बिहार में उभरता एक नया सियासी समीकरण

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आलोक कुमार{ आलोक कुमार ** } बिहार के लोकसभा चुनावों के अब तक सम्पन्न हो चुके मतदान  में बिहार से एक नया समीकरण उभरता हुआ दिख रहा है l अति -पिछड़ी जातियों में भी नरेंद्र मोदी की तरफ रुझान दिख रहा है l अगर मतदान के अंतिम चरण तक ये रुझान कायम रह गया तो ये खतरे की घंटी होगी  भाजपा विरोधी दलों के लिए , क्यूंकि अति-पिछड़ी जातियों के मतों को लालू और नीतीश सरीखे नेताओं ने अपना स्वाधिकार ही मान लिया था l बिहार की सियासत में अति-पिछ़ड़ी जातियों के मतदाता अरसे से निर्णायक भूमिका में रहे हैं। खासकर ९० के दशक से यहाँ जो भी राजनीतिक पार्टी चुनावों में आगे रही है , उसके वोट-बैंक में एक बड़ा हिस्सा अति-पिछ़ड़ी जातियों के मतदाताओं का रहा है। बिहार में चुनावी समीकरण इन मतदाताओं को नजरअंदाज कर नहीं बन सकता। इस बार जद (यू) से अलग होने के बाद भाजपा भी राजनीति के इसी समीकरण के सहारे सूबे की राजनीति का सिरमौर बनने की तैयारी कर रही है और शुरुआती दौर में सफल होती भी दिख रही है । बिहार में सीटों की संख्या को विस्तार देने के लिए भाजपा के रणनीतिकारों ने जो ‘खाका’ तैयार किया है, उसमें अति -पिछड़ों के समीकरण को प्रमुखता दी गई है। यहाँ यह भी दिलचस्प है कि बिहार में नरेंद्र मोदी का नाम उछाल कर सियासी लाभ जुगाड़ने का जो यत्न हो रहा है, उसमें मोदी के ‘विकास -मॉडल’ को जगह नहीं दी जा रही है बल्कि उनके अति- पिछड़ा होने को ‘’भुनाने” की कोशिशें की जा रही हैं। दरअसल, भाजपा ने उसी समीकरण में सेंध लगाने की योजना बनाई है , जिसके सहारे नीतीश कुमार अपनी खोई हुई जमीन को फिर से तलाशने की जुगत में लगे हैं l

इस बार के लोकसभा चुनावों में अगर भाजपा अति-पिछड़ों को साधने में कुछ हद ( मेरे हिसाब अति-पिछड़े मतों का ३० प्रतिशत ही ) तक भी सफल हो जाती है तो बिहार में कहीं सारे समीकरण धरे के धरे ना रह जाएँ ? ‘ लहर ‘ है या नहीं ये तो मैं नहीं कह सकता , ये ‘लहर ‘ मापने वाले लोग ही बता पाएंगे ? लेकिन समस्त बिहार के लोकसभा  क्षेत्रों में मौजूद पत्रकार मित्रों , सूत्रों एवं आम जनता से मिल रही खबरों की अगर मानें तो मोदी की तरफ अति-पिछड़े मतदाताओं के रुझान के स्पष्ट संकेत मिलने लगे हैं l यहाँ सबसे अहम ये देखना है कि क्या ये रुझान , झुकाव मतदान के अंतिम चरण तक बरकरार रह पाता है या नहीं l चन्द  दिनों पहले मैं भी गया , नवादा , जहानाबाद व पाटलीपुत्र संसदीय क्षेत्र के अति-पिछड़ी जातियों के मतदाताओं से रूबरू था , उनका भी साफ तौर पर कहना था कि ” अबरी इनखे देखल जाए  ( मोदी को देखा जाए )” l मैं जब उन लोगों से पूछा कि ” क्या आप लोग भाजपा को औरों से बेहतर विकल्प के तौर पे देखते हैं ?” तो उन लोगों ने दो टूक जवाब दिया ” हमनी भाजपा लागी ना बेदम ही , हमनी मोदी जी के एक बार अजमावे ला चाहअ हीयन (हम लोग भाजपा के लिए नहीं बेदम हैं हम लोग बस एक बार मोदी को आजमाना चाहते हैं ) l”

