसार में पलीता लगाने का काम भी सभी धर्मों में मौजूद अतिवादियों द्वारा ही किया जा रहा है। यहां यह कहना भी गलत नहीं होगा कि इन मु_ीभर अतिवादियों की लगाम धर्मगुरुओं तथा पिछले दरवाज़े से राजनेताओं के हाथों में भी है। ऐसे में प्रत्येक देश,धर्म व समुदाय के लोगों का ही यह परम कर्तव्य है कि वे अपने-अपने क्षेत्र के ऐसे लोगों,ऐसी संस्थाओं तथा ऐसे संगठनों की पहचान करंे जिनका पेशा ही समाज में इसी प्रकार की नफरत फैलाना है। हमें वैश्विक समाज में ऐसी व्यवस्था कायम करने की ज़रूरत है जहां सभी धर्मों ेके लोग एक-दूसरे धर्म के लोगों की एक-दूसरे के धर्म से जुड़े धर्मस्थानों की तथा एक-दूसरे के धर्मग्रंथों की इज़्ज़त कर सकें। और यदि किसी को उसकी पूर्वाग्रही अतिवादी शिक्षा इसकी इजाज़त नहीं भी देती तो उसे कम से कम इस बात का तो कोई अधिकार नहीं हासिल है कि वह किसी दूसरे धर्मस्थान या धर्मग्र्रंथ को अपमानित कर सके। दरअसल इसी मानसिकता के वैश्विक अतिवादी पूरी मानवता व मानव सभ्यता के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो रहे हैं।

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About the Author
Tanveer Jafri
Columnist and Author

Tanveer Jafri, Former Member of Haryana Sahitya Academy (Shasi Parishad),is a writer & columnist based in Haryana, India.He is related with hundreds of most popular daily news papers, magazines & portals in India and abroad. Jafri, Almost writes in the field of communal harmony, world peace, anti communalism, anti terrorism, national integration, national & international politics etc.

He is a devoted social activist for world peace, unity, integrity & global brotherhood. Thousands articles of the author have been published in different newspapers, websites & news-portals throughout the world. He is also recipient of so many awards in the field of Communal Harmony & other social activities.

Contact – : Email – tjafri1@gmail.com –  Mob.- 098962-19228 & 094668-09228 , Address – Jaf Cottage – 1885/2, Ranjit Nagar,  Ambala City(Haryana)  Pin. 134003

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