Thursday, October 24th, 2019
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नहीं भाता मुझे किसी का साथ

हरियाणा के चुनावी रण में बसपा का हाथी अब तक अपनी मदमस्त चाल ही चला है। उसने कई दलों को साथी जरूर बनाया, लेकिन गठबंधन लंबा नहीं चल पाया। अब एक बार फिर विधानसभा चुनाव की बिसात बिछ चुकी है और हाथी का कोई साथी नहीं है। बसपा अकेले ही चुनाव में उतरने जा रही है। पार्टी सुप्रीमो मायावती को किसी का साथ ज्यादा भाता भी नहीं है।
बसपा ने 1991 के विधानसभा चुनाव में पहली बार अपने प्रत्याशी उतारे थे। उसके बाद से अब तक पार्टी लगातार चुनाव लड़ती है। 1996 के चुनाव में ही ऐसा मौका आया जब बसपा का कोई विधायक नहीं जीता, अन्यथा हर चुनाव में बसपा का एक विधायक बनता आ रहा है। प्रदेश में पार्टी का अच्छा खासा कैडर है, बावजूद इसके मायावती कुछ ज्यादा करिश्मा नहीं दिखा सकीं।

पार्टी एक ही विधायक तक सीमित है। उससे आगे नहीं बढ़ पाई। 2014 विधानसभा चुनाव में पृथला से टेकचंद शर्मा बसपा विधायक बने थे। वह ज्यादा दिन तक सत्ता के मोह से दूर नहीं रह सके और सरकार के साथ उनकी नजदीकियां बढ़ गईं। नतीजा यह हुआ कि बसपा ने पार्टी से निष्कासित कर दिया।

अंतत: उन्होंने विधानसभा के मॉनसून सत्र के दौरान भाजपा का दामन थाम लिया। 2009 में जगाधरी से अकरम खान बसपा विधायक चुने गए थे। उन्होंने विधानसभा में कांग्रेस को समर्थन दिया और डिप्टी स्पीकर बने। अब वह कांग्रेस में हैं, कुछ महीने पहले ही उन्होंने पार्टी ज्वॉइन की है।
चुनावी समीकरण बिगाड़ने में माहिर
प्रदेश में बसपा का वोट प्रतिशत 2014 के विधानसभा चुनाव में 4.4 प्रतिशत रहा था। 2009 में 6.74 प्रतिशत और 1996 व 2000 में क्रमश : 5.44, 5.74 प्रतिशत वोट पार्टी को मिले थे। बसपा का हर विधानसभा क्षेत्र में वोट बैंक है और पार्टी उम्मीदवार किसी भी बड़े दल के प्रत्याशी का चुनावी गणित बिगाड़ देते हैं। इस बार भी बसपा सभी विधानसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने जा रही है। बसपा उम्मीदवार कड़े मुकाबले वाली सीटों पर जीत-हार में अहम भूमिका निभाएंगे। उन्हें मिलने वाले वोट भाजपा, कांग्रेस उम्मीदवारों में से किसी को भी विधानसभा पहुंचने से रोक सकते हैं।

अब तक जीते विधायक
नारायणगढ़ से सुरजीत कुमार, जगाधरी से डॉ. बिशन लाल, छछरौली से अर्जन सिंह, जगाधरी से अकरम खान, पृथला से टेकचंद शर्मा।
अब तक बसपा के प्रदेश में रहे गठबंधन
. हरियाणा में बसपा ने 1998 में इंडियन नेशनल लोकदल के साथ गठबंधन किया। बाद में तोड़ा।
. 2009 में कुलदीप बिश्नोई की हरियाणा जनहित कांग्रेस के साथ गठबंधन किया। बाद में राहें जुदा।
. मई 2018 में फिर इंडियन नेशनल लोकदल के साथ गठबंधन, एक साल से पहले ही टूटा। जींद उपचुनाव में करारी हार के बाद बसपा को इनेलो का अस्तित्व खतरे में नजर आने लगा।
. इनेलो के साथ गठबंधन तोड़कर फरवरी 2019 में राजकुमार सैनी की लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी का साथ पकड़ा। चंद महीने बाद गठबंधन खत्म।
. लोसुपा के बाद बसपा ने 11 अगस्त 2019 को जजपा के साथ गठबंधन किया। छह सितंबर 2019 को जजपा से भी तोड़ा नाता।

17 रिजर्व सीटों और 19 फीसदी वोट पर नजर
हरियाणा में मायावती की नजर 90 में से एससी के लिए आरक्षित 17 सीटों पर है। पार्टी इन सीटों पर मजबूत उ मीदवार उताकर पुराना मिथक तोड़ते हुए एक से अधिक विधायक बनाना चाहेगी। इसके अलावा पार्टी 19 प्रतिशत एससी वोट बैंक पर भी निगाहें जमाए हुए है। पार्टी यहां भी उत्तर प्रदेश की तर्ज पर सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला अपनाकर कोई करिश्मा करना चाहती है।  
इनेलो टूटने के बाद तोड़ा बसपा ने गठबंधन
हरियाणा में बसपा ने इस बार जींद उपचुनाव से पहले इनेलो के साथ गठबंधन किया था। उस समय पार्टी व चौटाला परिवार एकजुट था। 7 अक्टूबर 2018 को इनेलो और चौटाला परिवार में दरार आई। उसके बाद न केवल पार्टी टूटी, बल्कि परिवार भी टूट गया। नतीजा, यह हुआ कि जींद उपचुनाव में बसपा-इनेलो गठबंधन उ मीदवार मात्र चार हजार मतों के अंदर सिमट गया। इसे देखते हुए चुनाव बाद इनेलो के साथ बसपा ने अपनी राहें अलग कर लीं।

लोकसभा में लोसुपा को परख चुकी बसपा
इनेलो से गठबंधन तोड़ने के बाद बसपा ने पूर्व भाजपा सांसद राजकुमार सैनी की लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी केसाथ गठबंधन किया। बसपा के लिए यह जल्दबाजी में लिया गया फैसला साबित हुआ। बसपा की पकड़ के सहारे गठबंधन लोकसभा चुनाव में मत प्रतिशत के लिहाज से तीसरे स्थान पर रहा। चुनाव की समीक्षा के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती ने लोसुपा को भी बाय-बाय कह दिया।

जजपा के साथ भी जम नहीं पाई जोड़ी
विधानसभा चुनाव एक लड़ने के लिए बसपा ने बीते 11 अगस्त को दिल्ली में जजपा के साथ गठबंधन किया। जजपा नेता दुष्यंत चौटाला व बसपा नेता सतीश मिश्र ने 50-40 के फार्मूले पर सहमति जताई। महीने के भीतर ही रिश्ते टूट गए और मायावती ने अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा की। अब सबकी निगाहें विधानसभा में बसपा के प्रदर्शन पर टिकी हुई हैं। एकला चलो की रणनीति के तहत बसपा क्या करिश्मा करेगी, यह भविष्य के गर्भ में है। PLC.

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