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Thursday, September 24th, 2020

‘परंपराओं’ की रक्षा का पाखंड रचने वाले यह तालिबानी**

निर्मल रानी**,,

भारत -पाकिस्तान,अफगानिस्तान तथा बंगला देश जैसे रोज़ी-रोटी से जूझने वाले देशों से प्राय: कुछ नामनेहाद संगठनों द्वारा किसी न किसी विषय को लेकर फ़तवे अथवा तालिबानी फ़रमान जारी करने की ख़बरें  प्रकाश में आती रहती हैं। किसे क्या पहनना है, क्या नहीं पहनना है, कैसे चलना है, पढऩा है अथवा नहीं,कैसे लोगों के साथ मित्रता करनी है, मनोरंजन करना है या नहीं और यदि करना है तो उसके साधन क्या होने चाहिएं, अपनी जीवनशैली को किस प्रकार ढालना है जैसी तमाम बातें कुछ ऐसे कट्टरपंथी रूढ़ीवादी तथा लगभग अनपढ़ कहे जा सकने वाले कुछ ऐसे ही लोगों द्वारा तय की जाती हैं। गोया इन परंपराओं के तथाकथित ठेकेदारों से मानवाधिकारों का कोई लेना-देना नहीं है। अ$फगानिस्तान तथा उससे लगते पाकिस्तान के कबाईली इलाक़े तो इस प्रकार के तालिबानी $फरमानों से कुछ ज़्यादा ही प्रभावित हैं।

एक ओर जहां पूरा विश्व इस विषय पर एकमत है कि समाज के विकास के लिए शिक्षा विशेषकर महिलाओं का शिक्षित होना बेहद ज़रूरी है वहीं तालिबानों की नज़र में शिक्षा ख़ास तौर पर महिलाओं की शिक्षा उनकी परंपराओं व नैतिकता के विरुद्ध है। और यही वजह है कि यह अक़ल के दुश्मन अंधे तालिबानी दर्जनों शिक्षण संस्थानों को विस्फ़ोट द्वारा उड़ा चुके हैं। इतना ही नहीं बल्कि शिक्षा ग्रहण करने वाले छोटे बच्चों का यह मानवता विरोधी अनपढ़ तालिबानी कई बार अपहरण तक कर चुके हैं। इनकी जहालत, रूढ़ीवादिता,अंधविश्वास तथा कथित रूप से इनका अपनी परंपराओं व मान्यताओं के साथ चिपके रहना ही आज इनके पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण है। इनके तालिबानी फ़तवे व इनकी क्रूरता के चलते ही आज  अफ़गानिस्तान दुनिया के पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पा रहा है। बजाए इसके विदेशी पर्यटक अफ़गानिस्तान जाने से भी कतराते हैं। अफ़गानिस्तान को बदनाम करने में तालिबानों की भूमिका का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज पूरे विश्व में कठोरता अथवा क्रूरतापूर्ण निर्देश जारी करने वाले लोगों को ही तालिबानी अथवा ऐसे फ़रमानों को तालिबान फ़रमान  कहकर पुकारा जाने लगा है। यानी अच्छा-ख़ासा शिक्षा ग्रहण करने या विद्यार्थी का अर्थ रखने वाला तालिबानी शब्द इन क्रूर लोगों के साथ जुडऩे से स्वयं ही बदनाम सा हो गया है।

इसी प्रकार के तालिबानी दिशानिर्देश जारी करने वाली तमाम नाममात्र संस्थाएं विशाल धर्मनिरपेक्ष देश भारत में भी मौजूद हैं। यहां भी अक्सर ऐसी $खबरें आती रहती हैं जिनके द्वारा यह पता चलता है कि कभी किसी स्कूल में बच्चों को स्कर्ट के बजाए शलवार पहनना पड़ेगा। कभी एक साथ पढऩे वाले छात्र-छात्राओं के साथ बैठने या घूमने पर उनपर ज़ुल्म ढाने की ख़बरें आती हैं। कभी वेलेंटाईन डे के अवसर पर स्कूलों, कॉलेजों, पार्कों व उपहार बेचने वाली दुकानों पर व रेस्टोरेंट में ऐसी तालिबानी शक्तियां खुलेआम उपद्रव करते व आम लोगों की स्वतंत्रता में सरेआम  दख़लअंदाज़ी करती दिखाई देती हैं।

