Thursday, July 16th, 2020

महापुरुषों को बांटते यह कलयुग के संत

- तनवीर जाफरी -

भारतवर्ष की भूमि निश्चित रूप से इस बात पर गर्व करती है कि जितने महापुरुष,ऋषि-मुनि,संत-फकीर तथा अवतार इस पावन धरती पर आए उतने शायद दुनिया के किसी भी देश में नहीं हुए। इसीलिए भारतीय समाज लगभग सामूहिक रूप से इस बात को स्वीकार करता है कि अनेक प्रकार के राजनैतिक,सामाजिक,क्षेत्रीय,जातीय व सांप्रदायिक मतभेदों के बावजूद तथा स्वार्थपूर्ण एवं सत्ता केंद्रित राजनीति होने के बाद भी हमारा देश इन्हीं संतों-फकीरों व महापुरुषों के आशीर्वाद की बदौलत आगे बढ़ता जा रहा है। अन्यथा यदि देश के शासकों का वश चले तो यह लोग विभिन्न स्तरों पर देश के टुकड़े कर डालें। सवाल यह है कि आिखर इन महापुरुषों,संतों व फकीरों ने इस देश की घुट्टी में ऐसा क्या भर दिया जिसने हमको तमाम कोशिशों के बावजूद अब तक एक सूत्र में बांधा हुआ है। क्या वजह है कि अनेक िकस्म के राजनैतिक व जातिवादी,धार्मिक भूचाल आने के बावजूद हम एक सूत्र में बंधे हुए हैं। हमारे संतों की कौन सी शिक्षा हमें पहले इंसान और बाद में हिंदू या मुसलमान बनने की प्रेरणा देती है?

इस रहस्य को जानने के लिए हमें संत कबीर के जीवन पर नज़र डालनी होगी कि किस प्रकार एक मुस्लिम परिवार अर्थात् नीरू जुलाहे का पुत्र आदि शंकराचार्य रामानंदचार्य जी का शिष्य बना। और बाद में संत जगत में उसने अपनी ऐसी छाप छोड़ी जिसे आज तक मिटाया नहीं जा सका। हमें महान संत गुरू नानक देव जी के जीवन को देखना होगा जिन्होंने अपने साथ हमेशा  बाला व मर्दाना जैसे मुस्लिम फकीरों को अपने विश्वासपात्र सहयोगियों के रूप में रखा। इतना ही नहीं बल्कि पांचवें गुरू, गुरू अर्जन देव ने लाहौर के तत्कालीन महान संत साईं मियां मीर से 1589 में ऐतिहासिक स्वर्ण मंदिर की बुनियाद की ईंट रखवाई। शिरडी वाले साईं बाबा को ही देख लीजिए। इस बात पर शोध किए बिना कि साईं बाबा हिंदू थे या मुसलमान किस प्रकार भारतीय समाज का एक बड़ा हिस्सा उनके प्रति नतमस्तक व श्रद्धावान है कि बड़े-बड़े संतों-महंतों को उनकी वजह से अपनी ‘दुकानों’ पर खतरा मंडराता दिखाई देने लगा है। यही वजह है कि कलयुग के संतों ने साईं बाबा को भी उनके भक्तों से अलग करने का एक ज़बरदस्त हथकंडा अपनाया तथा इसके लिए बाकायदा अभियान भी चलाया। परंतु उनकी लोकप्रियता कम होने के बजाए और बढ़ गई। इस प्रकार के सैकड़ों उदाहरण भारतवर्ष में चारों ओर देखे जा सकते हैं जो महापुरुषों,ऋषियों-मुनियों,संतों,पीरों व फकीरों के उस वास्तविक रूप को हमारे समक्ष पेश करते हैं जिसने हमें एकता,प्रेम,सद्भाव,भाईचारा और मानवता का पाठ पढ़ाया।

भारतवर्ष में साहित्य जगत में एक मशहूर शिख्सयत कुंवर महेंद्र सिंह बेदी ‘सहर’ नाम की गुज़री है। मेरा सौभाग्य है कि मैंने अनेक बार उनको मुशायरों में सुना है। अपने-आप को गुरू नानक देव की सोलहवीं पुश्त का सदस्य बताने वाले ‘सहर’ साहब देश के प्रतिष्ठित आईएएस अधिकारी थे तथा भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के किसी भी देश के स्तरीय मुशायरों की रौनक समझे जाते थे। वे अपने कलाम के द्वारा वे अक्सर कहा करते थे कि कोई भी संत या महापुरुष किसी भी धर्म या जाति विशेष की विरासत नहीं हो सकता। वे महापुरुषों को मानवता के लिए कुदरत की ओर से दी जाने वाली एक ऐसी सौगात समझते थे जिसपर समस्त मानवजाति का समान अधिकार है। वे इस्लामी देशों में आयोजित मुशायरों में पूरे चुनौतीपूर्ण अंदाज़ में इस आशय की कुछ पंक्तियां अक्सर पढ़ा करते थे जो हज़रत मोहम्मद व हज़रत अली पर केवल मुसलमानों के एकाधिकार को चुनौती देने वाली होती थीं। जैसे-‘तू तो हर दीन के हर दौर के इंसान का है। कम कभी भी तेरी तौकीर न होने देंगे।। हम सलामत हैं ज़माने में तो इंशाअल्लाह। तुझको इक कौम की जागीर न होने देंगे’।। सहर साहब का इसी अंदाज़ का एक और कलाम-‘हम किसी दीन से हों कायल-ए-किरदार तो हैं। हम सनाख़्ाान-ए-शह-ए- हैदर-ए-कर्रार तो हैं।। नामलेवा हैं मोहम्मद के परस्तार तो हैं। यानी मजबूर पए अहमद-ए-मुख्तार तो हैं।। इश्क हो जाए किसी से कोई चारा तो नहीं। सिर्फ मुस्लिम का मोहम्मद पे इजारा तो नहीं।। ऐसे विचार केवल सहर साहब के ही नहीं थे बल्कि यदि आज भी आप पंजाब व हरियाणा में कहीं भी कुश्ती होते देखें तो अखाड़ों में उतरने वाला किसी भी धर्म का पहलवान या अली मदद कहकर अखाड़े में उतरता है।

