Monday, October 14th, 2019
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नदियों में सिल्ट एकत्रित होना बाढ़ की सबसे बड़ी समस्या है : हरीश रावत

हरीश रावत आई एन वी सी न्यूज़आई एन वी सी न्यूज़ नई दिल्ली, नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में आयोजित नमामि गंगे कार्यक्रम की बैठक के अवसर पर मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि विकास परियोजनाओं पर समझौता कर प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रति उŸाराखण्ड के योगदान का सम्मान करते हुए राज्य को भविष्य में होने वाली राजस्व हानि के लिये उचित प्रतिपूर्ति की जानी चाहिये। गंगा की सफाई हेतु संपूर्ण निधि पोषण केन्द्र सरकार द्वारा की जाय। प्राकृतिक आपदा द्वारा ळंदहं त्पअमत तमसंजमक पदतिंेजतनबजनतम को क्षति की लागत भी केन्द्र सरकार को वहन करनी चाहिये। डपदपउनउ म्बवसवहपबंस सिवू (अविरल धारा) का निर्धारण शीघ्रता से किया जाना चाहिये, क्योंकि इसके न होने से कई विकास कार्य लंबित पड़े हैं। स्वच्छता के उपाय करते समय केन्द्र सरकार स्थानीय लोगों की भावनाओं तथा राज्य की विधिसम्मत मांगों पर उचित विचार करे। मुख्यमंत्री श्री रावत ने कहा कि बरसात में समस्त नदियों में सिल्ट एकत्रित होना बाढ़ की सबसे बड़ी समस्या है। नदियों के किनारे की सिल्ट हटाने का अधिकार राज्य को दिया जाना चाहिये। शहरों एवं नदी के समीप स्थानों में आवश्यक रूप से  ैज्च् एवं औद्योगिक म्ििसनमदज ज्तमंजउमदज च्संदज बनाने होंगे। साथ ही प्रदूषण की रोकथाम के लिये दिशा-निर्देश एवं सम्बन्धित कानून बनाये जाने होंगे। हमारे राज्य ने जल संरक्षण कार्यों की महत्ता को अनुभव किया है। राज्य के पास ॅंजमत त्मबींतहपदह ैजतनबजनतम मे निर्मित करने वाली ग्राम पंचायतों को उपयुक्त पुरस्कार प्रदान करने की योजना है। राज्य ने वन क्षेत्र, ग्रामीण क्षेत्र एवं बंजर भूमि में एक लाख चालखाल ;ॅंजमत ठवकपमेद्ध का निर्माण प्रस्तावित किया है। यदि उŸाराखण्ड जैसा छोटा राज्य इतनी उपलब्धि प्राप्त करता है, तो निश्चित रूप से केन्द्र सरकार अपेक्षाकृत अधिक अच्छे परिणाम प्राप्त कर सकती है। उŸाराखण्ड में जल संचय किये बिना आप गर्मियों एवं जाड़ों में गंगा एवं यमुना का जल स्तर नहीं बढ़ा सकते हैं एवं बिना जल बढ़ाये कोई भी सफाई अभियान नाकाफी होगा। उŸाराखण्ड में जल संचय किये बिना आप गर्मियों एवं जाड़ों में गंगा एवं यमुना का जल स्तर नहीं बढ़ा सकते हैं एवं बिना जल बढ़ाये कोई भी सफाई अभियान नाकाफी होगा। राज्य अपनी जल विद्युत उत्पादन क्षमता का विस्तार करना चाहता है ताकि राज्य इस दिशा में आत्मनिर्भर हो सके और अतिरिक्त बिजली का शुद्ध निर्यातक बन सके। 01 नवम्बर, 2010 को आहूत राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की दूसरी बैठक में तीन पन बिजली परियोजनाओं क्रमशः लौहारी नागपाला (600 मेगावाट), पाला मनेरी (480 मेगावाट) और भैरोंघाटी (381 मेगावाट) को बंद करने का निर्णय लिया गया था। इसके बाद अगस्त 2013 में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि 2944 मेगावाट की कुल क्षमता की 24 जल विद्युत परियोजनाओं जिसमें भैरोंघाटी भी शामिल है को बंद कर दिया जाय। उन्होंने प्रधानमंत्री को गंगा जीर्णोद्धार कार्यों को जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय के अधीन किये जाने पर बधाई दी तथा इसे सराहनीय कदम बताया। इस