कई मामले तो ऐसे भी प्रकाश में आए हैं जिनसे यह पता चला कि परंपरा के इन स्वयंभू ठेकेदारों ने दो सगे भाई-बहन की भी इस आरोप में पिटाई कर दी व उन्हें बेईज़्ज़त किया कि वह प्रेमी-प्रेमिका हैं, भाई बहन नहीं। तो वहीं ठीक इसके विपरीत दो प्रेमी-प्रेमिकाओं को पकड़ कर उनकी पिटाई की गई तथा प्रेमिका के हाथों प्रेमी की कलाई में राखी बंधवा कर उन्हें भाई-बहन के रिश्तों में बांधने का अनैच्छिक प्रयास किया गया। ज़ाहिर है जब  मुट्ठीभर सिरफिरे परंपरा के ठेकेदारों का इस प्रकार का आतंक सडक़ों पर सरेआम दिखाई देता है उस समय न केवल आम असंगठित समाज इनके हाथों बंधक बनकर रह जाता है बल्कि शासन व प्रशासन भी इनकी तालिबानी गतिविधियों में ढील देकर या मूक दर्शक बनकर इनके हौसलों को बुलंद करने में सहायक साबित होते हैं।

भारत का सीमांत संवेदनशील राज्य जम्मु-कश्मीर भी प्राय: ऐसे तालिबानी $फरमानों की गिर$फ्त में आता रहता है। यहां भी कई ऐसे मुट्ठीभर लोगों के गिरोह हैं जो समय-समय पर अपने विवादित एवं तानाशाहीपूर्ण $फतवों को लेकर राज्य की शांति भंग करने का प्रयास करते रहते हैं। उदाहरण के तौर पर औरतों का बुर्क़ा पहनना इस्लामी मान्याताओं में एक है। परंतु आज इस्लाम धर्म की ही अधिकांश प्रगतिशील महिलाएं इस प्राचीन बुर्क़ा प्रथा से स्वेच्छा से स्वयं को मुक्त करना चाहती हैं। ऐसी महिलाओं का मानना है कि बुर्क़ा, महिलाओं की शिक्षा तथा उनके समग्र विकास में बाधा पैदा करता है।

कई देश तो इस प्रथा को सुरक्षा के दृष्टिकोण से उचित नहीं मानते हैं। परंतु कुछ समय पूर्व कश्मीर से एक नाम निहाद संगठन की ओर से यह फ़तवा जारी किया गया कि घाटी की सभी महिलाओं का बुर्क़ा पहनना अनिवार्य है। यहां तक कि बिना बुर्क़ा रहने वाली छात्रा के चेहरे पर तेज़ाब डाले जाने तक का समाचार प्राप्त हुआ। कू्ररता की इस इंतेहा को क्या किन्हीं धार्मिक मान्यताओं, परंपराओं अथवा धार्मिक शिक्षा के साथ जोड़ा जा सकता है? बड़े आश्चर्य की बात है कि मानवता के स्पष्ट रूप से दुश्मन नज़र आने वाले ऐसे तत्व स्वयं को धर्म, परंपरा, बिरादरी, समाज व नैतिकता का ठेकेदार कहते नज़र आते हैं।

गत् दिनों कश्मीर में ही एक राजनैतिक व धार्मिक समझे जाने वाले संगठन जमात-ए-इस्लामी द्वारा एक $फतवा पर्यटकों को संबोधित करते हुए जारी किया गया। इस फ़तवे  में  ख़ासतौर पर विदेशी सैलानियों को यह निर्देश दिया गया है कि वे घाटी में भ्रमण करने के दौरान छोटे कपड़े तथा मिनी स्कर्ट आदि क़तई  न पहनें। जमात-ए-इस्लामी के अनुसार ऐसे कपड़े घाटी के बाशिंदों की परंपराओं के विरुद्ध हैं। इस संगठन का कहना है कि राज्य पर्यटन विभाग को पर्यटकों को राज्य की परंपराओं व रीति-रिवाजों के बारे में प्रशिक्षित करना चाहिए। जमात का कहना है कि मेज़बान की भावनाओं का आदर करना मेहमानों का दायित्व है। और अंत में इन परंपरा के रखवाले मेज़बानों ने पर्यटकों को चेतावनी दी है कि यदि वे इन निर्देशों का पालन नहीं करते तो इसके परिणाम भुगतने के लिए भी तैयार रहें।

