Thursday, April 9th, 2020

निर्वाचन आयोग की असफलता का प्रतीक है सर्वोच्च-न्यायालय का निर्णय

आई एन वी सी न्यूज़

नई दिल्ली ,
निर्वाचन आयोग महती भूमिका:  भारत भारतीय लोकतंत्र विश्व का सर्वाधिक बड़ा लोकतंत्र है जो औपनिवेशिक दासता से 15 अगस्त 1947 को मुक्त होने के तत्काल बाद 26 जनवरी 1950 को गणतांत्रिक भोगोलिक सीमाओं का प्रहरी बना और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत स्वतंत्र एवं निष्पक्ष संवैधानिक-संस्था निर्वाचन आयोग को लोकतांत्रिक सुचिता को सुनिश्चित कराने के लिए एकमत से   स्वीकार किया l यदि किसी देश की सीमा, भौगोलिक क्षेत्र और जनसामान्य की सुरक्षा का उत्तरदायित्व सैन्य-शक्ति पर होता है तो वहीँ लोकतान्त्रिक मूल्यों, परम्पराओं, उत्तरदायित्वों एवं मानदण्डों को सर्वस्वीकृत संस्कार देने में महती भूमिका भारत निर्वाचन आयोग की होती है l जन-प्रतिनिधि बना दल-प्रतिनिधि: जनप्रतिनिधियों एवं उनसे संबंधित व्यक्तियों की आय एवं आय-श्रोत पर सर्वोच्च-न्यायालय द्वारा पारित नवीनतम निर्णय पर मीडिया के पूंछे जाने पर ए ऍफ़ टी बार के महामंत्री विजय कुमार पाण्डेय ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि यह बेहद निराशाजनक है कि जिन मामलों में स्वतः संज्ञान लेकर निर्वाचन आयोग को बहुत पहले नियम बनाने चाहिए थे आज उस पर सर्वोच्च-न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा, विजय पाण्डेय ने बताया कि लोकतंत्र में प्रत्येक मताधिकारी का सार्वभौमिक अधिकार है कि वह अपने जन-प्रतिनिधि पर चतुर्मुखी नियन्त्रण रख सके ऐसी व्यवस्था निर्वाचन आयोग को बनानी चाहिए थी लेकिन निर्वाचन आयोग ने तो “जन-प्रतिनिधि को दल-प्रतिनिधि” में तब्दील करके स्वयं उसकी गोंद में जा बैठा l अंतिम-आदमी कैसे बने हिस्सा? चुनाव-चिन्ह प्रत्यासी को देने के बजाय दलों को दे बैठा, दल के चिन्ह को ही चुनाव-चिन्ह बना दिया, चुनाव-चिन्ह की आरक्षण-व्यवस्था में चुनाव-चिन्हों के बदलने की संभावना को निर्वाचन आयोग ने समाप्त करके दलों को स्थाई चुनाव-चिन्ह का स्वामी बना दिया विजय पाण्डेय ने आगे बताया कि आज स्थिति यह है कि देश का अंतिम-आदमी जब प्रतिनिधित्व-प्रणाली का हिस्सा बनने की कोशिश करता है तो दलों का हिमायती निर्वाचन आयोग उनको दो-हफ्ते पहले चुनाव-चिन्ह देकर विहंगम विधान-सभा और लोकसभा में उसको अपने मतदाताओं के बीच पहुंचाने की जिम्मेदारी देता है वहीं दलों को चिर-प्रचारित चुनाव-चिन्ह दे रखा है जिसे साजिश भी माना जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी, चुनाव लड़े प्रत्यासी और चुनाव-चिन्ह दे दिया दल को जो चुनाव लड़ ही नहीं सकती है l पाण्डेय ने कहा कि आज जिस कार्य को सर्वोच्च-न्यायालय ने किया उसे निर्वाचन आयोग को काफी पहले कर देना चाहिए था l विपक्ष के प्रतिनिधि को किस बात का वेतन? दल-प्रतिनिधि को देश का नियन्ता बनाकर आयोग ने जन-प्रतिनिधि का गला घोंट दिया फलतः शिक्षक, डाक्टर, अधिवक्ता, कलाकार, पत्रकार, खिलाड़ी एवं वैज्ञानिक इत्यादि बगैर दलों की गुलामी के बगैर लोकतान्त्रिक-व्यवस्था का हिस्सा नहीं बन सकते और मतदाताओं के सामने प्रतिनिधि चुनने के बजाय किसी एक दल के पक्ष में बहुमत देने का दबाव बना दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि देश पर दलों के पैरोकार शासन करने लगे और देश का प्रधान-मंत्री अपने ही देश में किसी के पक्ष में वोट की भीख मांगने लगा तो किसी के विपक्ष में वोट करने की अपील, सदन को पक्ष और विपक्ष में बाँट दिया विपक्ष का जीता हुआ प्रतिनिधि चुनाव हारे हुए प्रतिनिधि के समान हो गया, सरकार में सहभागी नहीं लेकिन वेतन और भत्ता बराबर है आखिर क्यों? कृत्रिम विपक्ष बनाता है आयोग: आधा देश और प्रदेश सरकार में तो आधा देश विपक्ष का हिस्सा लगातार सत्तर वर्षों से बना हुआ है, निर्वाचन आयोग की वजह से न तो कभी भारत सरकार बन सकी और न कभी प्रदेश सरकार क्योंकि जब तक सभी प्रतिनिधि सरकार का हिस्सा नहीं बनते तब तक यह यूटोपिया ही रहेगा, संविधान में विपक्ष है नहीं, विपक्ष रचनात्मक आधार पर स्वतः सामने आएगा न कि कृत्रिम विपक्ष की दीवार निर्वाचन आयोग खड़ी करेगा l जन-प्रतिनिधि चुनती है जनता, बहुमत नहीं देती : आधे देश और प्रदेश वासियों की सरकार ही बनी आज तक और जनसेवा का स्थान ले लिया दल सेवा ने, जन-अनुकम्पा का स्थान दल-अनुकम्पा ने और मध्यावधि-चुनाव आम बात हो गई जिसका ठीकरा जनता के सर पर फोड़ा जाने लगा जबकि जनता की जिम्मेदारी अपना प्रतिनिधि चुनकर भेजने की होती है और निर्वाचन आयोग इसी बात की अधिसूचना भी जारी करता है और बाद में कहा जाता है कि जनता ने किसी एक के पक्ष में बहुमत नहीं दिया जबकि निर्वाचन आयोग भली-भांति जानता है कि जनता बहुमत नहीं देती केवल अपना प्रतिनिधि चुनती हैl निर्वाचन आयोग होगा जिम्मेदार: उन्होंने कहा कि यह बेहद अफ़सोस जनक है कि दल की नीति और विचारधारा को देश की नीति और विचारधारा बनाकर देश पर थोप दिया जाता है जबकि उसका देश की इच्छा और आकांक्षा से कोई संबंध नहीं होता यदि समय रहते निर्वाचन आयोग ने जनप्रतिनिधियों का नियंत्रण जनता के हाथ में देने की व्यवस्था स्वयं न बनाई तो वह समय दूर नहीं जब जनता स्वयं इस कार्य को करने के लिए बाध्य होगी और इसकी पूरी जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग की होगी l

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This is perfect and I am supporting it fully., says on February 20, 2018, 8:28 PM

Election Commission is guilt of non-comliance of well-settled principles of free and fair election propounded by a Constitution Bench of Supreme Court in the matter of Smt. Indira Nehru Gandhi vs. Raj Narayan reported by AIR 1975 SC 2299.