भाषा समाज और मीडिया*

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  दिलीप  कुमार **,,

लगभग 3,000 भाषाएँ मर रही हैँ. क्योंकि उन का समाज सिमट गया, बोलने वाले कम होते गए. उन का विकास रुद्ध हो गया. हमारे यहाँ ऐसा रुकाव सिमटाव संस्कृत मेँ आया था. परिणाम सामने है.

भाषा को तरह तरह से परिभाषित किया गया है. भाषा को हम समाज का संवादरत मस्तिष्क कह सकते हैँ. हम यह भी कह सकते हैँ कि भाषा हमारे मानव मात्र होने की पहचान है. वह हमेँ अन्य सभी जीवजातियोँ से अलग करती है. हमारे बुद्धि वैभव का विलास और रिकार्ड है. अमूर्त भावों के मूर्त रूपों का, प्रतीकोँ का अनंत भंडार है. हम कह सकते हैँ कि मानव ने, समाज ने, भाषा को अपने सब से शक्तिशाली उपकरण, औज़ार और हथियार के तौर पर गढ़ा है. कहा भी है जब तोप मुक़ाबिल हो – अख़बार निकालो! हम अपने आप को, समाज को और भाषा को हमेशा सँवारते और बदलते रहते हैँ. न समाज कोई मुर्दा बेजान पदार्थ होता है, न ही भाषा स्थिर अविचल अविकारी है. ये दोनों क़दम से क़दम मिला कर न बढ़ें तो आउट आफ़ डेट हो कर मर जाते हैँ.

भाषा का जन्म कभी लाखों साल पहले होना शुरू हुआ था. लेकिन भाषा को ले कर क्रांतिकारी घटनाएँ लगभग पचास हज़ार साल पहले शुरू हुईं. हमारे अतीतवादी लोग कोई भी राग अलापते रहेँ, लेकिन विज्ञान, विशेषकर नृविज्ञान, क्रमिक विकास और पुरातत्त्व से जो ठोस जानकारी हमेँ मिलती है, वह इस प्रकार है–

आधुनिक मानव जाति का आरंभ अफ़्रीका के घने जंगलोँ मेँ हुआ था. इस बात से उन्हेँ ठेस पहुँच सकती है जो भारत को मानव की जन्मस्थली मानते हैँ. ख़ैर, जब तक कोई विपरीत ठोस प्रमाण नहीँ मिलते हम अफ़्रीकी जंगलोँ को ही मानव का जन्मस्थल मानने को बाध्य हैँ. पचास हज़ार पहले एक क्रांतिकारी घटना घटी. विज्ञान की अनेक विधाओँ के पंडितों का मानना है कि तब अफ़्रीका के उत्तर-पूर्वी जंगलोँ मेँ 2,000 लोगोँ का एक समूह था जिस मेँ पेचीदा भाषा बनाने की क्षमता पैदा हुई. भाषा का उपकरण हाथ लगते ही यह समूह सुसंगठित हो कर सब से लड़ता जूझता, बड़े बड़े जानवरोँ का मार गिराता, प्रकृति पर नई विजयें प्राप्त करता संख्या और बल मेँ बढ़ता चला गया. उन्हीं दिनों इन्हीं मेँ से कुछ लोग नाव बनाने और खेने मेँ पारंगत हो गए. उन्हेँ पानी पर चलने के जूते अचानक मिल गए.

स्टैनफ़र्ड विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध भाषा इतिहासकार प्रोफ़ैसर जोसेफ़ ऐच ग्रीनबर्ग ने भाषाओँ मेँ शब्दों मेँ समानता के अध्ययन के आधार पर कहा है कि इन के बेड़े भारत के उत्तर पश्चिमी तट पर पहुँचे सिंधु के तट पर. यहाँ पनप कर इन के दल के दल पूरी दुनिया पर छा गए. (प्रागैतिहासिक नावों मेँ समुद्रोँ के भयानक थपेड़े खाते इन लोगोँ ने जो सागर पार किया उसे उसे आज अरब सागर कहते हैँ. पुराणों मेँ इसे वरुण सागर कहा गया है. झूले लाल के रूप मेँ सिंध मेँ आज तक इस की पूजा की जाती है. यह सागर पार करना इन वीरोँ के लिए भवसागर पार करने से कम नहीँ था. शायद यही कारण है कि हम जैसे तथाकथित थलवासियोँ के देश मेँ जीवन की परिकल्पना भवसागर के नाम से की गई है.)

