images (1){सोनाली बोस} ना जाने क्यूँ भारतीय प्रजातंत्र आज एक दोराहे पर खड़ा प्रतित हो रहा है। लगता है कि 2014 के आम चुनाव के पश्चात हमारे मुल्क़ की प्रजातांत्रिक यात्रा किसी खतरनाक रास्ते पर बढ़ती नज़र आ रही है। 12 मई के आखरी मतदान के बाद जिस तरह opinion polls के अनुमानित नतीजे आ रहे हैँ उन्हेँ देखकर तो यही लग रहा है कि 16 मई 2014 को नरेन्द्र मोदी नई सरकार बनायेंगे और प्रधानमंत्री पद की कुर्सी पर दावा ठोक ही देंगे। मोदी की दावेदारी और भाजपा द्वारा उन्हेँ अपना पीएम केंडिडेट घोषित करना चर्चा का एक अलग मुद्दा ज़रुर हो सकता है लेकिन इतना तो तय है कि मोदी के सत्ता पर क़ाबिज़ होने से हमेँ ‘लोकतंत्र के नुक़सान’ को ज़रुर भुगतना पड़ सकता है। मोदी अगर जीतते हैँ और प्रधानमंत्री बनते हैँ तो वो यक़ीनन एक ऐसे व्यक्ति की जीत होगी जो चुनाव मेँ जीता तो ज़रुर है लेकिन इस जीत मेँ ये आवश्यक नहीँ है कि उसमेँ मुस्लिम वोट भी शुमार होँ। और विश्वास कीजिये अगर ये होता है तो वाक़ई ये हमारे लोकतंत्र के लिये एक गहरा सदमा और घातक ज़ख्म साबित होगा।

वैसे देश के अहम और सबसे बड़े ‘अल्पसंख्यक’ वर्ग के साथ और समर्थन के बिना देश की बागडोर संभालना कोई मुश्किल काम नहीँ है, लेकिन यक़ीन मानिये इस तरह की सरकार का बनना हमारे मुल्क़ के लिये ‘अस्वीकार्य ‘ तो ज़रुर है और अगर देश के पीएम का इतिहास मोदी जैसा हो, तब तो ये और भी अवांछनीय और अयोग्य हो जाता है। जिस तरह नज़रिया एक आम मुस्लिम का मोदी के बारे मेँ है उसे देखकर ये मानना कि मोदी की जीत मेँ इस वर्ग का भी हाथ है अविश्वसनिय और हास्यास्पद लगता है। मैँ जानती हूँ मेरे इस तर्क के विरोध मेँ बहुत सारे तर्क गिनाये जायेंगे लेकिन अगर आप देश के उस वर्ग से ताल्लुक रखते हैँ जो बहुसंख्यक है और आबाद है तो आपके गले मेरी बात क़तई नहीँ उतरेगी लेकिन अगर आप एक आम मुस्लिम हैँ तो यक़ीनन आप अपने भविष्य को लेकर चिंतित ज़रुर हो जायेंगे।

यदी इस मर्तबा भाजपा जीतती है तो मुस्लिम वर्ग खुद को काफी ‘कमज़ोर’ महसूस करेगा। ये सब सुनना अजीब और खराब ज़रुर लग सकता है लेकिन ये एक कड़वी सच्चाई है जिसे झुठलाया भी नहीँ जा सकता है।भाजपा की जीत एक आम मुस्लिम को देश की राजनीति मेँ पंगु अवश्य बनाती है। और जिन राज्योँ मेँ भाजपा का वर्चस्व है वहाँ ये साफ तौर पर नज़र भी आता है। और जिन भी राज्योँ मेँ भाजपा इतनी ताक़तवर नहीँ है वहाँ बाकि सारी पार्टीयाँ इस बात को लेकर मुतमईन रहती हैँ कि वहाँ भाजपा का ‘भगवा’ परचम नहीँ लहरायेगा बल्कि उनका ‘सेक्युलर’ घोड़ा बाज़ी मार ले जायेगा, इसीलिये सभी दल खुद को महान सेक्युलर दिखाने की होड़ मेँ ‘मुसलिम वोट बैंक’ को रिझाने के लिये तमाम हदेँ पार कर जाते हैँ। एक तरह की रस्साकशी सा नज़ारा बन जाता है जब सभी तथाकथित सेक्युलर पार्टीज़ खुद को भाजपा से बेहतर दिखाने की जद्दोजहद मेँ ‘सेक्युलरिज़्म’ की मूल आत्मा को ही खत्म कर देती हैँ।

