Wednesday, February 19th, 2020

बांगला साहित्य ने भारतीय भाषाओं के साहित्य को नेतृत्व तो दिया

बांगला साहित्य ने भारतीय भाषाओं के साहित्य को नेतृत्व तो दियाआई एन वी सी न्यूज़ राँची, खेलगांव में आयोजित निखिल भारत बंग साहित्य सम्मेलन के अवसर पर माननीय राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी, माननीया राज्यपाल श्रीमती द्रौपदी मुर्मू, माननीय मंत्री श्री सरयू राय, सांसद श्री प्रदीम बलमुचू सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि- ‘‘निखिल भारत बंग साहित्य सम्मेलन साहित्यिक रफ्तार को नयी ऊर्जा देता रहा है। जब हम यह कहते हैं कि बांगला साहित्य ने पूरे भारत को एक दिशा दी है, तो यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि इसका श्रेय निखिल भारत बंग साहित्य सम्मेलन को जाता है। भारत एक बहुभाषी देश है, अनेक भाषाएं हैं। भाषाओं की अनेकता या बहुलता हमारे लिए कठिनाई पैदा नहीं करती है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक समृद्धि का परिचय देती है। बांगला साहित्य ने भारतीय भाषाओं के साहित्य को नेतृत्व तो दिया ही है, बंगला साहित्य को भी अपनी खुशबू से सराबोर किया है। बात छायावाद की हो या प्रगतिवाद अथवा जनवाद की, बंगला साहित्य ने इसकी अगुवाई की है। मुझे लगता है कि बांगला साहित्य में ऐसा आकर्षण है, जो किसी और भाषायी साहित्य में नहीं है। इस आकर्षण की वजह है बांगला साहित्य की जीवंतता। बंगाली साहित्यकार जीवन-जगत के हर पहलू को बड़ी बारीकी से देखता है, परखता है और कागज पर उतारता है। इस साहित्य को गढ़ने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उनके परिवेश की रही है। उनकी संस्कृति की रही है। हम ऐसा भी कह सकते है कि बंगाल की मिट्टी में वह साहित्यिक तत्व है, जो साहित्य निर्माण की ऊर्जा प्रदान करता है। बांगला भाषी बंगाल में रहें या बंगाल के बाहर बंगला संस्कृति और बंगला साहित्य उनसे लिपटी पड़ी रहती है। साहित्य और संस्कृति का चोली दामन का संबंध है। साहित्य-संस्कृति से बंगला भाषियों का जो प्रेम रहा है, उसकी सबसे बड़ी वजह है देश के छोटे-बड़े शहरों में साहित्यिक मंदिर के रूप में स्थापित रवींद्र भवन। रवींद्र भवन साहित्य और संगीत साधना के केंद्र रहे हैं। यहां कला साधना के उर्वरक तत्व मिलते रहे हैं। इसे देखते हुए झारखंड सरकार ने राजधानी में आठ करोड़ रुपये की लागत से रवींद्र भवन बनाने का निर्णय लिया है। युग के विकास के साथ साहित्य मर्म भी कठिन होता जा रहा है। कभी साहित्य ग्राम्य जीवन के इर्द-गिर्द ही घूमा करता था, आज साहित्य में बदलती शहरी, कॉरपोरेट संस्कृति का समावेश हो गया है। इसमें दो राय नहीं हो सकती है कि हमारी अपनी संस्कृति टी0वी0 संस्कृति से प्रभावित हो गई है। एक जमाना था जब हम किसी बंगाली गली-मुहल्ले से गुजरते थे तो हमारे कानों में बांगला संगीत, तबला या हारमोनियम का अभ्यास करते बालक-बालिकाएं देखे जाते थे। अब टीवी पर प्रसारित होने वाले गानों ने इनकी जगह ले ली है। टीवी पर सा-रे-गा-मा-पा जैसे कार्यक्रमों ने सांस्कृतिक विकास को नयी ऊंचाई दी है। वहीं कवि सम्मेलनों के प्रसारण ने साहित्य का भला भी किया है। रवि बाबू के “जन-गण-मन” राष्ट्रीय गान और बंकिम चंद्र का “वंदेमातरम” ने हमारे राष्ट्रीय जीवन जगत को वर्षों से ऊर्जा प्रदान कर एक सूत्र में बांधने का काम किया है। बांगला साहित्य से हिन्दी एवं दूसरी भाषाओं में अनुवाद ने हमें इसके साहित्य के काफी करीब किया है। ऐसे अनुवाद ने ही कवि रवींद्रनाथ टैगोर, बंकिम चंद्र, शरत चंद से लेकर बिमल मित्रा जैसे साहित्यकारों की रचनाओं का रसास्वादन कराया है। मुख्य रचनाओं में आनंद मठ, चरित्रहीन इत्यादि हैं। अंत में मुझे विश्वास है कि ऐसे सम्मेलन कवियों को, साहित्यकारों को भी प्रेरणा देंगे। जन-जन के लिए मांगलिक प्रसंग बनेंगे।’’

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