ये स्पष्ट तौर पर दिखाई दे रहा है कि सवर्ण व वैश्य मतदाताओं की पार्टी कही जाने वाली भाजपा ने बिहार में अपना दबदबा बढ़ाने के लिए बदले हालात में पूरी तरह अति-पिछ़ड़ों की राजनीति करने का मन भी बना लिया है। नरेंद्र मोदी को अति -पिछड़ा बताकर अति-पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को यही संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि भाजपा जहाँ एक अति -पिछड़े नेता को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठाने की कोशिशों में लगी है, वहीं नीतीश कुमार जैसे खुद को अति-पिछड़ों के रहनुमा बताने वाले लोग इन कोशिशों में रोड़ा अटका रहे हैं। स्पष्ट है कि भाजपा अब अपने सवर्ण व वैश्य वोटरों के साथ अति-पिछड़ों को पार्टी से जोड़कर बिहार में अपनी ताकत बढ़ाने में जुट गई है।

बिहार की राजनीति में मौजूदा  हालात में तीन पहलूओं पर लोकसभा चुनावों के नतीजे काफी हद तक निर्भर करते हैं l पहला , यादव मतदाता (११ प्रतिशत) लालू के साथ मजबूती से खड़ा रह पाता है या नहीं , दूसरा , नीतीश के कुर्मी-कोयरी (७ प्रतिशत ) वोट-बैंक में भाजपा किस हद तक सेंधमारी कर पाती है एवं तीसरा ( मेरे हिसाब से सबसे मत्वपूर्ण ) , अति-पिछड़ा मतदाता   ( ३० -३२ प्रतिशत ) के वोट – बैंक में से कौन कितना हासिल कर पाता है l आज भाजपा नरेंद्र मोदी के नाम पर अति-पिछड़ा कार्ड खेलकर इसी  ३०-३२ प्रतिशत के वोट-बैंक पर अपनी नजरें सबसे ज्यादा गड़ाए हुए है l यादवों को बड़े पैमाने पर लालू से अलग करना आसान नहीं है और कुर्मी – कोयरी ( विशेषकर कुर्मी ) को नीतीश के विरुद्ध करना बहुत आसान नहीं है , हाँ ये जरूर है कि कुर्मी को अलग कर कोयरी मतों में सेंधमारी की जा सकती है l लिहाजा इस हालात में भाजपा को एक अच्छी बढ़त पाने के लिए अति-पिछड़ा मतदाताओं का एक प्रभावी हिस्सा अपनी तरफ खींचना ही होगा  । भाजपा के रणनीतिकार इस दिशा में प्रयासरत दिख रहे हैं कि अगर यादव और कुर्मी भाजपा के साथ नहीं भी आते हैं , तो भी ३०-३२ प्रतिशत अति -पिछ़ड़ों को अपने साथ ज्यादा से ज्यादा की संख्या में लाया जाए । यही वजह है कि भाजपा नरेंद्र मोदी को लगातार सूबे में एक अति – पिछड़ा नेता के तौर पर प्रचारित कर अति-पिछड़े वोटरों को लुभाने का प्रयास कर रही है।

अपने इन प्रयासों में भाजपा किस हद तक कामयाब हो पाती है, यह तो वक्त बताएगा लेकिन शुरुआती रुझान भाजपा के लिए संतोषप्रद  हैं । पिछले पाँच सालों में नीतीश की अति-पिछड़ा  वर्गों पर पकड़ निःसन्देह कमजोर हुई है। इस का सबसे बड़ा कारण जो मुझे दिखाई देता है वो ये है कि नीतीश अति-पिछड़ों को साधने के लिए अति-पिछड़ा राग तो अवश्य अलापते रहे लेकिन इस वर्ग के नेताओं को उन्होंने राजनीतिक रूप से कोई ज्यादा तवज्जो नहीं दी l इसके अलावा नीतीश के “महादलित-फॉर्मूले” का “नकारात्मक-संदेश” भी अति-पिछड़ों के बीच उनके विरोधी पहुंचाने में बखूबी कामयाब रहे हैं l बदले हालात में लालू का अति-पिछड़े मतों के  समीकरण की बजाए अपने पुराने “माय”समीकरण पर ही ज्यादा ध्यान देना भी हैरान करने वाला है !! क्या लालू ये मान कर चल रहे हैं कि अति-पिछड़े वर्ग का उनसे मोह-भंग हो चुका है ? यहाँ गौरतलब है कि लालू के सहयोगी दल काँग्रेस के वोट-बैंक में भी अति-पिछड़े मतों का शेयर नहीं के बराबर रह गया है ( विगत दो दशकों के चुनावी आंकड़े यही संदेश देते दिखते हैं ) ।

