Friday, April 10th, 2020

पहाड़ और खाई के बीच फंसी बिहार की जनता : BSD

Bharatiya Suraaj Dal,BSDआई एन वी सी न्यूज़

नई दिल्ली, बिहार के चुनावों के परिणाम सांप्रदायिक विचारधारा की पराजय के रूप में देखे जा सकते हैं. उन्हें जातिवादी विचारधारा की विजय के रूप में भी देखा जा सकता है, जो बिहार में गहरी जड़ें जमा चुकी है. जब जनता के पास कोई सचमुच का स्वस्थ विकल्प नहीं होता तो वह या तो साम्प्रदयिक शक्तियों या जातिवादी शक्तियों के पक्ष में मतदान करती है. इससे भी बुरा यह है की जनता ऎसी पार्टियों और नेताओं को सर्वाधिक सीटें भी प्रदान कर सकती है, जो भ्रष्टाचार और जंगल राज के लिए कुख्यात हैं. लालू की पार्टी को सबसे अधिक सीटें  मिलना यही दरसाता है. नीतीश ने अपने पहले पांच वर्षों  के शासन में भ्रष्टाचार रोकने की थोड़ी से कोशिश जरूर की थी, मगर दूसरे पांच वर्षों में उन्होंने हथियार डाल दिए और बिहार रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के मामले में  किसी अन्य भ्रष्ट राज्य से बेहतर नहीं है. नयी सरकार अब तो लालू और उनकी पार्टी  पर बुरी तरह  से निर्भर होगी. इसलिए बिहार की जनता किसी अच्छे भविष्य की आशा कर सकती है, ऐसा नहीं लगता. बिहार चुनावों  के परिणाम यही सिखाते हैं की जनता के  पास एक घड़ी के पेंडुलम के  सामान देश के प्रजातांत्रिक स्पेस में दो बिन्दुओं के बीच डोलते रहेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है. ऐसे माहौल में सभी ऐसे नागरिकों का, जो सही सोच रखते हैं और देश और देश  के  लोकतंत्र के लिए चिंता रखते हैं,एक मंच पर जमा हो कर एक स्वस्थ राजनीतिक  विकल्प देने की कोशिश करनी चाहिए न कि मूक  दर्शक बन कर तमाशा देखते रहना चाहिए, और देश को साम्प्रदायिकता और जातीयता दोनों  के अभिशाप से मुक्त करने की कोशिश करनी  चाहिए. आज की राजनीतिक व्यवस्था में चाहे जो भी दल जीतता है, देश पराजित हो जाता है और लोकतंत्र  हार जाता है. भारतीय सुराज दल इस वर्त्तमान राजनीतिक और  चुनावी  व्यवस्था के विरुद्ध आन्दोलन की योजना बना रहा है जो ईमानदार पार्टियों और ईमानदार व्यक्तियों को सत्ता तक पहुँचना लगभग असंभव बना देती है.

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