Sunday, January 26th, 2020

पूर्ण राज्य मुद्दा कहाँ तक उचित?

आई एन वी सी न्यूज़ नई दिल्ली, आज दिल्ली क्यों पूर्ण राज्य का दर्ज़ा मांग रही है? इस सवाल के तार इतिहास से जुड़े हैं। सन् 1911 में दिल्ली ब्रिटिश इंडिया की राजधानी बनाई गयी। तब से लेकर आज़ादी तक दिल्ली को चीफ़ कमिश्नर के अधीन रखा गया। 1947 में पट्टाभि सीतारमैया कमेटी बनाई गई, जिसने सुझाव दिया कि दिल्ली को केंद्र के निर्देश पर नियुक्त लेफ्टिनेंट गवर्नर के अधीन संचालित किया जाए। 1950 के बाद राजधानी क्षेत्र होने के साथ दिल्ली की बढ़ती आबादी और महत्व के कारण इसे एक विशेष राज्य बनाने की जरूरत महसूस की गई। नेहरू सरकार ने यह व्यवस्था की कि दिल्ली में चुनाव होंगे और इसकी अलग रूपरेखा निर्धारित की जाएगी। जिसके तहत 1951 में श्री ब्रह्मप्रकाश को दिल्ली का पहला मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन मुख्यमंत्री और लेफ्टिनेंट गवर्नर के बीच अधिकारों व निर्णय लेने में आई मुश्किलों की वजह से मुख्यमंत्री ने इस्तीफ़ा दे दिया। 1956 में ‘स्टेट रि-ओर्गेनाइज़ेशन ऐक्ट’ के तहत मुख्यमंत्री पद को खत्म करके दिल्ली की कमान लेफ्टिनेंट गवर्नर को सौंप दी गई। 1987 में ‘बालाकृष्णन समिति’ ने सुझाव दिया कि दिल्ली में विधानसभा हो, जिसे ज़मीन, पुलिस और पब्लिक ऑर्डर को छोड़कर राज्य सूची से संबन्धित विषयों पर कानून बनाने का हक़ मिले। इस समिति के सुझावों को मानते हुए ही 1993 में भाजपा के मदन लाल खुराना के नेतृत्व में दिल्ली की चुनी हुई सरकार गठित हुई। दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने की लड़ाई आज की नहीं है। 90 के दशक से भाजपा और काँग्रेस दोनों इस सवाल को उठाती रही हैं। दोनों पार्टियों ने पूर्ण राज्य के सवाल को अपने चुनावी मेनिफेस्टो में भी रखा। लेकिन इसके किर्यान्वयन में कोई गंभीरता नहीं दिखाई। पूर्ण राज्य के सवाल से बचने के लिए ये दोनों दल कभी केंद्र तो कभी दिल्ली विधानसभा में अपनी सरकार न होने को वजह बताते रहे। लेकिन ऐसे भी मौके आए, जब केंद्र और दिल्ली विधानसभा दोनों में एक ही दल की सरकारें थीं। यह मौका भाजपा और काँग्रेस दोनों को मिला। लेकिन दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्ज़ा दिलाने के मसले पर ये टालमटोल करते रहे, कोई ठोस कदम नहीं उठाए। आज भी इस मसले पर इन दोनों दलों का रुख दिल्ली को पूर्ण राज्य देने के हक़ में नहीं है। वर्तमान दिल्ली भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी ने तो यहाँ तक कह दिया कि दिल्ली पूर्ण राज्य बन ही नहीं सकती। काँग्रेस का स्टैंड भी इससे बहुत अलग नहीं है। अब यह समझने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि भाजपा और काँग्रेस दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्ज़ा देने पक्ष में ही नहीं है। पूर्ण राज्य की मांग इनके लिए ‘चुनावी जुमला’ भर है। आज दिल्ली का शासन एक पंचमेल खिचड़ी की तरह है, जिसे कई निकाय मिलकर चलाते हैं। इनमें कुछ तो पूर्ण रूप से स्वायत हैं, कुछ सीधे सीधे केंद्र द्वारा संचालित किए जाते हैं। थोड़े अधिकार दिल्ली की चुनी हुई सरकार के पास भी हैं, जो अपने आप में बेहद सीमित और दिल्ली की तरक्की के लिए नाकाफी हैं। दिल्ली में आम चुनावों के ज़रिए जो सरकार चुनी जाती है, उसके समानान्तर तीन नगर