अब आईए इसी संदर्भ में कलयुग के उन संतों के बोल भी याद करते चलें जो मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठने के बावजूद भोपाल,मध्यप्रदेश में अपनी सार्वजनिक सभाओं में यह कहता फिरा है कि-‘कांग्रेस अली को अपने पास रखे हमारे अर्थात् बीजेपी के पास बजरंग बली ही काफी हैं। इतना ही नहीं कि इस कथित राजनैतिक संत ने बजरंग बली को केवल हिंदू धर्म से ही नहीं जोड़ा बल्कि अलवर,राजस्थान में अपनी एक दूसरी चुनावी जनसभा में बजरंग बली को दलित,वंचित तथा वनवासी भी बता दिया। इसके बाद उत्तर प्रदेश में हनुमान जी को लेकर जिस प्रकार का जातिगत् तनाव पैदा हुआ वह भी किसी से छुपा नहीं है। जिन कुप्रयासों के तहत बजरंग बली व अली को अलग करने व उन्हें जातियों में बांटने का घिनौना खेल खेला गया उसका नतीजा भी इन्हीं महापुरुषों ने इन कलयुगी संतों को दिखा दिया। यहां यह बताने की भी ज़रूरत नहीं कि जहां एक ओर देश को मानवता के सूत्र में पिरोने वाले उपरोक्त अनेक संत सभी धर्मों व जातियों को एक समान समझते थे तथा सभी धर्मों व जातियों में मानवता के दर्शन करते थे वहीं अली व बजरंग बली को अलग-अलग धर्मों की संपत्ति बताने वाले यह वही संत हैं जो सार्वजनिक सभाओं में बड़े गर्व से यह कह चुके हैं कि तुम अगर एक को मारोगे तो हम सौ को मारेंगे। इन्हीं के सामने इन्हीं के मंच पर इनका कार्यकर्ता यह कह चुका है कि मुस्लिम औरतों के साथ कब्र से निकाल कर बलात्कार करना चाहिए। इनकी लोकप्रियता का पैमाना सिर्फ नफरत फैलाने और समाज को धर्म के नाम पर बांटने मात्र से ही निर्धारित होता है। मुगल सराय को दीन दयाल उपाध्याय नगर बनाना,इलाहाबाद को प्रयागराज,फैज़ाबाद को अयोध्या और इस प्रकार के और न जाने कैसे-कैसे वैमनस्यकारी कदम उठाना ही इनका एकमात्र राजनैनिक ध्येय है।

निश्चित रूप से हमारा देश इस समय भीषण संकटकालीन दौर से गुज़र रहा है। क्योंकि जो संत समाज को जोडऩे में व सद्भाव बढ़ाने में विश्वास करते थे आज दुर्भाग्यवश संत के बाने में ऐसी प्रवृति के लोगों ने शरण ले ली है जो वास्तव में संत कहलाने के योग्य ही नहीं हैं। देश व समाज को मानवता के हित में ऐसे संतों की ज़रूरत रही है जिन्होंने अनेक वैचारिक,धार्मिक मतभेदों के बावजूद एक साथ रहकर सत्संग किया है। वास्तविक संत किसी भी धर्म व जाति की न तो विरासत हो सकता है न ही कोई उस पर अपना एकाधिकार जमा सकता है। यदि कोई व्यक्ति अथवा स्वयंभू संत बजरंग बली को अपना और अली को दूसरे का बताने जैसा दुष्प्रयास करता है तो वह इन महापुरुषों की व्यापक लोकप्रियता व स्वीकार्यता को ही सीमित करने की कोशिश कर रहा है। और महापुरुषों को बांटने वाले स्वयंभू संतों को ऐसे ही नतीजों की उम्मीद भी करनी चाहिए जो गोरखपुर से लेकर फूलपुर और अब राजस्थान,मध्यप्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में देखने को मिले हैं।

_________________ About the Author
Tanveer Jafri
Columnist and Author

Tanveer Jafri, Former Member of Haryana Sahitya Academy (Shasi Parishad),is a writer & columnist based in Haryana, India.He is related with hundreds of most popular daily news papers, magazines & portals in India and abroad. Jafri, Almost writes in the field of communal harmony, world peace, anti communalism, anti terrorism, national integration, national & international politics etc.

He is a devoted social activist for world peace, unity, integrity & global brotherhood. Thousands articles of the author have been published in different newspapers, websites & news-portals throughout the world. He is also recipient of so many awards in the field of Communal Harmony & other social activities.

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