ज़ाहिर है ऐसे निर्देश सीधे तौर पर पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण करने वालों अथवा पश्चिमी देशों से आने वाले पर्यटकों को निशाना बनाकर ही जारी किए गए हैं। परंतु पश्चिमी सभ्यता तथा पाश्चात्य पहनावे का विरोध करने वाले इन्हीं लोगों से यह भी पूछा जाना चाहिए कि इनके रहबर स्वयं पश्चिमी देशों की यात्रा करने क्यों जाते हैं जहां कि मिनी स्कर्ट व छोटे लिबास पहने हुए महिलाएं आमतौर पर नज़र आती हैं। क्या यह लोग पश्चिमी देशों में जाकर अपनी आंखें मूंदे रहते हैं? परंपरा के इन कई ठेकेदारों के अपने बच्चे अंग्रेज़ी स्कूलों यहां तक कि विदेशों में पढ़ते हैं तथा वहीं के ड्रेस कोड को अपनाते हैं जोकि अंग्रेज़ी माध्यम वाले स्कूलों में लागू होते हैं। इनके अपने रहन-सहन तथा इनके बच्चों के पहनावे भी पूरी तरह पाश्चात्य संस्कृति के ही होते हैं। परंतु इनके फ़रमान ज़रूर पश्चिमी सभ्यता के घोर विरुद्ध होते हैं।

इस प्रकार के तालिबानी फ़रमानों से देश का स्वर्ग समझे जाने वाले कश्मीर जैसे राज्य का पर्यटन व्यवसाय अवश्य प्रभावित होता है। ऐसे दिशानिर्देशों से भयभीत होकर अक्सर पश्चिमी देश अपने पर्यटकों की सुरक्षा के दृष्टिगत् ऐसे दिशानिर्देश जारी करते हैं कि उन्हें किस देश के किस क्षेत्र में जाना चाहिए अथवा नहीं। और जब किसी देश द्वारा क्षेत्र विशेष के लिए ऐसे निर्देश जारी किए जाते हैं तो निश्चित रूप से उस क्षेत्र का पर्यटन व्यवसाय प्रभावित होता है। और इसका सीधा प्रभाव राज्य के राजस्व,राज्य के विकास तथा आम लोगों के रोज़गार पर पड़ता है। पहले ही लगभग एक दशक तक ऐसे ही तालिबानी व अतिवादी लोगों की गिरफ़्त में रहे कश्मीर को पर्यटन के लिहाज़ से काफ़ी बड़ा धक्का लग चुका है।

आम कश्मीरी व्यवसायी का जीवन प्रभावित हो चुका है। उस समय कश्मीरी संस्कृति और परंपरा के इन स्वयंभू ठेकेदारों ने किसी ग़रीब के घर जाकर उसके घर का चूल्हा जलाने की कोशिश नहीं की। परंतु मात्र राजनैतिक लाभ उठाने के लिए तथा अपने मृतप्राय संगठन को ख़बरों  में लाकर उसमें जान फूंकने की ग़रज़  से बार-बार ऐसे तालिबानी फ़रमान  जारी करने का प्रयास किया जाता है। निश्चित रूप से ऐसे तालिबानी $फरमान जारी करने वाले परंपराओं की रखवाली के नाम पर मात्र पाखंड ही रचते हैं। अन्यथा मेहमान पर्यटकों में दहशत फैलाना या उन्हें धमकी देना इस्लामी या कश्मीरी परंपरा अथवा रीति-रिवाजों का हिस्सा क़तई  नहीं है। दरअसल पर्यटकों को स्वयं इस विषय पर निर्णय लेने चाहिए कि उन्हें कब और कहां क्या पहनना है और क्या नहीं। ज़ुल्म,जब्र और धमकी की इसमें कोई गुंजाईश नहीं होनी चाहिए।

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर निर्मल रानी गत 15 वर्षों से देश के विभिन्न समाचारपत्रों, पत्रिकाओं व न्यूज़ वेबसाइट्स में सक्रिय रूप से स्तंभकार के रूप में लेखन कर रही हैं.

Nirmal Rani (Writer) 1622/11 Mahavir Nagar Ambala City  134002 Haryana phone-09729229728

*Disclaimer: The views expressed by the author in this feature are entirely her own and do not necessarily reflect the views of INVC

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‘परंपराओं’ की रक्षा का पाखंड रचने वाले यह तालिबानी** | SportSquare, says on July 8, 2012, 9:43 PM

[...] ‘परंपराओं’ की रक्षा का पाखंड रचने वाल... [...]