तनवीर जाफ़री **,,
स्वतंत्र भारत के इतिहास में देश पहली बार वृहद् पैमाने पर चलाए जा रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों के दौर से गुज़र रहा है। जनलोकपाल विधेयक, इंडिया अगेंस्टकरप्शन, अन्ना हज़ारे, टीम अन्ना, अरविंद केजरीवाल, जंतर-मंतर पर होने वाले भ्रष्टाचार विरोधी धरने, रामलीला मैदान पर होने वाले भ्रष्टाचार संबंधी धरने वप्रदर्शन यह सभी इसी भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के दौरान उभरने वाले कुछ ऐसे नाम व घटनाक्रम हैं जिनके संबंध में देश शायद पहले इतना वाकिफ नहीं था। सवालयह है कि क्या गत् दो-चार वर्षों में ही देश में भ्रष्टाचार इतना अधिक बढ़ गया कि ऐसे क्रांतिकारी सामाजिक कार्यकर्ताओं, समाजसेवी संगठनों व भ्रष्टाचार विरोधीआंदोलनों की आवश्यकता महसूस की जाने लगी? या फिर भ्रष्टाचार का यह नासूर स्वतंत्रता के बाद से ही देश की अर्थव्यवस्था को इस कद्र खोखला करता जा रहाथा कि देश के कुछ शुभचिंतकों से इसका और अधिक बढऩा सहन नहीं किया जा सका और उन्होंने सार्वजनिक रूप से इस पर नियंत्रण किए जाने हेतु अपनीविभिन्न मांगों को लेकर आंदोलनों की शुरुआत कर डाली? मोटे तौर पर इन आंदोलनों से अब तक यही निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि चाहे वह सत्तारूढ़ दल हों यादेश के अन्य विपक्षी दल, सभी में भ्रष्ट लोगों की भरमार देखी जा रही है। अन्ना हज़ारे जहां इस बढ़ते भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने के लिए जनलोकपाल विधेयक कीज़रूरत महसूस कर रहे हैं वहीं अरविंद केजरीवाल वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था का स्वयं अंग बनकर इसमें परिवर्तन लाने की बात सोच रहे हैं।
परंतु भ्रष्टाचार का विरोध करने वाले तमाम बौद्धिक लोगों का यह भी मत है कि कोई नया $कानून बनाने मात्र से भ्रष्टाचार का अंत $कतई नहीं होने वाला। देश मेंपहले से ही रिश्वत,भ्रष्टाचार तथा अनैतिकतापूर्ण आचरण के विरुद्ध तमाम कानून बने हुए हैं। समय-समय पर इन्हीं कानूनों के अंतर्गत तमाम लोग गिर$फ्तार भीहोते रहे हैं तथा ऐसे लोगों ने जेल की हवा भी खाई है। लिहाज़ा जनलोकपाल या लोकपाल जैसा कोई नया कानून देश में भ्रष्टाचार विरोधी कोई नई क्रांति पैदा करदेगा ऐसा कतई नहीं लगता। रहा सवाल केजरीवाल के व्यवस्था परिवर्तन करने की कोशिशों का तो यदि मान लिया जाए कि अरविंद केजरीवाल अगला लोकसभाचुनाव किसी संसदीय क्षेत्र से लडक़र जीत भी जाते हैं तथा वे संसद में पहुंच जाने में कामयाब भी हो जाते हैं तो सवाल यह है कि वे अकेले संसद में व्यवस्थापरिवर्तन कैसे करा सकेंगे? जिस संसद में संख्या बल के आधार पर सरकारें बनती व गिरती हों, जहां संख्या बल के आधार पर ही कानून बनते हों, इसी आधार परअविश्वास मत का भविष्य निर्धारित होता हो वहां अकेले अरविंद केजरीवाल चुनाव जीतने के बावजूद आखिर कैसे देश की राजनैतिक व्यवस्था को परिवर्तित करसकेंगे? उदाहरणार्थ कुछ समय पूर्व जब संसद में सांसदों की तनख्वाह व भत्ते की बढ़ोत्तरी का प्रस्ताव सदन में आया तो 543 सांसदों में एक ऐसे माननीय सांसद भीथे जिन्होंने सांसदों का वेतन व भत्ता बढ़ाए जाने का विरोध किया। पंरतु स्वाभाविक रूप से उनका विरोध राष्ट्रीय स्तर पर कहीं सुनाई भी नहीं दिया और अपनीआमदनी बढऩे जैसे इस प्रस्ताव पर पक्ष-विपक्ष दोनों ने एकजुट होकर यह प्रस्ताव पारित करा दिया।
