Crusader-or-Conspirator-Coalgate-and-Other-Truthsआई एन वी सी,

दिल्ली,

यूपीए(1) के कार्यकाल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे वरिष्ठ पत्रकार संजय बारू की किताब ‘द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर-द मेकिंग एंड अनमेकिंग ऑफ मनमोहन सिंह’ से उठा सियासी भूचाल अभी पूरी तरह से शांत भी नहीं हो पाया है कि आज पूर्व कोयला सचिव पीसी पारेख किताब के विमोचन ने भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ज़िन्दगी मेँ तूफान खड़ा कर दिया है।

ग़ौरतलब है कि दिसंबर 2005 में रिटायर हुए पूर्व कोयला सचिव पारेख की पुस्तक क्रुसेडर ऑर कांसपीरेटर? कोलगेट एंड अदर ट्रुथ्स का सोमवार को विमोचन किया गया।

ऐसे समय में जब प्रधानमंत्री के पूर्व मीडिया सलाहकार की पुस्तक से राजनीतिक भूचाल पैदा हो गया है, तब पूर्व कोयला सचिव पीसी परख ने यह कह कर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को असहज स्थिति में डाल दिया कि वह ऐसे सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं जिसमें उनका राजनीतिक प्राधिकार ‘कम’ है।

सोमवार को जारी हुई पुस्तक ‘क्रूसेडर ऑर कांस्पिरेटर? कोलगेट एंड अदर ट्रूथ’ में पारेख ने उस दिन की घटना को याद किया जब वह अपना इस्तीफा तत्कालीन कैबिनेट सचिव बीके चतुर्वेदी को सौंपने के बाद प्रधानमंत्री से बिदाई मुलाकात करने गए थे। वे कोयला सचिव के पद से दिसंबर 2005 में सेवानिवृत हुए थे।

पारेख ने अपनी किताब में लिखा है कि मैंने अपने कार्यकाल में सांसदों को ब्लैकमेलर बनते देखा है। उनके मुताबिक कोल ब्लॉक आवंटन को लेकर उनके सुझाव नहीं माने गए। हम ऐसी स्थिति में पहुंच गए थे, जहां मुख्य सचिव भी नेताओं का गुलाम बनने को मजबूर किए जाते थे। मेरी किताब हमारी राजनीतिक व्यवस्था में आई गिरावट के बारे में है। पूर्व कोयला सचिव पीसी पारेख ने अपनी किताब में लिखा है कि पीएम अपने मंत्रियों को कंट्रोल करने में असमर्थ थे।

पूर्व कोयला सचिव ने सीबीआइ निदेशक रंजीत सिन्हा से पूछा है कि हिंडाल्को को ओडिशा की जिस तालाबीरा कोयला खदान आवंटन मामले में उनके खिलाफ केस दर्ज किया गया है, उसमें पीएम के खिलाफ एफआइआर क्यों नहीं दर्ज की गई? उनके मुताबिक, तालाबीरा कोल ब्लॉक के आवंटन का फैसला मनमोहन सिंह ने ही बतौर कोयला मंत्री लिया था। पारेख का आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट को प्रभावित करने और पिंजरे में बंद तोता की छवि से उबरने की कोशिश के तहत ही रंजीत सिन्हा ने उनके खिलाफ कार्रवाई की है।

उन्होंने आरोप लगाया है कि सीबीआइ उनका शिकार करना चाहती है। सिन्हा ने नियम-कानून ताक पर रखकर उनके खिलाफ कार्रवाई की है। बकौल पारेख, अगर सिन्हा मानते हैं कि तालाबीरा-2 कोल ब्लॉक हिंडाल्को को एक साजिश के तहत आवंटित किया गया तो इस मामले में प्रधानमंत्री को भी नामजद करने का उनके अंदर साहस होना चाहिए।

गौरतलब है कि ओडिशा की तालाबीरा कोल ब्लॉक हिंडाल्को को आवंटित करने के मामले में सीबीआइ ने पारेख और कुमार मंगलम बिड़ला के खिलाफ केस दर्ज किया है। आरोप है कि हिंडाल्को को कोल ब्लॉक आवंटन में पारेख ने पक्षपात किया है। अपनी पुस्तक में पारेख ने जांच एजेंसी के इस कदम पर सवालिया निशान लगाया है। उन्होंने सवालिया अंदाज़ में पूछा, अगर सीबीआइ को इस मामले में साज़िश और भ्रष्टाचार की बू आई तो उसने पीएम के खिलाफ एफआइआर क्यों नहीं की?

पारेख के अनुसार, किसी भी सचिव मंत्री का काम केवल सिफारिश करना है। इस पर अंतिम फैसला लेना मंत्री का काम है। उन्होंने सवाल किया कि उनके खिलाफ एफआइआर दर्ज करने से पूर्व सीबीआइ ने पीएमओ की फाइलों की जांच क्यों नहीं की। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंडाल्को को कोल ब्लॉक आवंटन के मामले में पीएमओ ने उन पर कोई दबाव नहीं डाला।

इधर सीबीआइ निदेशक सिन्हा ने पारेख की इस किताब को कोई तवज्जो नहीं दी है। उन्होंने इस पुस्तक को खांटी सरकारी बाबू की किताब करार दिया है। बकौल सिन्हा, इसमें लेखक अपने ही महिमा मंडन में लिप्त है। उन्होंने कहा, मैं सभी आरोपों का क्रम से जवाब देता। चूंकि मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है लिहाजा मैं इस पर कुछ नहीं कहना चाहता।

68 वर्षीय पारेख ने अपनी पुस्तक में कहा कि उन्होंने अपना इस्तीफा तब दिया था जब संसद की स्थायी समिति की बैठक के दौरान भाजपा सांसद धर्मेन्द्र प्रधान ने उनका अपमान किया था और सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई थी। मानस पब्लिकेशन से प्रकाशित पुस्तक में पारेख ने कहा, ’17 अगस्त 2005 को मैंने प्रधानमंत्री से विदाई मुलाकात की। मैं सांसदों की ओर से नौकरशाहों एवं वरिष्ठ अधिकारियों के अपमान के बारे में चिंता व्यक्त करना चाहता था।’

उन्होंने प्रधानमंत्री के साथ बातचीत का भी ज़िक्र किया और कहा कि यह स्पष्ट हो गया है कि प्रधानमंत्री जिस तरह से काम करते हैं, उसकी सीमाओं को देखते हुए कोयला क्षेत्र में सुधार की काफी कम गुंजाइश है।

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