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Tuesday, November 24th, 2020

प्रियंका और चंद्रशेखर साथ  क्या लग पाएगा बसपा के वोट में सेंध

उत्तर प्रदेश की राजनीति में पांव जमाने की कोशिश में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी दिन रात मेहनत कर रही हैं. वही, भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने भी आजाद समाज पार्टी का गठन कर कामकाज तेज कर दिया है. प्रियंका गांधी की टीम लगातार चंद्रशेखर के संपर्क में रहती है. प्रियंका और चंद्रशेखर की नजर सूबे में बसपा प्रमुख मायावती के दलित मतदाताओं पर है. सूबे में दोनों नेता दलित मुद्दों को लेकर योगी सरकार को घेरने से नहीं चूकते हैं जबकि मायावती फिलहाल मौन हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि प्रियंका और चंद्रशेखर बसपा के वोटबैंक में सेंधमारी में कितना कामयाब हो पाएंगे?

उत्तर प्रदेश में दलित मतदाता करीब 22 फीसदी हैं. अस्सी के दशक तक कांग्रेस के साथ दलित मतदाता मजबूती के साथ जुड़ा रहा, लेकिन बसपा के उदय के साथ ही ये वोट उससे छिटकता ही गया. यूपी में कांग्रेस की कमान प्रियंका गांधी के हाथों में आने के बाद से वह अपने पुराने दलित वोट बैंक को फिर से जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही हैं.

प्रियंका गांधी का भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर से बढ़ती नजदीकियां हो या फिर मायावती को बीजेपी का अघोषित प्रवक्ता बताना. इतना ही नहीं प्रियंका का रविदास मंदिर में जाकर माथा टेकना और सूबे में दलित पर होने वाले अत्याचारों को लेकर योगी सरकार को दलित विरोधी करार देना. सोनभद्र में अनुसूचित जनजाति के नरसंहार को लेकर प्रियंका गांधी ने जिस तरह के तेवर अपनाए, उसे हर कोई देख चुका है. प्रियंका गांधी ने ट्वीट कर कहा कि दलितों के खिलाफ होने वाले कुल अपराध के एक तिहाई अपराध उत्तर प्रदेश में होते हैं.

उत्तर प्रदेश में दलितों की आबादी लगभग 22 फीसदी है. दलितों का यह समाज दो हिस्सों में बंटा है. एक, जाटव जिनकी आबादी करीब 14 फीसदी है और जो मायावती की बिरादरी है. चंद्रशेखर भी जाटव हैं तो मायावती का डरना लाजिमी है. मंडल आंदोलन में दलितों के जाटव वोट वाले हिस्से की राजनीति से बसपा मजबूत बनी है. ठीक वैसे ही जैसे ओबीसी में यादवों के समर्थन से सपा.

उत्तर प्रदेश में जाटव समुदाय बसपा का कोर वोटबैंक माना जाता है जबकि गैर-जाटव दलित वोटों की आबादी तकरीबन 8 फीसदी है. इनमें 50-60 जातियां और उप-जातियां हैं और यह वोट विभाजित होता है. हाल के कुछ वर्षों में दलितों का उत्तर प्रदेश में बीएसपी से मोहभंग होता दिखा है. दलितों का एक बड़ा धड़ा अब मायावती के साथ नहीं है. लोकसभा और विधानसभा के चुनाव में गैर-जाटव वोट बीजेपी के पाले में खड़ा दिखा है, लेकिन किसी भी पार्टी के साथ स्थिर नहीं रहता है. इस वोट बैंक पर कांग्रेस और सपा की नजर है.

वरिष्ठ पत्रकार परवेज अहमद कहते हैं मायावती को अपने चार दशक के सियासी सफर में विरोधियों के साथ अपने संगी-साथियों यानी पार्टी के कई बड़े नेताओं की बगावत से भी दो-चार होना पड़ा. मायावती को जिसने भी चुनौती दी उसे बसपा से बाहर का रास्ता दिखा ही दिया गया, दलित वोटरों ने भी ऐसे नेताओं का साथ नहीं दिया. यही वजह थी कि सत्ता से बाहर आने के बाद यह नेता अपना वजूद नहीं बचा पाए.

परवेज कहते हैं कि यूपी में दलित का एक बड़ा तबका मायावती के साथ है, 2019 के लोकसभा चुनाव में इसका असर भी दिखा है. हालांकि चंद्रशेखर और प्रियंका गांधी जिस तरह से सक्रिय हैं और दलित वोटर को साधने की कवायद कर रहे हैं, इससे अब मायावती के सामने अपने वोट बैंक को बचाए रखने की बड़ी चुनौती होगी. इसके अलावा प्रियंका गांधी के दलित मुद्दों को उठाने के पीछे एक बड़ी वजह यह भी है कि दलित समुदाय पिछले चुनाव में बीजेपी के साथ आया है, वह किसी तरह से दूर हो जाए ताकि कांग्रेस की भविष्य की सियासी राह खुल सके.

उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार काशी प्रसाद यादव कहते हैं कि महज सात विधायकों वाली कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल के रूप में अपनी जगह लगातार बनाती जा रही है. प्रियंका गांधी लगाातर मुद्दे तो उठा रही हैं, लेकिन दलित-ओबीसी समुदाय के बीच संवाद स्थापित नहीं कर पा रही हैं. इसके चलते कांग्रेस उसे वोटों में तब्दील नहीं कर पा रही है, लेकिन कांग्रेस लगातार चर्चा के केंद्र में बनी हुई है.

काशी यादव कहते हैं कि चंद्रशेखर दलितों के बीच एक फैक्टर के रूप में उभरे हैं, लेकिन मायावती ही सबसे बड़ा चेहरा हैं. मायावती और चंद्रशेखर दोनों ही दलित समुदाय के जाटव समाज से आते हैं और दोनों लोग पश्चिम यूपी से हैं. जाटव समाज दलितों में राजनीतिक रूप से सबसे ज्यादा जागरुक है. हालांकि, मायावती की मुश्किल यह है कि उन्होंने अपने सियासी जीवन में दलितों को लुभाने के लिए जिन मुद्दों को कभी हवा नहीं दी, चंदशेखर उन्हीं मुद्दों को हवा दे रहे हैं. इतना ही नहीं चंद्रशेखर उन लोगों के साथ खड़ा नजर आते हैं जिससे मायावती हमेशा दूरी बनाकर चलती थीं.

वह कहते हैं कि मायावती कांग्रेस से दूरी बनाकर चलती हैं, लेकिन भीम आर्मी प्रमुख प्रियंका से निकटता बनाए हुए हैं. मायावती उत्तर प्रदेश में दलित समुदाय सहित हर मुद्दे पर करीब-करीब मौन रहती हैं. कुछ महीने में एकाध बार मायावती भी किसी मुद्दे पर बयान देती हैं, लेकिन प्रियंका गांधी और चंद्रशेखर सक्रिय हैं. इससे दलित समुदाय में एक संदेश तो जा रहा है और इससे मायावती की राजनीतिक चिंता व तकलीफ बढ़ना स्वाभाविक है, लेकिन वोटों में कितना तब्दील होगा यह तो वक्त ही बताएगा. पीएलसी।PLC.

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