कुछ ऐसा ही उस समय भी देखने को मिल सकता है जबकि चुनाव जीतने के बाद अरविंद केजरीवाल संसद में खड़े होकर भ्रष्टाचार या भ्रष्टाचारियों के विरद्ध अपनीआवाज़ बुलंद कर रहे हों और शेष सांसद सदन में इनकी किसी भी आवाज़ को बुलंद ही न होने दें, ऐसे में कैसे होगा व्यवस्था परिवर्तन और कैसे बदलेगा राजनीति,राजनैतिक व्यवस्था तथा इससे ग्रसित संसद का वर्तमान चेहरा? हमारे देश में तमाम लोगों का यह भी मानना है कि हालांकि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों में सक्रियलोगों की नीयत व उनके प्रयासों पर शक करने के बजाए उनका स्वागत तो किया जाना चाहिए। परंतु साथ-साथ इस कैंसररूपी समस्या के समाधान का पु$ख्ताप्रबंध किए जाने का उपाय भी ज़रूर किया जाना चाहिए। केवल आंदोलन, अनशन, रैली, धरना, प्रदर्शन व एक-दो ईमानदार लोगों के सांसद चुने जाने मात्र से देश सेभ्रष्टाचार समाप्त नहीं होने वाला। इसके लिए सर्वप्रथम तो यह ज़रूरी है कि भ्रष्टाचार तथा सदाचार की परिभाषा निर्धारित की जाए। रिश्वत व सुविधाशुल्क में अंतरस्पष्ट किया जाए। चुनाव लडऩे हेतु बड़े पैमाने पर होने वाली चंदा वसूली व काले धन के आवागमन से लेकर स्कूल व कॉलेज में बच्चों के प्रवेश शुल्क जमा करने केनाम पर होने वाले घपले तथा घर के बाहर नाली की सफाई कराए जाने तक होने वाले आर्थिक लेन-देन को वर्गीकृत किये जाने की ज़रूरत है। दो छोटे-छोटेउदाहरणों के साथ यह बात और भी स्पष्ट हो जाएगी कि भ्रष्टाचार में केवल विशेष लोग ही शामिल रहते हैं या इसे कहीं-कहीं ‘सरकारी जामा’ भी पहनाया जाता है?कुछ वर्ष पूर्र्व मेरे एक परिचित ने शस्त्र लाईसेंस हेतु आवेदन किया। जब यह आवेदन अपने अंतिम चरण पर जि़लाधिकारी के कार्यालय में पहुंचा तो जि़लाधिकारीके कार्यालय से उसे निर्देश दिया गया कि वह पच्चीस हज़ार रुपये का चंदा रेडक्रास सोसायटी को देकर उसकी रसीद ले आए। तभी उसका आर्म लाईसेंस बन सकेगा।मेरे परिचित व्यक्ति ने जब मुझे इस बात की सूचना दी तो मैंने अपने जि़लाधिकारी से इस बाबत जानकारी लेनी चाही। अधिकारी ने साफ़ तौर पर कहा कि जबशस्त्र लाईसेंस लेने वाला व्यक्ति 3-4 लाख रुपये की पिस्टल खरीद सकता है तो वह रेडक्रास सोसायटी को पच्चीस हज़ार रुपये का चंदा क्यों नहीं दे सकता? बहरहालमेरे हस्तक्षेप के बाद जि़लाधिकारी ने केवल पांच हज़ार रुपये की रसीद कटवाने का आदेश दिया। हूबहू ऐसी ही घटना मेरे एक और परिचित व्यक्ति को लेकर घटी।उसने भी शस्त्र लाईसेंस हेतु आवेदन किया था। उस समय एक दूसरा जि़लाधिकारी था। उसके कार्यालय से उस आवेदन कर्ता से सीधे तौर पर रिश्वत तलब की गई।न रेडक्रास की पर्ची न किसी प्रकार के चंदे की बात।
बात सीधी सी है और वह है किसी भी व्यक्ति की सुविधा की बात। यदि आप किसी डॉक्टर को दिखाने हेतु उसी $फीस का अग्रिम भुगतान पाच सौ रुपये करते हैं औरउसी बीच कोई दूसरा व्यक्ति आपके बाद आ धमकता है और वह डॉक्टर को आपसे पहले दिखाना चाह रहा है तो प्राईवेट डॉक्टर्स ने बाकायदा अतिरिक्त $फीस वसूलकर ऐसे मरीज़ को पहले देखे जाने की व्यवस्था कर रखी है। यह क्या है,सामान्य शुल्क, रिश्वत या सुविधाशुल्क? इसी प्रकार एक व्यक्ति यदि ड्राईविंग लाईसेंसबनवाना चाहता है तो उसे दो-तीन दिनों तक घूम-घूम कर विभिन्न प्रकार के दस्तावेज़ जुटाने होते हैं। उन्हें सिलसिलेवार इकठा कर उनकी फाईल बनानी होती है।