बहुप्रतीक्षित कदम से कार्यों पर आवश्यक ध्यान केन्द्रित कर वांछित बल दिया जा सकेगा। उन्होंने कहा भागीरथी म्बव ैमदेपजपअर्म वदम की घोषणा के कारण अधिसूचित क्षेत्र में नई पन बिजली संयंत्रों की स्थापना और 2 मेगावाट से अधिक क्षमता की मौजूदा संयंत्रों के विस्तार पर रोक लगा दी गई है। अधिसूचना द्वारा 1743 मेगावाट की 16 जल विद्युत परियोजनाओं का राज्य द्वारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा। म्बव ैमदेपजपअर्म वदम की घोषणा हो जाने और जल विद्युत परियोजनाओं पर निषेध के फलस्वरूप भविष्य में राज्य को प्रतिवर्ष रू0 3581 करोड़ की हानि होगी। इस प्रकार छळत्ठ। एवं माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय एवं गौमुख से उत्तरकाशी तक म्बव ैमदेपजपअर्म वदम की घोषणा से कुल मिलाकर 4069 मेगावाट की कुल क्षमता की 34 परियोजनाएं,जिनको पहले से ही शुरू किया गया था एवं जिनमें प्रारंभिक काम किये गये थे, त्यागनी पड़ी हैं। थ्वेेपस थ्नमसे के अभाव के कारण वर्तमान में उत्तराखण्ड राज्य प्रतिवर्ष रू0 1000/-करोड़ की लागत से 800 मेगावाट बिजली का आयात कर रहा है। यदि जल विद्युत उत्पादन क्षमता का पूरा उपयोग कर लिया जाय तो उत्तराखण्ड राज्य हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के समान अतिरिक्त विद्युत उत्पादन वाला राज्य हो जाएगा। उन्होंने अनुरोध किया कि गंगा नदी के संरक्षण के लिए राज्य को उपयुक्त प्रतिपूर्ति दी जानी चाहिए। ईको सेन्सिटिव जोन में 25 मेगावाट से कम क्षमता की ऐसी परियोजनाओं जिनसे पर्यावरण एवं ईकोलोजी पर नगण्य प्रभाव पड़ता है, को चालू रखने की अनुमति दी जानी चाहिये। इसके अलावा गौमुख से उत्तरकाशी तक 100 किलोमीटर विस्तार से 4197.59 वर्ग किलोमीटर ब्ंजबीउमदज ।तमं की म्बव ैमदेपजपअर्म वदम के रूप में घोषणा से राज्य में निराशा का वातावरण है और विकास कार्य प्रभावित हुए हैं। साथ ही अधिसूचना सार्वजनिक परामर्श के बिना किया गया था। किसी भी कड़े नियमों के लागू किये जाने से पहले जनता की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए और जनता की चिंताओं को महत्व दिया जाना चाहिए। इनसे स्थानीय आबादी के लिए रोजगार के अवसर भी काफी प्रभावित हो जाएंग। इससे पर्वतीय क्षेत्रों से मैदानी इलाकों की ओर लोगों का पलायन बढ़ जाएगा।  आर्थिक विकास पर राज्य के हितों और म्बवसवहपबंस ैजंइपसपजल के बीच एक संतुलन कायम करने के लिए इस अधिसूचना पर फिर से विचार करने की जरूरत है। म्बव ैमदेपजपअर्म वदम में प्रतिवर्ष लगभग 04 लाख तीर्थयात्री आते हैं और दो सौ होटल एवं धर्मशालाओं में ठहरते हैं। पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्र के रूप में घोषणा के फलस्वरूप धार्मिक भावनाओं के कारण यात्रा में शामिल तीर्थयात्रियों की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाना कठिन होगा। सीमा पार चीन में पहले से ही सड़कों एवं अन्य बुनियादी सुविधाओं का एक विशाल नेटवर्क है। सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास कार्यो का निरोध भारत के ैजतंजमहपब प्दजमतमेज में नहीं हो सकता है। सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थानीय आबादी का असंतोष और उनकी आजीविका पर दुष्प्रभाव पड़ना राष्ट्रीय हित में उचित नही है। इसके लिए राज्य सरकार का सुझाव है कि  गौमुख से हर्सिल के पास स्थित धराली तक 42 किलोमीटर के क्षेत्र को ईको सेन्सिटिव जोन में सम्मिलित किया जाना चाहिये।    