कविताएँ
1.घर लौटना और सौ बरस जीना
--------------------------- ख़ुशी के कुछ मायने बोलकर नही बताये जाते जैसे आप चाय या पैसे के लिए बोलते हैं और ख़ुशी किसी भी वक़्त टपक सकती है बिना बताये, खबर दिए पर आपका स्वागत है... ये महज़ एक शब्द नही फूल है जो खिलता है यूँ नागफनी... ख़ुशी तब भी झलककर आयेगी जब आपका फोन चार्जर के आभाव में दम तोड़ देता है उस मौके पर यह पड़ोसी के लैंडलाइन तार से होकर आती है, जबकि इसके लिए आपके बेटे को किसी सरकारी नौकरी या तनख्वाह मिलने की देर होती है। ख़ुशी के मायने अलग अलग होते है वे हथेली पर धरे होते हैं उनमे आपकी बाकि बची जान होती है ख़ुशी, खबर है, यह कानों कान होती है आपके दिल का टुकड़ा ही मुझको छलता है ! यह आपकी ख़ुशी हो सकती है जबकि मेरा रोना सर्वनाम शब्द है ख़ुशी बदलती रहती जैसे कोई  मौसम है , एक बुलेटिन में है जो रोज़  बदलता है ! एक ख़ुशी को 'ख़ुशी' बनाने की जद में सौ गुनाह  माफ़ करते हैं जैसे तौलिये से बाल झटककर अभिनेता को रिझाती अभिनेत्रियाँ, ख़ुशी एक कद्दूकस जैसी आदमी के लिए बहुत कीमती है। तमाम झुटे गवाहों और बयानों को मध्यनजर रखते हुए, घबराई सांसों और कजलाई आँखों को लेकर जब हम अपने अपने घरों को लौटाना चाहते हैं तो खुशियाँ  माओं की तरह कहती हैं कि सौ बरस और.. तुम्हें जीना ही चाहिए।
2. दम तोड़ती विडम्बनाएं और आज़ादी
--------------------- हमारे लिए मरने वाले सबसे बहादुर लोगों ने अपने जन्मदिन रूठी हुई प्रेमिकाओं  की तरह नही मनाये या किसी दूसरी तरह भी नही मनाये इस इंतज़ार में कि हम सबका मत एक होगा, पर हमारी सीमाओं तक पहुंचते पहुंचते विडम्बना इस कदर दम तोड़ गई कि उन्होंने जो कहा वह मैंने और आपने नहीं सुना। मिसेल फोको समेत तमाम लोगों ने अपने मोम जैसे हाथों से कागजों पर खून से लिखे मलाई की तरह बिलोये हुए शब्द उससे बहुत अलग हमने पढा या ज्यादा कहें तो हमें ज़बर्दस्ती पढ़वाया गया ताकि हम क्लास की सबसे आगे वाली बेंच पर बैठ सकें और हर महीने हमारे गार्ज़ियन ऑफिस में अकड़ अकड़ कर प्रिंसिपल को महानताएं बता सकें। आज़ादी कैसे मिली किसको मिली और कितनी मिली ये बातें हमारे भीतर जाकर बिलकुल भिन्न अर्थों में खिलखिलाई और यह आखरी से आखिरी बात आप मेरे ऊपर थोपेंगे कि मैंने कहा है। ठीक इसी तरह उन खून से भी लाल दस्तखतों और इतिहास में दी गई सबसे सफेद गवाहियों को नही समझा हमने, इसके बाद चाय पीकर उपनिषद के ऊपर कप रखे गाने सुनकर बाइबिल पर इयरफोन रखे और दुनियां को बताना चाहते हैं कि हमने आज़ादी का मतलब सीख लिया।
3.  इंसाफ मांगती लड़की
------------------------ "आफरीन" नाम की लड़की ने अगर इंसाफ माँगा होता तो क्या उसे मिलता? शायद हज़ारों बेज़ुबान लड़कियों के मामलों की तरह फाइलों में दम तोड़ देती। यह बात किसी न्यूज़ में नही आई। अँधेरे ही में रोल कट करना और फ़िर अख़बार में छपना ऊपर से जो पारिश्रमिक मिला वो लेकर हम घर आए ताकि हमारे बच्चे इंग्लिश मीडियम में पढ़ें। ज़िंदगी यूँ ही !रिश्तों में लूटी। लेकिन इंसाफ मांगती लड़की की आँखों में किसी ने नही देखा। हम सब दोबारा से बौने होते गए, हमारी आत्माएं मिट्टी हो गई आत्माएं उपकरण भी बनी इसलिए हमारी आत्माओं ने खुद को ही बताया कि बंदिश तोड़ ही देती हूँ सब , हाव - भाव  पर  जब  हो !
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poet-brijmohan-bairagibrij-216x300लेखक परिचय
कवि बृजमोहन स्वामी 'बैरागी'
हिंदी और राजस्थानी कवि व्  लेखक
(उपनाम - कवि बैरागी) पता - बरवाळी, नोहर , हनुमानगढ़ जिला , राजस्थान (335504) सम्पर्क – birjosyami@gmail.com कार्य क्षेत्र-  कहानीकार, नाटककार , फ़िल्म राइटर, रंगमंच कर्मी , और राजस्थानी भाषा मान्यता आंदोलन में सक्रिय योगदान
वर्तमान -  स्कूल अध्यापक, और जिला अध्यक्ष, राजस्थानी भाषा संगर्ष सेना (हनुमानगढ़ इकाई)
रचनाओं के अन्य कॉपीराइट धारक को गद्य कोश में मेरी रचनाओं के संकलन पर किसी भी प्रकार की कोई भी आपत्ति नहीं है और इन सभी की ओर से मेरी रचनाओं को कोश में जोड़ने की अनुमति है। -बृजमोहन स्वामी 'बैरागी'