Thursday, February 20th, 2020

दिल्ली दिलवालों की है ‘जागीरदारों’ की नहीं?

vg1{ तनवीर जाफ़री } महानगर मुंबई में उत्तर भारतीयों विशेषकर यूपी व बिहार के लोगों के प्रति ज़हर उगलने वाले ठाकरे परिवार की तजऱ् पर अब देश की राजधानी दिल्ली को भी अपनी ‘जागीर’ बताने की कोशिश की गई है। भारतीय जनता पार्टी के नेता विजय गोयल ने पिछले दिनों राज्यसभा में बजट पर हो रही चर्चा के दौरान यह कहकर पूरे देश को आश्चर्यचकित कर दिया कि ‘दिल्ली में प्रतिदिन बाहर से आने वाले लोगों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। इनमें सबसे अधिक संख्या उत्तर प्रदेश व बिहार के लोगों की है। उन्होंने कहा कि चूंकि उन्हें अपने राज्यों में काम नहीं मिलता इसलिए वे दिल्ली आते हैं और झुगियों में रुकते हैं। और यही झुगियां बाद में अनाधिकृत कालोनी बन जाती हैं। यदि इन समस्याओं से निपटना है तो इन प्रवासियों को दिल्ली आने से रोकना होगा’। विजय गोयल की उत्तर प्रदेश व बिहार के प्रवासियों के प्रति की गई यह टिप्पणी वैसे कोई $खास हैरान करने वाली टिप्पणी नहीं थी। क्योंकि भले ही भाजपा राष्ट्रवाद अथवा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसे लोकलुभावने शब्दों का प्रयोग अपनी पीठ स्वयं थपथपाने के लिए या आम लोगों के बीच स्वयं को सबसे बड़ा राष्ट्रहितैषी बताने के लिए क्यों न करती हो परंतु ह$की$कत में भाजपा क्षेत्रवादी विचारधारा रखने वाले कई राजनैतिक दलों की $खास सहयोगी है। मुंबई में बाल ठाकरे की शिवसेना तथा राजठाकरे की महाराष्ट्र नव निर्माण सेना द्वारा उत्तर भारतीयों के विरुद्ध कई बार  किए जा चुके ज़ुल्मो-सितम व गुंडागर्दी से पूरा देश भलीभांति वाकि़$फ हैं। परंतु इस क्षेत्रवादी विचारधारा रखने वाले दल से भाजपा का प्रेम भी जगज़ाहिर है। यदि भाजपा मुंबई में उत्तर भारतीयों के विरुद्ध ठाकरे परिवार द्वारा किए गए अत्याचार के विरुद्ध होती तथा वास्तव में देश की एकता और अखंडता की पक्षधर होती तो देश को बंाटने की सोच रखने वाले ऐसे संकुचित विचार के क्षेत्रीय दलों से अपना रिश्ता समाप्त कर देती। परंतु ठीक इसके विपरीत शिवसेना आज भाजपा की सबसे प्रमुख विश्वसनीय तथा पुरानी गठबंधन सहयोगी पार्टी है। अब आईए ज़रा देश की भाजपा की पहली पूर्ण बहुमत की सरकार की संरचना पर भी नज़र डालें। भारतीय जनता पार्टी पहली बार 282 लोकसभा सीटें अपने अकेले दम पर जीत कर एक मज़बूत सरकार के रूप में सामने आई है। इसमें उत्तर प्रदेश ने कुल 80 सीटों में से 71 सीटें भाजपा को दी हैं। जबकि बिहार में 40 में से 31 सीटों पर भाजपा ने अपनी विजय पताका फहराई है। अर्थात् कुल 282 विजयी सीटों में से 102 सीटों का योगदान केवल उत्तर प्रदेश व बिहार जैसे देश के सबसे बड़े राज्यों का ही है। यदि विजय गोयल लोकसभा चुनाव से पूर्व यही भाषा बोलते तो संभवत: लोकसभा का अंकगणित कुछ और ही होता। परंतु अ$फसोस की बात यह है कि उत्तर प्रदेश व बिहार से 102 सीटों की उर्जा प्राप्त करने के बाद आज विजय गोयल स्वयं को इस हैसियत में पा रहे हैं कि वे देश की राजधानी दिल्ल्ी को अपनी ही जागीर समझते हुए यूपी व बिहार के लोगों को दिल्ली से दूर रखने की सलाह दे रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उत्तरप्रदेश से ही सांसद निर्वाचित हुए हैं। गोयल यह भी भलीभांति