ईको सेन्सिटिव जोन की सीमा भागीरथी नदी के उच्चतम जलस्तर ;भ्पही थ्सववक स्मअमसद्ध से 5 मीटर ऊपर तक होनी चाहिये। म्बवसवहपबंस थ्सवू के निर्धारण के निर्णय में शीघ्रता लायी जानी चाहिए इसके अभाव में कई विकास परियोजनाएं पहले से ही रूकी हुयी हैं। गंगा नदी की सभी सहायक नदियों के लिए अलग-अलग मौसम हेतु वैज्ञानिक आधार पर म्बवसवहपबंस थ्सवू का निर्धारण विभिन्न स्थानों के लिए किया जाना चाहिए। मौजूदा बांधों के माध्यम से म्बवसवहपबंस थ्सवू छोड़ने की संभावना की भी जांच की जानी चाहिए। सिंचाई बिजली और अन्य क्षेत्रों हेतु आवश्यकता आधारित आंकलन किया जाना चाहिए और सार्वजनिक विचार-विमर्श के माध्यम से उत्तराखण्ड के लोगों के हितों की रक्षा की जानी चाहिए। मुख्यमंत्री श्री रावत ने कहा कि वर्तमान में राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की समस्त परियोजनाओं हेतु केन्द्र एवं राज्य के वित्त पोषण का अनुपात 70ः30 है। राज्य का अधिकांश क्षेत्र पर्वतीय है जिस कारण निर्माण की लागत अधिक आती है। अतः गंगा एक्शन प्लान के प्रथम चरण की भांति राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की समस्त परियोजनाओं की लागत का 100 प्रतिशत वहन केन्द्र सरकार द्वारा किया जाना चाहिए। राज्य में शहरी स्थानीय निकाय पर्याप्त वित्तीय संसाधन उत्पन्न करने में सक्षम नहीं है। इस परिदृश्य में नदियों में प्रदूषण नियंत्रण के लिए बनायी गई परिसम्पत्तियों के संचालन और रख-रखाव हेतु पांच वर्ष की वर्तमान व्यवस्था के स्थान पर 15 वर्ष के लिए केन्द्र का अनुदान प्रदान किये जाने पर परिसम्पत्तियों का संचालन सुचारू रूप से किया जा सकेगा। प्राकृतिक आपदा से प्रभावित सभी परियोजनाओं की मरम्मत एवं पुर्नस्थापना हेतु राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण से वित्त पोषण किया जाना चाहिए। छळत्ठ। की वर्तमान में राज्य में 16 परियोजनाएं स्वीकृत हैं जिनमें से दो पूर्ण की जा चुकी हैं, आठ निर्माणाधीन हैं। श्रीनगर एवं गोपेश्वर सीवरेज और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट परियोजना तथा जगजीतपुर हरिद्वार में 40 एमएलडी क्षमता वृद्धि की परियोजनाएं राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की एम्पावर्ड स्टीयरिंग कमेटी में स्वीकृत की जानी है। जोशीमठ सीवरेज योजना और चंडी घाट के विकास के परियोजना में संशोधन किये जा रहे हैं। चार धाम यात्रा मार्ग एवं अन्य पर्यटक नगरों में सार्वजनिक सुविधाओं के लिए परियोजनाएं, हरिद्वार और ऋषिकेश हेतु समग्र वेस्ट वाटर/सीवरेज परियोजनाएं, ग्रेटर ऋषिकेश में नदी तट विकास परियोजना और पीपीपी मोड में काशीपुर में सीवेज ट्रीटमेन्ट प्लान्ट और प्दकनेजतपंस म्ििसनमदज ज्तमंजउमदज च्संदज की परियोजनाएं बनाई जा रही हैं। एनजीआरबीए में लिये गये निर्णय का उŸाराखण्ड जैसे छोटे राज्य पर दूरगामी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिस के पास पहले से ही संसाधनों की कमी है। अतः पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील घोषित किये जाने, ऊर्जा परियोजनाओं को प्रतिबन्धित किये जाने और डपदपउनउ म्बवसवहपबंस सिवू के मानक लागू करने से पहले स्थानीय आबादी के आजीविका के मसलों और विकास की आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाय।

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