मुस्लिम समर्थन पाने के लिए किसी भी दल के लिये निहायत ज़रुरी चीज़ है; वो है एक सकारात्मक ऐजेंडा। और इसे इस तरह क्रियांवित किया जाना चाहिये कि इसके ज़रिये तमाम कम्युनल ताक़तोँ का जड़ से खात्मा किया जा सके।

इतिहास गवाह है कि चुनावी रणनीति के चलते मुस्लिम विरोधी एजेंडे और बयानबाज़ियोँ ने भाजपा और मुस्लिम धर्मावलंबियोँ के बीच सिर्फ गहरी खाई ही खोदी है। इस मर्तबा भी गिरीराज किशोर, प्रविण तोगड़िया और अमित शाह जैसे नेताओँ के ‘तुगलकी’ और बेसिरपैर वाले ‘बदले लेने’ वाले बयानो ने इस खाई को और भी ज़्यादा गहराया है। चुनाव के पहले और चुनाव के दौरान भी भाजपा ने मुस्लिम बहुल क्षेत्रोँ से सिर्फ निगेटिव वोट ही बटोरे हैँ। और हालात तो शोचनिय इसलिये भी हैँ क्योंकि आज की तारिख मेँ मुसलमानो के सामने अपने मनपसन्द उम्मीदवार या पार्टी को जिताना मक़सद नहीँ है वरन उनका एकमात्र उद्देश्य सिर्फ भाजपा को हराना रह गया है।

आज हमारे देश की सबसे बड़ी ‘अल्पसंख्यक’ क़ौम ना चाहते हुए भी ‘डर और भय’ की राजनीति को मानने पर विवश हुई है। और इसके लिये सिर्फ भाजपा ही नहीँ बल्कि सभी राजनैतिक दल उत्तरदायी हैँ। भाजपा तो खैर ज़ाहिर तौर पर कम्युनल पार्टी है लेकिन उन सभी तथाकथित सेक्युलर पार्टीयोँ का क्या जिन्होने दिखावे के लिये मुस्लिम समर्थन किया है?क्या इन दलोँ का भाजपा और मुस्लिम समुदाय के बीच फैले वैमनस्य को अपने फेवर मेँ उपयोग करना सही है? क्या इस नाज़ुक रिश्ते को अपने राजनैतिक और चुनावी फायदे के लिये ‘इनकैश’ करना जायज़ है? किसलिये मुस्लिम उलेमाओँ और गुरुओँ को पटाया और ‘समझाया’ जाता है कि किसके फेवर मेँ वोट दिये जायेँ या फिर किसके खिलाफ ‘फ़तवे’ जारी किये जायेँ? ऐसा लगता है कि ‘मोदी लहर’ को रोकने के दायित्व से मुक्ति पाने के लिये सभी ‘सेक्युलर’ दल मुस्लिम कान्धोँ पर बन्दूक रख कर चला रहे हैँ। और अगर 16 मई को खुदा ना खास्ता मोदी जीत जाते हैँ तो सारा ठीकरा मुस्लिम मत दाताओँ के सिर फोड़ सभी सेक्युलर दल अपना पल्ला झाड़ परे हट जायेंगे। वाह रे सेक्युलरिज़म और वाह रे राजनीति!!!

लेकिन जहाँ तक भाजपा और मोदी का सवाल है, ऐसा लगता है कि ये सभी दो नावोँ पर एक साथ सवार होना चाहते हैँ। जिस तरह इस मर्तबा हमने मोदी को मन्दिर मुद्दे से दूर ‘विकास’ और ‘गवर्नेंस’ की बात करते हुए पाया है और मुसल्मानोँ का ‘दिल जीतने’ और उन्हेँ ‘गले लगाने’ की ‘टोपी’ पहनते हुए देखा है उससे लगता है कि वो एक तरफ तो मुसलिम समुदाय को लुभाना चाह्ती है लेकिन भीतर ही भीतर हिन्दुत्व के ऐजेंडे को नकार भी नहीँ रही है। अपनी किसी भी जानी अनजानी ‘ग़लतियोँ’ के लिये पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिन्ह जी मुसलमानोँ से माफी मांगने को भी तय्यार दिखे, बक़ौल राजनाथ ‘हमेँ एक बार मौक़ा देकर तो देखिये, अगर हम आपकी अपेक्षाओँ पर खरे नहीँ उतरे तो कभी भी हमेँ पलट कर मत देखना’ ।

