Sunday, December 15th, 2019

पूनर्गठित योजना आयोग मे हिमालयी एवं पूर्वोत्तर राज्यों की समस्याओं को ध्यान में रखते हुये अलग से प्रकोष्ठ स्थापित किया जाए : हरीश रावत

harish rawat with narendra modi ,invc news

आई एन वी सी न्यूज़ नई दिल्ली , देश के समावेशी विकास में योजना आयोग की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए इसे भंग करने के स्थान पर वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप इसका पुनर्गठन किया जाए। नई दिल्ली में 7 आरसीआर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में प्रतिभाग करते हुए उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि राज्यों से विचार विमर्श किए बिना योजना आयोग को समाप्त करने की एकतरफा घोषणा संघीय व्यवस्था के विरूद्ध है। योजना आयोग को समाप्त करने की बजाय इसका पुनर्गठन करते हुए इसे वैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए। इसमें सभी राज्यों को समुचित प्रतिनिधित्व दिया जाए व इसमें राज्यों के शिकायतों के निवारण तंत्र की प्रणाली विकसित की जाए। संसाधनों के आवंटन का कार्य वित्त आयोग या वित्त मंत्रालय को सौंपने की बजाय योजना आयोग के पास ही रहने दिया जाए। मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि पुनर्गठित योजना आयोग मे हिमालयी एवं पूर्वोत्तर राज्यों की विशिष्ट भौगोलिक विशिष्टताओं एवं उससे उत्पन्न समस्याओं को ध्यान में रखते हुये अलग से प्रकोष्ठ स्थापित किया जाए ताकि समावेशी विकास सुनिश्चित किया जा सके। संसाधनों के आवंटन के साथ ही माॅनिटरिंग व मूल्यांकन का दायित्व भी पुनर्गठित आयोग के पास ही रहने दिया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री श्री रावत ने कहा कि सहयोगात्मक संघीय आधार के रूप में केंद्रीय योजना आयोग की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसकी भूमिका राज्यों एवं केन्द्र के मध्य विचार मंच के तौर पर भी रही है। योजना आयोग को एक तरफा भंग किया जाना और भंग करने के उपरांत अन्य संस्था के सम्बन्ध में विचार विमर्श हेतु लगभग 100 दिन बाद राज्यों के मुख्यमंत्रियों को बुलाना यह हमारे संघीय व्यवस्था के विरूद्व है। योजना आयोग द्वारा समावेशी विकास में बहुत अच्छा योगदान दिया गया है और खासकर कम संसाधन वाले राज्यों को अपनी समस्या रखने का एक मंच दिया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि देश में संसाधनों की कमी को देखते हुए योजना आयोग का दायित्व नियोजित विकास करने का था साथ ही संविधान के अनुच्छेद-39 के अन्तर्गत क्पतमबजपअम च्तपदबपचसमे व िैजंजम च्वसपबल को लागू करने का दायित्व भी दिया गया था। योजना आयोग, सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के बीच वार्ता का एक मंच था और आयोग द्वारा पहली बार गैर सरकारी संस्थाओं को बुलाकर योजना आयोग को सीधे-सीधे आम आदमी से जोड़ा गया। यह कार्य भारत सरकार का कोई मंत्रालय नहीं कर सकता है। हमारे देश में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अल्पसंख्यक इत्यादि हैं जिनका भविष्य मार्केट के अधीन नहीं छोड़ा जा सकता। सीएम ने कहा कि ‘‘मेरे विचार में योजना आयोग को खत्म नहीं करना चाहिए, बल्कि इसी का पुनर्गठन करके इसे सुदृढ़ किया जाना चाहिए।’’  वित्त आयोग जो केन्द्र एवं राज्यों के मध्य वित्तीय संबंधों एवं करों से प्राप्त राजस्व के फामूर्ला आधारित वितरण कार्य का वहन कर रहा है को आयोजनागत संसाधानों के आवंटन का कार्य देना उचित नहीं होगा। पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से देश एवं प्रदेशों के विकास हेतु दिशा एवं दृष्टि प्राप्त होती रही है। हमारी जटिल सामाजिक एवं आर्थिक संरचना को ध्यान में रखते हुये विकास की प्रक्रिया को पूर्णतः बाजार शक्तियों के भरोसे नहीं छोडा जा सकता है। यदि हम ऐसा करते हैं तो देश का विकास समावेशी नहीं होगा। जब हम समावेशी विकास की बात करते है इसके लिये विभिन्न क्षेत्रों एवं सामाजिक वर्गों के मध्य असंतुलन को दूर करने पर भी ध्यान देना होगा। इसलिए पंचवर्षीय योजना प्रणाली को जारी रखना उचित होगा। मुख्यमंत्री श्री रावत ने कहा कि योजना आयोग को नवाचार व ज्ञान केंद्र के रूप में विकसित किया जाए। वर्तमान में संचालित नवाचार एवं ज्ञान परिषदों को इस संस्था के साथ एकीकृत किया जाय। यह संस्था नवाचार हेतु उचित वातावरण तैयार करे। इसके साथ-साथ विभिन्न राज्यों के मध्य उनके द्वारा सृजित ज्ञान एवं अनुभवों के आदान-प्रदान केन्द्र के रूप में कार्य करें। साथ ही नवाचार एवं शोध से प्राप्त ज्ञान को वास्तविक धरातल पर उपयोग करने हेतु मार्ग तैयार करें। मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमालयी व उत्तर पूर्वी राज्य प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष देश को अमूल्य वन एवं पर्यावरण सेवाएं प्रदान करते हैं। वन सम्बंधी बाध्यताओ के कारण ये राज्य विकास में अपने संसाधनों का दोहन नहीं कर पाते हैं। इसकी क्षतिपूर्ति भी इन राज्यों को नहीं की जाती है। हिमालयी राज्यों द्वारा प्रदत्त इको सिस्टम सेवाओं को राष्ट्रीय लेखा प्रणाली में शामिल नहीं किया जाता है। सीएसओ, आईआईएफएम व लीड संस्था द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार उत्तराखण्ड अपने वनों से देश को सालाना 1,61,921 करोड़ रूपए की प्रत्यक्ष व परोक्ष इको सिस्टम सेवाएं प्रदान करता है। परंतु राज्य को इसकी क्षतिपूर्ति भुगतान की कोई व्यवस्था नहीं है। पर्यावरण के नाम पर स्वीकृति के बाद भी राज्य के हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट रोक दिए गए जिससे प्रतिवर्ष उत्तराखण्ड को 1800 करोड़ रूपए का नुकसान हो रहा है। योजना आयोग की बीके चतुर्वेदी समिति ने भी माना था कि हिमालयी व उत्तर पूर्वी राज्यों को उनके द्वारा प्रदत्त पर्यावरण सेवाओं का मूल्य मिलना चाहिए। योजना आयोग पर्यावरण निष्पादन सूचकांक;म्च्प्द्ध बनाने की प्रक्रिया में था जिससे बजट आवंटन में हिमालयी व उत्तर पूर्वी राज्यों को प्रोत्साहन राशि दी जाती। योजना आयोग को समाप्त किए जाने से इन राज्यों को उनके द्वारा प्रदत्त पर्यावरण सेवाओं के मूल्य भुगतान का अति महत्वपूर्ण मामला अधर में रह जाएगा।

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