निगम, नई दिल्ली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (NDMC), ‘दिल्ली कैंटोनमेंट बोर्ड’ और ‘दिल्ली विकास प्राधिकरण’ (DDA) स्वायत्त तौर पर शासन करते हैं। जिन पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष केंद्र का नियंत्रण होता है। इनके अलावा दिल्ली के संचालन में एक अहम कड़ी है- लेफ्टिनेंट गवर्नर। दिल्ली सरकार के द्वारा लिए गए सभी निर्णयों को लेफ्टिनेंट गवर्नर के हस्ताक्षर से ही मान्यता मिलती है, जो केंद्र सरकार के निर्देश पर राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाते हैं। दिल्ली पुलिस भी केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आती है। ऐसे में यह समझना बेहद आसान है कि दरअसल दिल्ली में चुनी हुई सरकार के अलावा भी कई ‘सरकारें’ काम करती हैं। जिससे प्राशानिक तौर पर एक ‘केयोस’ जैसी स्थितियाँ हमेशा बनी रहती हैं। दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के मसले पर अक्सर यह सवाल उठता है कि केंद्र सरकार और उससे सम्बद्ध केंद्रीय निकायों, दूतावासों समेत तमाम संवेदनशील मुख्यालयों को एक राज्य सरकार के अधीन रखा जाना कहाँ तक उचित है? इसका सीधा सा जवाब है कि केंद्र के नियंत्रण से संचालित एनडीएमसी को उसके अधिकारों के साथ बरकरार रखा जाए, जो नई दिल्ली में स्थित केंद्र और उससे जुड़ी संवेदनशील जगहों को संचालित करती है। पूर्ण राज्य का मुद्दा सिर्फ दिल्ली के बाकी हिस्सों पर ही लागू होता है, जहां केंद्र सरकार और उससे संबन्धित संवेदनशील निकायों की मौजूदगी नहीं है। आम आदमी पार्टी पूर्ण राज्य के सवाल को एक आंदोलन का शक्ल देना चाहती है। इस आंदोलन कि अहमियत को इन बिन्दुओं के ज़रिए समझा जा सकता है। भारतीय लोकतन्त्र में जनता के मत को लालफ़ीताशाही से ज़्यादा तवज्जो दी गई है। इसीलिए कार्यपालिका में चुने हुए जन-प्रतिनिधियों को नियुक्त किए गए अधिकारियों से ज़्यादा महत्व दिया गया है। इस बात को मद्देनजर रखते हुए न्यायपालिका को न्याय संबंधी संचालन का हक़ है। कानून बनाने का हक़ विधायिका यानी चुने हुए जन-प्रतिनिधियों के पास है। यह हमारे संसदीय लोकतन्त्र व संविधान की बुनियाद है। दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्ज़ा न देना न सिर्फ इस अवधारणा के खिलाफ़ है, बल्कि दिल्ली की जनता के मताधिकार का अपमान भी है। क्योंकि हालिया व्यवस्था में दिल्ली के निवासियों का वोट यह तय नहीं करता कि यहाँ का शासन कैसे चले। जबकि बाकी राज्यों की जनता का मत यह तय करता है कि उनके राज्य का संचालन कौन करेगा और कैसे करेगा। आबादी के लिहाज से देखा जाए, तो दिल्ली में कई राज्यों और देशों से अधिक लोग रहते हैं। आंकड़ों में जाएँ तो दिल्ली की आबादी तकरीबन 164 देशों से ज़्यादा है। इतनी बड़ी आबादी वाले भू-भाग को एक शहर या केंद्र शासित भर कहा देना कहाँ तक जायज़ है? मुंबई के बाद दिल्ली मुल्क का दूसरा सबसे ज़्यादा कर देने वाला शहर है। दिल्ली की जनता केंद्र को कर के रूप में डेढ़ लाख करोड़ रुपए देती है। इसके बदले में दिल्ली के विकास के लिए उसे महज़ तीन सौ पच्चीस करोड़ मिलता है। दिल्ली की जनता के आधे पैसे का भी इस्तेमाल अगर दिल्ली के विकास में नहीं हो पा रहा है, तो दिल्ली अपनी वर्तमान स्थिति में रहने के लिए क्यों मजबूर रहे। संसदीय लोकतन्त्र में जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी चुनी हुई सरकार पर होती है। सरकारें अपनी जनता के प्रति जवाबदेह होती हैं। जबकि दिल्ली की चुनी हुई सरकार के पास सुरक्षा जैसे अहम मसले पर किसी भी तरह का फ़ैसला करने का हक़ ही नहीं है। दिल्ली की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी दिल्ली पुलिस के पास है, जो केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है। केंद्र के पास भारत जैसे विशाल देश की ज़िम्मेदारी है, ऐसे में दिल्ली की सुरक्षा का अतिरिक्त बोझ प्रशासनिक कुशलता के लिहाज से भी सही नहीं है। अपराध के मामलों में दिल्ली देश के कई हिस्सों से आगे है। महिला सुरक्षा दिल्ली की एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में व्यावहारिक यही होगा कि दिल्ली पुलिस को दिल्ली सरकार के अधीन किया जाए। दिल्ली के लोगों की उम्मीदें तभी पूरी की जा सकती हैं, जब विकास से संबन्धित निर्णय लेने के सभी अधिकार चुनी हुई सरकार के पास होंगे। वर्तमान दिल्ली सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, बिजली, पानी, इन्फ्रा-स्ट्रक्चर को बेहतर बनाने के सपने के साथ आई थी। चार सालों के बाद हम देख सकते हैं कि इस सरकार ने इन क्षेत्रों में बुनियादी बदलाव किए हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे ज़रूरी मसलों पर सरकार के किए गए कामों की सराहना न केवल राष्ट्रीय, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी की जा रही है। अभी भी कई ज़रूरी कामों की फ़ाइलें केंद्र सरकार ने अटका रखी है। पूर्ण राज्य का दर्जा मिले बगैर इन कामों को सुचारू रूप से नहीं किया जा सकता है। अच्छे अंक लाने के बावजूद बारहवीं के बाद दिल्ली के विद्यार्थियों को कॉलेजों में दाख़िला नहीं मिल पाता। दिल्ली सरकार चाहती है कि दिल्ली में नए कॉलेजों और विश्वविद्यालय का निर्माण हो, ताकि सबको दाख़िला मिले। लेकिन ज़मीन का अधिकार न होने की वजह से वह यह नहीं कर पाती। दिल्ली सरकार समय समय पर रोज़गार मेले का आयोजन कराती रही है, जिससे हजारों की संख्या में बेरोजगार युवा लाभान्वित हुए हैं। लेकिन इनमें से अधिकांश रोजगार प्राइवेट और अस्थाई प्रकृति के ही रहे। दिल्ली में 2 लाख से अधिक सरकारी नौकरियाँ रिक्त पड़ी हैं, जिन पर स्थाई नियुक्ति देने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। यह विडम्बना है कि लाखों पदों के रिक्त रहने के बाद भी दिल्ली सरकार दिल्ली के युवाओं को नौकरियाँ नहीं दे सकती। अगर दिल्ली एक पूर्ण राज्य होती, तो दिल्ली के युवाओं को स्थाई रोज़गार मिलता। देश के बाकी हिस्सों के लोग राज्यों की सरकारें अपने मत से तय करते हैं। राज्य सरकारों की पूरी जवाबदेही राज्य की जनता के प्रति होती है। लेकिन दिल्ली की स्थिति ऐसी नहीं है। न तो दिल्ली वासियों के मत को वह अधिकार मिला है कि वे एक ऐसी सरकार चुनें, जिस पर दिल्ली के शासन की पूरी ज़िम्मेदारी हो और न ही दिल्ली सरकार को ही ये हक़ है कि वह पूरी दिल्ली पर अपना शासन चलाए। स्पष्ट है कि दिल्ली के लोगों के मत का मूल्य दोयम दर्जे का है, जो संविधान प्रदत्त समानता के अधिकार के खिलाफ़ है। दिल्ली को पूर्ण राज्य की मांग यहाँ की जनता की मांग है, उनके हक़ और सम्मान की मांग है।



 

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