जानते हैं कि इस समय दिल्ली की कोई भी लोकसभा व विधानसभा सीट उत्तर भारतीयों के निर्णायक प्रभाव से vgअछूती नहीं है। दिल्ली से कई बार कांग्रेस व भाजपा दोनों ही दलों से संबंध रखने प्रवासी उत्तर भारतीय सांसद व विधायक चुने जा चुके हैं। स्वयं विजय गोयल का राजनैतिक कैरियर चाहे वह छात्र नेता व छात्र संघ के अध्यक्ष के रूप में रहा हो या फिर दिल्ली से निर्वाचित लोकसभा सदस्य के रूप में, ेंउत्तर भारतीयों के सहयोग से ही संवरना संभव हो सका है। इस बात से विजय गोयल स्वयं भी ब$खूबी परिचित हैं। इसके बावजूद ध्रुवीकरण के खेल में महारत रखने वाली भाजपा के इस नेता ने उत्तर भारतीयों के विरुद्ध इस प्रकार का ज़हर आ$िखर क्यों उगला? दरअसल विजय गोयल स्वयं को पार्टी के दिल्ली के मुख्यमंत्री के पद पर प्रबल दावेदार के चेहरे के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार हर्षवर्धन के केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री पद पर गोयल की दावेदारी और अधिक मज़बूत हो गई है। परंतु मीडिया में आ रही $खबरों के अनुसार दिल्ली में आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। जबकि ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ का लोकलुभावन लालीपोप देकर कांग्रेस पार्टी व यूपीए सरकार की नाकामियों की बुनियाद पर अपनी $फतेह का परचम लहराने वाली भाजपा से मतदाताओं का मोह बहुत तेज़ी से भंग होने लगा है। ऐसे में विजय गोयल दिल्ली के ठाकरे बनकर स्थानीय व बाहरी लोगों का मुद्दा दिल्ल्ी में उछाल कर अपनी लोकप्रियता स्थानीय दिल्लंी वासियों में बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। निश्चित रूप से केंद्र की सत्तारुढ़ पार्टी के किसी वरिष्ठ नेता द्वारा इस प्रकार की ओछी बात किया जाना और वह भी राज्यसभा में चर्चा के दौरान निहायत ही $गैर जि़म्मेदाराना व आपत्तिजनक है। गोयल यह भी भूल गए कि दिल्ली में मुख्यमंत्री के पद पर विराजमान रह चुकीं शीला दीक्षित व सुषमा स्वराज भी दिल्ली की स्थाई निवासी नहीं थीं। परंतु राज्य के मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए उन्होंने दिल्ली के विकास के लिए अपनी ओर से हर संभव प्रयास किया। भौगोलिक दृष्टिकोण से भी दिल्ली की सीमाएं उत्तर प्रदेश व हरियाणा से चारों ओर से घिरी हैं। यदि हम दिल्ली से सोनीपत,$फरीदाबाद,गुडग़ांव,रेवाड़ी,महेंद्रगढ़ व बहादुरगढ़ जैसे क्षेत्रों को अलग मान लें तथा साहिबाबाद,नोएडा,लोनी तथा $गाजि़याबाद जैसेे क्षेत्रों को दिल्ली से अलग समझ लें तो दिल्ली का वजूद ही आधा व अधूरा रह जाएगा। इसीलिए वृहद् दिल्ली को ही आज एनसीआर का नाम दिया जा चुका है। आज दिल्ली की र$फ्तार को $कायम रखने में केवल उत्तर प्रदेश व बिहारी प्रवासियों की ज़रूरत ही महसूस नहीं होती बल्कि यूपी व हरियाणा से भारी मात्रा में पहुंचने वाला दूध,सब्जि़यां,अनाज तथा दूसरी खाद्य सामग्रियां भी पूरी दिल्ली को जीवन प्रदान करती हैं। आज दुनिया के समक्ष एक आदर्श राजधानी के रूप में अपना सर उठाकर रखने वाली दिल्ली को यूपी बिहार के ही श्रमिकों द्वारा अपने $खून पसीने से सींचा गया है। यहां एक बात और $काबिले$गौर है कि भाजपा के यही नेता जब राम मंदिर के नाम पर सत्ता की सीढिय़ों पर चढऩे की कोशिश कर रहे थे उस समय इन्हें उत्तर प्रदेश की