प्रोफ़ैसर ग्रीनबर्ग का कहना है इन लोगोँ के कुछ दल कहीँ कहीँ रुकते रहे और कुछ आगे बढ़ते गए. ये दल एक दूसरे से कट कर धीरे धीरे बड़ी जातियाँ बनते गए. नृवंशियोँ के अनुसार इन के वंश अलग अलग हो गए. देशकाल ने इन की भाषाओँ को बदला और एक दूसरे से काट दिया. ये लोग कोई इतिहास का लेखाजोखा नहीँ रखते थे. समय के साथ अपने मूलस्थान को भूल कर ये नए देशों को अपना मूलस्थान मानने लगे. ऊपरी तौर पर आज मानव समूहोँ मेँ न कोई समानता नज़र आती है न एकता. हाँ, कई बड़े बड़े भाषा परिवार नज़र आते हैँ. भाषा परिवारोँ को हम नृवंशों के आधार पर अलग नहीँ कर सकते. आज सब से बड़ा भाषा परिवार भारोपीय या इंडोयूरोपियन भाषा परिवार है. प्रसंगवश इसी परिवार मेँ हिंदी भी आती है और अँगरेजी भी. इस तरह ये दोनों भाषाएँ सदियोँ पहले बिछुड़ी मौसेरी बहनें कही जा सकती हैँ.

पूरे संसार मेँ आज कितनी भाषाएँ जीवित हैँ, इस की कोई प्रामाणिक गिनती नहीँ है. सर्वाधिक प्रचलित आँकड़ोँ के अनुसार आज लगभग छह हज़ार भाषाएँ हैँ. आने वाले कुछ दशकोँ मेँ इन मेँ आधी मर जाएँगी. सब से ज़्यादा बोली जाने वाली 20 मेँ से छह भाषाएँ हमारे देश मेँ हैँ. ये हैँ–1. हिंदी. 2. बंगाली. 3. तेलुगु. 4. मराठी. 5. तमिल, और 6. पंजाबी…

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संवाद की, राजनय की और व्यापार की भाषा आज अँगरेजी है. अँगरेजी रोज़गार की, सामाजिक स्तर पर उन्नति की भाषा बनती जा रही है. हर तरफ़ इसे सीखने की कोशिश करने वालोँ की संख्या बढ़ती जा रही है. यह ट्रैंड भारत मेँ भी देखा जा सकता है. इस बढ़ते प्रचलन को लोग ग्लोबलन या भूमंडलीकरण के दुष्परिणाम की तरह पेश कर रहे हैँ और सांस्कृतिक दासता की निशानी बता रहे हैँ. लेकिन मैँ इसे इस नज़र से नहीँ देखता. 1947 से पहले हम लोग अँगरेजी को दासता की निशानी समझते थे. भाषाप्रेम के हमारे कई नारे अभी तक अँगरेजी के विरोध पर आज तक टिके हैँ. लेकिन अँगरेजोँ के जाने बाद अँगरेजी टिके रहने के कई महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक और वाणिज्यिक कारण हैँ. दुनिया को अपने दृष्टिकोण से देखने समझने के लिए, राष्ट्रीय समुदायोँ मेँ अपना स्थान बनाने के लिए हमारे लिए यह लाभप्रद भी है.

