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लखनऊ,
श्रमजीवी पत्राकारों को अधिक संख्या में पुस्तकें लिखनी चाहिए ताकि जनसाधारण का ज्ञान और बढ़े। लोहिया पार्क में एक सार्वजनिक सभा में पूर्व रक्षा मंत्राी मुलायम सिंह यादव तथा उ.प्र. के मुख्यमंत्राी अखिलेश यादव ने पत्राकार के. विक्रम राव की पुस्तक ”न रूकी, न झुकी यह कलम“ का लोकार्पण करते समय यह सुझाव दिया। अनामिका (दिल्ली) द्वारा 45 लेखों का यह संग्रह विभिन्न राष्ट्रीय दैनिक में छपी रचनाओं का संकलन हैं। इसमें विविध विषयों पर विचारोत्तेजक लेख हैं। माओवादियों के खिलाफ आदिवासियों द्वारा जनयुद्ध, कम्युनिस्ट चीन के उइगर प्रदेश में मुसलमानों को घेंटे का गोश्त जबरन खिलाना, सेक्युलर बलूचिस्तान का इस्लामी पकिस्तान द्वारा दमन, अलहिलाल तथा नेशनल हेरल्ड का स्वाधीनता संग्राम में योगदान, समाजवादियों द्वारा नेहरू का महिमंडन करना और सुभाषचंद्र बोस के साथ दगा करना, दलित-मुस्लिम द्वारा संस्कृत की प्रधानता, नालों पर शिवाले और चैराहों पर मज़ार में अफीम विक्रय केंद्र बनाना। ऐसे कई मसलों पर विक्रम राव  की बेलौस कलम चली है। इन लेखों में जानकारी दुर्लभ है, विश्लेषण तर्किक है, भाषा में रवानगी है। मुहावरे भी नए हैं, लीक तोड़ते हुए।    श्री विक्रम राव ने कहा इतिहास ऐसी साजिशों की कथाओं से भरा है, जब जिह्ना को सुन्न किया गया। कलम को कुंद बनाया गया। अभिव्यक्ति को अवरुद्ध कर दिया गया। मगर विचार निर्बाध रहे क्योंकि उसे कैद करने की जंजीर इजाद नहीं हुई है। श्रमजीवी पत्राकार की लेखनी कबीर की लुकाटी की भांति है। घर फंूक कर वह जनपक्ष में जूझती है।    मुख्यमंत्राी ने कहा स्वाधीन भारत में अभिव्यक्ति के खिलाफ क्रूरतम दमनचक्र (1975-77) चला था, तब विक्रम राव दूसरी जंगेआजादी की प्रथम पंक्ति में थे। अखबारी संेशरशिप से लड़तेे भारत की छह जेलों और थानों में पुलिसिया अत्याचार सहते रहे। बाकियों से जुदा थे।

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