यहाँ तक कि नरेन्द्र मोदी भी अपनी चुनावी रैलियोँ मेँ कुछ इसी तरह के मूड मेँ नज़र आये। अपनी पटना की रैली मेँ मोदी ने कहा कि ये हिन्दु और मुसलमानोँ को खुद सुनिश्चित करना है कि क्या वो पूरे समय एक दूसरे से लड़ते रहना चाहते हैँ या फिर ग़रीबी के ख़िलाफ एकजुट होना चाहते हैँ। और आखिर तक आते आते मोदी ने ‘मुल्ला मुलायम’ कहना भी छोड़ दिया था। लेकिन वहीँ उनका बनारस से चुनाव लड़ना उनके कट्टर हिन्दू समर्थकोँ के लिये एक तरह का सन्देश ही है। क्या ये बेहतर नहीँ होता कि अटल बिहारी बाजपेयी जी की तर्ज़ पर मोदी भी लखनुऊ से पार्टी के पीएम उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ते बनीस्बत वाराणसी के? लेकिन किसी भी सीट को हम धार्मिक भावना से नहीँ जोड़ सकते हैँ फिर भी इतना तो सभी समझते हैँ कि लखनऊ अपनी ‘ऐतिहासिक विरासत’ के लिये जाना जाता है वही वाराणसी सनातनी धर्मावलंबीयोँ के लिये ‘गंगा जमनी’ तहज़ीब और एक ‘पवित्र नगरी’ के रूप मेँ पूजी जाती है। और शायद यही वो वजह रही है कि मोदी ने अपने दूसरे चुनावी स्थान के लिये ‘बनारस’ को चुना, और इसके ज़रिये अपने हिन्दुत्व के कार्ड को बखूबी इस्तेमाल भी कर लिया। अपनी चुनावी रैलियोँ मेँ जहाँ मोदी ने हर तरह के रूप धरे वहीँ ‘मुस्लिम टोपी’ पहनने से लगातार बाज़ आते रहे।

आखिर मेँ सिर्फ एक ही सवाल रह जाता है कि इस भाजपा और मुसल्मानोँ के बीच पनपी इस खाई को पाटा कैसे जाये? तो ऐसा लगता है कि इसके लिये पहला क़दम मोदी को ही उठाना होगा। अगर मोदी देश के अगले प्रधानमंत्री बन जाते हैँ- (वैसे यहाँ भी ये ‘अगर’ लफ्ज़ बेहद मायने रखता है)- तो उन्हेँ मुसलमानोँ को गले लगाने के लिये आगे बढ़ना ही होगा। और उन्होँने इस तरह के संकेत देने भी शुरू कर दिये हैँ कि ये उनकी ‘ज़िम्मेदारी’ है कि वो देश और समाज के सभी वर्गोँ के क़रीब जायेंगे जिनमेँ मुस्लिम भी शुमार हैँ। भाजपा के पीएम पद के दावेदार का ये बयान कि ‘उनकी कार्यशैली भारतीय संविधान के अनुरूप होगी ना कि आर एस एस के’ अपने आप मेँ बेहद महत्त्वपूर्ण है। और अगर ‘विजेता’ मोदी इस भाजपा-मुस्लिम दूरी को नापने मेँ क़ामयाब हो जाते हैँ तो शायद गुजरात दंगोँ की आग जो आज भी उनके दामन को झुलसाये हुए है उससे उन्हेँ राहत मिल जायेगी।

खैर ये तो सभी कुछ ऐसे सवाल और क़यास हैँ जिनके जवाब मिलने मेँ बस दो ही दिनोँ का वक़्त बाकी है। तो आईये, इंतज़ार करेँ उस सुनहरे दिन का जब भारतीय लोकतंत्र के एक नये अध्याय की शुरुआत होगी और देश एक नया इतिहास रचेगा। आमीन !

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लेखिका सोनाली बोस  वरिष्ठ पत्रकार है , उप सम्पादक – अंतराष्ट्रीय समाचार एवम विचार निगम –

3 COMMENTS

  1. Sonali jee-16 may par aapka article read kiya modi ki jeet mujhe lagta hai janta ki vishvas ki jeet thi etne bade desh ko 1 hi sath vikas /mehngai/corruptian/scam/black money etc ko acche dino ke pralobhan m kahi na kahi umeed se jyada ka vyada tho jrur kiya hai par 1 mnth ki reprt tho kuch acchi nhi thi vaise congrats for yr nice article.

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