आज़ादी के तत्काल बाद के दौर मेँ हिंदी सहित हमारी भाषाएँ विशुद्धतावादी नीति अपनाती रहीँ. यह स्वभाविक था. ”भाषा ख़तरे मेँ” के निराशावादी उत्तेजक नारे लगाना आज फ़ैशन बन गया है. सच यह है कि समाज और भाषा कोई अजायबघर मेँ रखी मम्मियाँ नहीँ होते. वे सजीव इकाई होते हैँ. कोई भी समाज और भाषा विशुद्धतावादी नीति अपना कर अपने मेँ सिमटता रहेगा और धीरे धीरे आत्महत्या करता रहेगा. हम ने देखा कि आज लगभग 3,000 भाषाएँ मर रही हैँ. क्योंकि उन का समाज सिमट गया, बोलने वाले कम होते गए. उन का विकास रुद्ध हो गया. हमारे यहाँ ऐसा रुकाव सिमटाव संस्कृत मेँ आया था. परिणाम सामने है.

यह नहीँ है कि भारत की, संस्कृत भाषा की उपलब्धियाँ कम होँ. लेकिन तब वह हाथपैर फेंकती जीवित भाषा थी. आज संसार के भाषाविद मानते हैँ कि भाषा अध्ययन के क्षेत्र मेँ पहला काम भारत मेँ हुआ–ईसा से पाँच सदी पहले, यानी अब से ढाई हज़ार साल पहले–पाणिनी ने संस्कृत मेँ अष्टाध्यायी मेँ 3,959 नियम बना कर बड़ा काम किया. ईसा पूर्व तीसरी सदी मेँ थोटीकाप्पियार ने थोटाकाप्पियम नाम का महान तमिल व्याकरण लिखा. यदि और भी पहले जाएँ तो आज से 5,000 साल पहले प्रजापति कश्यप ने संसार का पहला विषयक्रम से संकलित थिसारस निघंटु बनाया. बाद मेँ महर्षि यास्क ने निरुक्त के ज़रिए संसार का पहला शब्दार्थ कोश और ऐनसाइक्लोपीडिया दिया. यही क्यों! संसार का पहला विषयक्रमानुसार संकलित बृहद थिसारस अमर कोश हमारे यहाँ छठी शताब्दी मेँ बना. और बाद मेँ अमीर खुसरो ने भारत मेँ ही संसार का पहला द्विभाषी थिसारस बनाया ख़ालिक बारी.

यह है हमारी जीवंत परंपरा. इसे जीवित रखते हुए ही अब हमेँ हिंदी मेँ आगे बढ़ना है. डर कर चूहोँ की तरह मेँ दुबक कर बिल मेँ अपने आप को बंद नहीँ करना है. हमेँ अपने दरवाज़े और खिड़कियाँ संसार की मुक्त हवाओँ के लिए खुले रखने हैँ.

हिंदी को कौन पूछता था?

जहाँ तक मीडिया का प्रश्न है, हमेँ इसी नीति पर आगे बढ़ना होगा. मीडिया शब्द मीडियम का बहुवचन है. यह शब्द अँगरेजी, संस्कृत और हिंदी के सगे संबंधी होने का एक और उदाहरण है. मीडियम और कुछ नहीँ हमारे शब्द माध्यम का अँगरेजी रूप है. माध्यम किसी चीज़ का कुछ भी हो सकता है. लेकिन मीडिया बन कर इस का अर्थ सीमित और विशिष्ट हो गया है–संचार माध्यमों की समष्टि, समग्रता… सिनेमा, पत्रपत्रिकाएँ, रेडियो, टीवी,… यहाँ तक कि हम ऐसऐमऐस तक को मीडिया मेँ गिन सकते हैँ जैसा कि अब उस का उपयोग गश्ती पत्रों और विज्ञापनों के साथ साथ चुनाव मेँ किया जाने लगा है. ये सब भाव/विचार/समाचार/सूचना संप्रेषण के सार्वजनिक माध्यम हैँ. इस क्षेत्र मेँ नवीनतम आगंतुक हैँ इंटरनैट, ब्लाग आदि…

