Wednesday, November 13th, 2019
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फेफड़ों के रोग का महिला स्वास्थ्य को है अधिक जोखिम 

महानगरों में महिलाओं में बढ़ते धूम्रपान के मामले चिंता का विषय

 आई एन वी सी न्यूज़

 नई  दिल्ली ,

 डब्ल्यूएचओ के मुताबिक 1980 में 15 वर्ष से अधिक उम्र की  महिलाओं में धूम्रपान के मामले 2.2 फ़ीसदी थे, जिसके साल 2025 तक 20 फ़ीसदी तक बढ़ जाने की आशंका जताई गयी थी। निश्चित रूप से धूम्रपान महिलाओं को अधिक प्रभावित  करता  है और उसके नुकसान जोखिम भरे होते हैं। त्योहारों का समय जब प्रदूषण से होने वाली फेफड़ों की बीमारियाँ चर्चा का विषय होतीं हैं वहीँ महिलाओं के स्वास्थ्य को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए।  इस विषय में जागररुकता फैलाने के उद्देश्य से जेपी अस्पताल ने सिट्रस होटल (एप्पल ट्री) सी/2 महालक्ष्मी मॉल आरडीसी राजनगर गाज़ियाबाद में एक कांफ्रेंस का आयोजन किया जहां डॉक्टर ज्ञानेंद्र अग्रवाल ने अपने विचार व अनुभव साझा किये।

डॉक्टर ज्ञानेंद्र अग्रवाल, एसोसिएट डायरेक्टर, डिपार्टमेंट ऑफ़ रेस्पिरेट्री एंड क्रिटिकल केयर मेडिसिन, जेपी अस्पताल ने कहा कि, “अगर आप साँस ले रहे हैं मतलब जिंदा हैं, ऐसा अक्सर कहा जाता है, लेकिन फेफड़ों के रोगों की संख्या को देखते हुए सवाल उठता है कि क्या वाकई हम ‘सांस ले रहें हैं’ या वाकई ‘जिंदा हैं’? धूम्रपान के निश्चित रूप से महिला स्वास्थ्य को जोखिम होते हैं, खासतौर पर गर्भवती महिलाओं को। मेरे पास एक गर्भवती महिला का केस था जिसके अजन्मे बच्चे की ज़िन्दगी धूम्रपान की वजह से जोखिम में पड़ गई थी, बल्कि वह महिला खुद भी बहुत कमज़ोर थी। यहाँ हमें यह समझने की ज़रूरत है कि हम सामाजिक रूप से अपनी महिलाओं पर हद से ज्यादा जिम्मेदारियों का बोझ लाद देते हैं, जिसका परिणाम उनके अनियमित जीवनशैली, खान पान की अस्वस्थ आदतों में निकल कर आता है। हमें अपनी महिलाओं के साथ इन जिम्मेदारियों को साझा करना चाहिए और महिला स्वास्थ्य के विषय में अधिक जागरुक होना चाहिए।”

शहरी इलाकों की महिलाओं के अलावा धूम्रपान की आदत समाज के कमज़ोर तबकों की महिलाओं में भी मौजूद है। उदाहरण के लिए हम अपने आस पास महिला मजदूरों को भी बीड़ी, हुक्का आदि का सेवन करते देख सकते हैं। जहां शहरी इलाकों की महिलाएं अनियमित जीवनशैली की वजह से इस आदत का ‘चुनाव करतीं हैं’ वहीँ ग्रामीण या गरीब तबके से आने वाली महिलाएं जागरुकता और अन्य स्रोतों के आभाव में इसको ‘विकल्प के रूप में’ देखतीं हैं।

दीवाली की हर अगली सुबह शहर की नींद ज़हरीले स्मॉग और प्रदूषित हवा में खुलती है। बीते कुछ वर्षों में देश के बड़े शहरों में पुअर एयर क्वालिटी पीएम10 तक चली गयी थी जो कि एयर क्वालिटी इंडेक्स में बहुत खतरनाक स्तर है, और इसने अस्थमा और अन्य फेफड़ों से सम्बंधित समस्याओं को भी बढ़ा दिया था। आज जहाँ फेफड़ों के ऐसे रोग बहुत बड़ी चिंता का विषय हैं वहीं धूम्रपान समस्या को और बढ़ाने का काम कर रहा है।

डॉक्टर ज्ञानेंद्र आगे अपनी बात रखते हुए कहते हैं कि, “सांस लेने का मतलब केवल हवा को फेफड़ों के अन्दर खींचना और बहार छोड़ना मात्र नहीं है बल्कि यह है कि वाकई हम साँसों के ज़रिये फेफड़ों में क्या पहुंचा रहें हैं। बहुत दुखद है जिस तरह धूम्रपान को ‘कूल’ दिखने से जोड़ा जाता है। हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ अस्थमा के मरीजों को उनके बेहतर स्वास्थ्य के लिए डॉक्टरों द्वारा शहर तक बदल लेने की सलाह दी जाती है। ऐसे में हमको सोचना होगा कि धूम्रपान की आदत वाकई कितनी ‘कूल’ है।”

त्योहारों का समय ख़ुशी लाने के लिए होना चाहिए नाकि बीमारियों को लाने का। इसलिए इस दिवाली हम सबको फिज़ा में और अधिक प्रदूषक तत्व जोड़ने के बजाय साफ़ वातावरण सुनिश्चित करने का संकल्प लेना चाहिए ताकि इससे संबंधित रोगों से पीड़ित लोगों की संख्या पर लगाम लगायी जा सके।

अपने मरीजों को सर्वश्रेष्ठ आधुनिक इलाज देने के अलावा जेपी अस्पताल नोएडा समय समय पर मुफ्त जांच कैंप और जागरूकता कार्यक्रमों का भी आयोजन करता रहता है।

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