चुनावों के ठीक पहले रामविलास पासवान का भाजपा से जुड़ना भाजपा के लिए समीकरणों के मद्देनजर लाभप्रद ही है l पिछले चुनाव में भी रामविलास की पार्टी को कुल मतों का ९ प्रतिशत मत हासिल हुआ था । ऐसे में ये ९ प्रतिशत मत अगर थोड़ी बहुत बढोत्तरी के साथ भी भाजपा के पाले में आ जाते हैं तो ये भाजपा के लिए “बोनस प्लस डिविडेंड” के समान होगा l

आईए इनके इतर कुछ और जातिगत समीकरणों पर भी एक सरसरी निगाह डाली जाए जो भाजपा के पक्ष में जाती दिख रही हैं l बिहार का २ प्रतिशत कायस्थ , ६ प्रतिशत ब्राह्मण और लगभग ३ प्रतिशत (२.८ प्रतिशत ) भूमिहार मतदाता मजबूती व मजबूरी के साथ भाजपा और उसके गठबंधन के पक्ष में ही खड़ा दिखाई दे रहा है। करीब ५ प्रतिशत राजपूत मतदाता बीते वर्षों में ‘रणनीतिक – मतदान’ ही ज्यादा करते देखे गए हैं और इस बार भी उनसे यही उम्मीद की जा रही है । वैश्य मतदाताओं (२२ प्रतिशत ) को तो बिहार का हरेक राजनीतिक तबका अप्रत्यक्ष तौर पर ही सही लेकिन भाजपा का“स्वाधिकार” ही मनाता है l उपेन्द्र कुशवाहा के साथ गठबंधन का फायदा भी भाजपा को मिलता दिख रहा है l अगर मेरी मानें तो बिहार में १४ प्रतिशत से ज्यादा कुशवाहा मतों में लगभग १२ प्रतिशत पर उपेन्द्र कुशवाहा की तगड़ी पकड़ है और यहीं से कुशवाहा राजनीति की गणित भी संचालित व प्रभावित होती है l मेरे हिसाब से उपेंद्र कुशवाहा के साथ भाजपा का गठबंधन एक दूरगामी राजनैतिक परिदृश्य का निर्माण करने की दिशा में भाजपा द्वारा उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है l कैप्टन जय नारायण निषाद के भाजपा के साथ आने से ६ प्रतिशत  निषाद मत भी भाजपा के पाले में जाते दिख रहे हैं l निषाद जाति का प्रभाव गंगा पार के इलाकों में है और कैप्टन जय नारायण निषाद से कद्दावर नेता निषादों के बीच दूसरा कोई नहीं है l ज्ञातव्य है कि इसी को ध्यान में रखकर कैप्टन जय नारायण निषाद के सुपुत्र श्री अजय कुमार निषाद को भाजपा ने तमाम विरोधों के बावजूद मुजफ्फरपुर संसदीय क्षेत्र से अपना उम्मीदवार बनाया है l

वैसे तो चुनाव संभावनाओं का खेल है और समीकरण कभी भी किसी के पक्ष में बन –बिगड़ सकते हैं । अभी २६ सीटों पर मतदान होना बाकी है और इन के लिए मतदान होने तक  तक अति-पिछड़ों की राजनीति व रणनीति कैसी शक्ल अख्तियार करती है, देखना दिलचस्प होगा !! फिलहाल अति-पिछड़ों को साथ लेकर दूसरों को पछाड़ने का भाजपा का ‘गेम – प्लान’ मतदान हो चुके १४ सीटों पर तो प्रभावी असर छोडता हुआ दिखता है  , बाकी सीटों  पर असरदार तरीके से काम भी शुरू हो चुका है और शुरुआती संकेत भी भाजपा के लिए उत्साहवर्द्धक हैं।

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**आलोक कुमार

वरिष्ठ पत्रकार व विश्लेषक, पटना.

*Disclaimer: The views expressed by the author in this feature are entirely his own and do not necessarily reflect the views of INVC.

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