जो सवाल आज हमारे समाज के, भाषा के सामने हैँ वही मीडिया के सामने भी हैँ. शुद्धतावादी चाहते हैँ कि वे अपने विशुद्ध भारतीय रूप मेँ रहेँ. लेकिन फिर वही सवाल उठता है–हमारे संदर्भ मेँ शुद्ध समाज, भाषा और मीडिया क्या हैँ? अगर पूरी तरह शुद्धता की बात करेँ तो देश का अस्तिव ही लुप्त हो जाएगा. हमारा शुद्ध देश क्या है? कब था? शुद्ध समाज क्या है? क्या उच्च वर्णोँ के द्विज? या शेष जनसंख्या भी इस मेँ आती है? सब को मिला कर देखेँ तो समाज की शुद्धता भ्रष्ट हो जाती है! सदियोँ तक हम ने ज्ञान विज्ञान को, शिक्षा को, अद्विजोँ से दूर रखा. शंबूकोँ का वध किया! आप को जान कर आश्चर्य होगा कि शुद्धतावादी युग मेँ संगीतकार नाट्यकर्मी आदि शूद्र थे! प्रमाण के तौर पर अमर कोश मेँ संगीतकारोँ की गिनती शूद्रोँ मेँ की गई है! बात को आगे बढ़ाएँ तो क्या सभी अहिंदू–पारसी, सिख, ईसाई, मुसलमान–सब के सब शुद्ध समाज के बाहर हैँ? हम ने देखा कि समाज की शुद्धता की बात एक पल मेँ धराशायी हो जाती है. आज ब्राह्मण, बनिए, क्षत्रिय शुद्ध हैँ? ये सब आप को जूते के कारख़ाने खोलते, सफ़ाई विभागोँ मेँ ऊँचे पदोँ पर मिलेँगे. कब तक हम पिछड़ोँ को उच्च शिक्षा से, सरकारी और निजी कंपनियोँ मेँ पदोँ से दूर रखने की चालाकी भरी तरक़ीबें और तर्क गढ़ते रहेँगे. कभी योग्यता की बात करेँगे, कभी शिक्षा माध्यमों को महँगा करने के तर्क निकालेँगे…

यूँ देखेँ तो हिंदी शब्द अपने आप मेँ अ-शुद्ध है. संस्कृत मेँ मिलता है कहीँ यह शब्द? संस्कृत से विकसित आज की भाषाएँ पुरानी शब्दावली मेँ भ्रष्ट, अपभ्रष्ट और पतित हैँ. तो यह हिंदी किधर से शुद्ध है? आज अगर हिंदी है तो दुनिया भर से नए से नए शब्द लेने की क्षमता के कारण है. हिंदी को नवसंस्कृत मेँ ढालने की रघुवीरी तदबीरेँ कभी की चित हो चुकी हैँ. आम आदमी ने उन्हेँ नज़रअंदाज़ कर दिया है. आम आदमी टेलिफ़ोन का अनुवाद दूरभाष करने के पचड़े मेँ क्यों पड़े! लैंडलाइन, मोबाइल, रिमोट के अनुवाद जब तक रटेगा, तब तक दस नई चीज़ें सामने आ जाएँगी…

आज हम नवीनतम ग्लोबलन के युग मेँ रहते हैँ. हम दुनिया से अछूते नहीँ रह सकते. जीवन बदल रहा है, तो समाज बदलेगा ही. नई तकनीक समाज को बदले बग़ैर नहीँ रह सकती. जब तक हमारे लोग दुनिया भर मेँ रह कर सुखसुविधाएँ भोग रहे हैँ, तो हम कैसे और कब तक भाषाओँ को, हिंदी को, आयातित शब्दों से दूर रखेँगे?