कई जगह फीस देकर पर्चियां कटानी होती हैं। कोई भी व्यस्त व्यक्ति एक-दो दिन चक्कर काटने जैसे पचड़े में नहीं पडऩा चाहता। वह इससे बेहतर यह समझता हैकि किसी दलाल को दौ सौ रुपये अतिरिक्त देकर अपना काम यथाशीघ्र व बिना लंबी लाईन में लगे हुए करा लिया जाए। अब ऐसे में दलाल द्वारा किया जा रहा कामकिस श्रेणी में गिना जाना चाहिए़ वह भ्रष्टाचारी है या सदाचारी? और ऐसी सुविधाएं चाहने वाले लोग स्वयं भ्रष्टाचारी हैं या सदाचारी? गली-मोहल्लों व नालियों कीस$फाई के स्तर तक यही बातें देखी जा रही हैं। हालांकि सफाई कर्मचारी सरकारी कर्मचारी होते हैं तथा स्थानीय नगरपालिकाएं, निगम या महापालिकाएं उन्हेंतन$ख्वाह देती हैं। परंतु सफाई कर्मी भी जिस गली या मोहल्ले की सफाई करते हैं या जिसके घर के आगे की नाली साफ करते हैं उससे अतिरिक्त पैसों की उम्मीदरखते हैं। ऐसे में तमाम लोग अपनी सुविधाओं के मद्देनज़र सफाई कर्मी को पैसे दे भी देते हैं। परिणामस्वरूप उसी कालोनी का जो व्यक्ति सफाईकर्मी को पैसा नहींदेता उसके घर के आसपास की गंदगी उठाने या उसके घर के सामने की नाली साफ करने से सफाई कर्मचारी कतराने लगते हैं। अब ज़रा गौर कीजिए कि यहां दोषकिसका है? जो व्यक्ति अपनी सुविधाओं के लिए भ्रष्टाचार का सहारा ले रहा है या किसी को सुविधा शुल्क दे रहा है वह तो अपनी मर्जी के अनुसार अपना काम करालेता है और जो सदाचार और सच्चाई के रास्ते पर चलने की कोशिश करता है उसके घर के आगे कूड़े का ढेर लग जाता है। पुलिस,ट्रांसपोर्ट,अस्पताल,नगरपालिका, कोर्ट व कचहरी जैसे तमाम सरकारी कार्यालयों से लेकर तमाम स्वायत्तशासी विभागों तक का लगभग यही हाल है।
क्या उपरोक्त परिस्थितियों से निपट पाने में जनलोकपाल कानून कोई सहायता कर सकेगा? क्या अरविंद केजरीवाल का व्यवस्था परिवर्तन का संकल्प जन-जनतक पहुंच चुकी इस ज़मीनी भ्रष्ट एवं प्रदूषित मानसिकता को बदल सकेगा? हालांकि अन्ना हज़ारे व अरविंद केजरीवाल दोनों ही के प्रयास व उनकी नीयत निश्चितरूप से सराहनीय व प्रशंसनीय है। परंतु ऐसा नहीं लगता कि कोई एक कानून या संसद में पहुंचा कोई एक केजरीवाल जैसा क्रांतिकारी व्यक्ति देश की राजनैतिकव्यवस्था को बदल सकता है। मेरे विचार से इससे अधिक ज़रूरी यह है कि भ्रष्टाचार व सदाचार की परिभाषा को ही स्पष्ट व रेखांकित किया जाए। सामाजिक स्तरपर आम लोगों को जागरूक किया जाए। उनकी ज़रूरतों, उनकी प्राथमिकताओं तथा भ्रष्टाचार व सदाचार के संबंध में उनके विचारों को समझ-बूझ कर ही किसीनतीजे पर पहुंचने का प्रयास किया जाए।

**Tanveer Jafri ( columnist),(About the Author) Author  Tanveer Jafri, Former Member of Haryana Sahitya Academy (Shasi Parishad),is a writer & columnist based in Haryana, India.He is related with hundreds of most popular daily news papers, magazines & portals in India and abroad. Jafri, Almost  writes in the field of communal harmony, world peace, anti communalism, anti terrorism, national integration, national & international politics etc.He is a devoted social activist for world peace, unity, integrity & global brotherhood. Thousands articles of the author have been published in different newspapers, websites & news-portals throughout the world. He is also a recipient of so many awards in the field of Communal Harmony & other social activities.
(Email : tanveerjafriamb@gmail.com)

Tanveer Jafri ( columnist),
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*Disclaimer: The views expressed by the author in this feature are entirely his own and do not necessarily reflect the views of INVC

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