अयोध्या और इसी उत्तर प्रदेश के रामभक्तों व कारसेवकों की बहुत स$ख्त ज़रूरत महसूस हो रही थी। आज भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह को हीरो बनाने वाला प्रदेश भी उत्तर प्रदेश ही है जिसने सांप्रदायिकता के नाम पर मतों के ध्रुवीकरण के अमित शाह के एजेंडे के बहकावे में आकर उसे परवान चढ़ा दिया। परंतु सत्ता के नशे में चूर भाजपा के यही नेता अब उत्तर भारतीयों के ही प्रति  ऐसा सौतेला व घृणित रवैया रखने लगे हैं। क्षेत्रवादी राजनीति के परिपेक्ष्य में एक बात और भी $काबिले$गौर है कि ठाकरे परिवार अथवा विजय गोयल के ज़हरीले वचन तो देश के लोगों के सामने आ चुके हैं। परंतु ऐसे विचार व्यक्त करने वाले यह आ$िखरी नेता नहीं हैं। राजनीति के दिन-प्रतिदिन गिरते जा रहे स्तर ने नेताओं को इस बात की खुली छूट दे दी है कि वे अपनी सुविधा तथा वोट बैंक के मद्देनज़र जब चाहें और जहां चाहें समाज को विभाजित करने वाली रेखाएं अपने न$फे-नु$कसान के मद्देनज़र खींच सकते हैं। उत्तर भारतीयों के विरुद्ध पहले मुंबई और फिर दिल्ली में उठने वाली यह आवाज़ नेताओं के कुत्सित प्रयासों का एक उदाहरण है। सर्वप्रथम इसकी शुरुआत बाल ठाकरे द्वारा दक्षिण भारतीयों को मुंबई से खदेडऩे जैसे दुष्प्रयासों के साथ की गई थी। और इसी ज़हरीले अभियान ने बाल ठाकरे को मराठियों का लोकप्रिय नेता बना दिया था। परिणामस्वरूप आज इनकी राजनैतिक हैसियत इतनी बढ़ गई है कि महाराष्ट्र में भाजपा जैसा दल इनके सहयोग के बिना आगे नहीं बढऩा चाहता। देश के अन्य राज्यों में भी समाज को क्षेत्र के आधार पर बांटने की तमन्ना रखने वाले कई प्रमुख नेता मौजूद हैं। ज़रूरत पडऩे पर वे भी अपने-अपने केंचुलों से बाहर निकल आएंगे। और ऐसी स्थिति निश्चित रूप से देश की एकता-अखंडता तथा क्षेत्रीय समरसता के लिए बहुत बड़ा $खतरा है। अत: ज़रूरत इस बात की है कि ऐसे नेताओं व उनको संरक्षण देने वाले राजनैतिक दलों को समय रहते मुंह तोड़ जवाब दिया जाए।
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Tanveer Jafri**Tanveer Jafri –  columnist and AuthorAuthor Tanveer Jafri, Former Member of Haryana Sahitya Academy (Shasi Parishad),is a writer & columnist based in Haryana, India.He is related with hundreds of most popular daily news papers, magazines & portals in India and abroad. Jafri, Almost writes in the field of communal harmony, world peace, anti communalism, anti terrorism, national integration, national & international politics etc. He is a devoted social activist for world peace, unity, integrity & global brotherhood. Thousands articles of the author have been published in different newspapers, websites & news-portals throughout the world. He is also a recipient of so many awards in the field of Communal Harmony & other social activities.Contact Email :tanveerjafriamb@gmail.com1622/11, Mahavir Nagar AmbalaCity. 134002 Haryanaphones 098962-19228 0171-2535628
*Disclaimer: The views expressed by the author in this feature are entirely his own and do not necessarily reflect the views of INVC.
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