इसी तरह माध्यमों को इस प्रक्रिया दूर नहीँ रखा जा सकता. सिनेमा, अख़बार, मैगज़ीन, रेडियो, टीवी… सभी विदेशी देन हैँ. इसलिए वे म्लेच्छ बन जाते हैँ. पचास, साठ, सत्तर आदि दशकोँ मेँ हिंदी अख़बार अपने आप को आयातित शब्दों से बचा कर रखते थे. उन की विषय सूची मेँ कार, बाइक, नए कैरियर, इनकम टैक्स जैसी चीज़ें नहीँ होती थीं. परिणाम क्या था? वे कम पढ़े लिखे दुकानदारोँ और अँगरेजीदाँ अफ़सरोँ के नौकर बनने से आगे नहीँ बढ़ पाते थे. नौजवान पीढ़ी उन से दूर भागती थी. माधुरी के संपादक के रूप मेँ घर लौटते समय मेरे हाथ मेँ हिंदी पत्रिका देख कर बंबई मेँ नौजवान और बच्चे नाक भौँह चढ़ाते थे. मेरे छोड़ने के बाद माधुरी बहुत साल नहीँ चली. एक कारण था कि उस ने नई नौजवान पीढ़ी की माँगोँ को पूरा नहीँ किया. यही हाल सारिका, पराग, और धर्मयुग का हुआ… और तो और अँगरेजी साप्ताहिक इलस्ट्रेटिड वीकली भी इसी कमज़ोरी का शिकार बना.

भाषा के मामले मेँ यह ज़रूर कहा जा सकता है कि कई बार कई अख़बारोँ और टीवी मेँ गाहे बगाहे ज़बरदस्ती अँगरेजी शब्द भरे जा रहे हैँ. पर समाज मेँ, भाषा मेँ, मीडिया मेँ नए से नए फ़ैशन आते जाते रहते हैँ. समय की धार सब को काट देती है. मुझे विश्वास है कि और दस साल मेँ इन की भाषा नया संतुलन बना लेगी. कौन कह सकता है कि तब हिंदी का क्या रूप होगा?

हाँ, दावे के साथ मैँ यह कह सकता हूँ कि जिस तेज़ी से हिंदी बढ़ रही है, विकास कर रही है, और विकास करने के लिए बाध्य होती रहेगी, उसे देखते हुए 2050 तक वह संसार की तीन चार बड़ी भाषाओँ मेँ होगी.

हमारे पास संख्या बल है. हमारा बाज़ार विशाल है. अपनी बात कहने के लिए दुनिया को हमारे और हमारी भाषाओँ के पास आना ही होगा. इस लिए हमेँ डराऊ और निराशात्मक नारोँ से बचते हुए, आत्मविश्वास के भरपूर नई ग्लोबल दुनिया मेँ क़दम बढ़ाने के लिए तैयार रहना चाहिए.

और अंत मेँ एक चौंकाने वाली बात– इसे सुन कर अतीतवादी ख़ुशी से फूल उठेंगे.

विज्ञान की प्रसिद्ध पत्रिका साइंस मेँ डैविड ग्रैडोल (David Graddol) ने पिछले दिनों लिखा था : मातृभाषा के रूप मेँ अँगरेजी बोलने वालोँ की संख्या का अनुपात घटता जा रहा है. 1950 मेँ ये संसार की जनसंख्या का 9 (नौ) प्रतिशत थे, 2050 मेँ कुल 5 (पाँच) प्रतिशत रह जाएँगे और हिंदी वाली जनसंख्या से पिछड़ जाएँगे. ग्रैडोल ने यह भी कहा है कि यह सही है कि कंप्यूटर आदि क्षेत्रों मेँ अँगरेजी का बोलबाला है. पर यह भी उतना ही सही है कि यह विशिष्ट तरह की अँगरेजी है, सामान्य अँगरेजी नहीँ. बात यहाँ तक पहुँच चुकी है कि गोपनीयता बनाए रखने के लिए माइक्रोसाफ़्ट जैसी कंपनियाँ अपने शोध ग्रंथ चीनी भाषा मेँ लिखवा रही हैँ.

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*दिलीप  कुमार

*Disclaimer: The views expressed by the author in this feature are entirely his own and do not necessarily reflect the views of INVC

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