Tuesday, November 12th, 2019
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दवाई के उत्पादों की टेस्टिंग हो और गुणवत्ता का डाक्यूमेंटेशन किया जाए : शेखर दत्त

आई एन वी सी,रायपुर,राज्यपाल शेखर दत्त,राज्यपाल, शेखर दत्त,भोपाल राज्यपाल शेखर दत्त,भोपाल राज्यपाल ,शेखर दत्त,औषधीय, सुगंधित पौधे, डॉ. एस. अयप्पन, केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय , डॉ. एस. अयप्पन, केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय भारत सरकार ,कृषि उत्पादन आयुक्त अजय सिंह ,कृषि उत्पादन आयुक्त , अजय सिंह ,आई एन वी सी, रायपुर, राज्यपाल श्री शेखर दत्त की अध्यक्षता में आज यहां इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के सभाकक्ष में कृषि विभाग, वन विभाग और विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में ‘औषधीय, सुगंधित पौधे तथा अकाष्ठीय वन उत्पाद’ विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आई.सी.ए.आर.) के महानिदेशक एवं कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान विभाग, नई दिल्ली के सचिव डॉ. एस. अयप्पन, केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सचिव श्री एन. सान्याल, अतिरिक्त मुख्य सचिव एवं कृषि उत्पादन आयुक्त श्री अजय सिंह सहित प्रदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपतिगण, केन्द्र शासन, राज्य शासन के विभिन्न विभागों जैसे कृषि, उद्यानिकी, वन विभाग से आए वरिष्ठ अधिकारीगण तथा कृषि विश्वविद्यालय एवं विभिन्न अनुसंधान संस्थाओं के वैज्ञानिकगण उपस्थित थे। उल्लेखनीय है कि विश्वविद्यालय को औषधीय, सुगंधित पौधे और अकाष्ठीय वन उत्पाद के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (उत्कृष्टता का केन्द्र) बनाया गया है। राज्यपाल श्री शेखर दत्त ने अपने उदगार में कहा कि यह केन्द्र केवल छत्तीसगढ़ के लिए उत्कृष्टता का केन्द्र नहीं है, बल्कि पूरे भारत के लिए उत्कृष्टता का केन्द्र है। गैर शहरी और गैर औद्योगिक से संबंधित उत्पाद मुख्य रूप से कृषि संबंधी होते हैं। औषधीय, सुगंधित पौधे और अकाष्ठीय वन उत्पाद भले ही अलग-अलग दिखाई दे, लेकिन वे अलग विषय नहीं है। सभी का उद्देश्य मिलजुलकर बायो संपदा का विकास करना है, इसके लिए टीम वर्क के साथ विश्वविद्यालय, कृषि, वन, उद्यानिकी, अनुसंधान संस्थान, शैक्षणिक संस्थाओं आदि को कार्य करने की जरूरत है। ये संसाधन न केवल नागरिकों को व्यापक आय देने में समर्थ हैं और इनके माध्यम से नागरिकों का कल्याण किया जा सकता है, बल्कि इनके माध्यम से समग्र घरेलू उत्पाद में इनके अनुपात को भी व्यापक रूप से बढ़ाया जा सकता है। राज्यपाल ने कहा कि भारत जलवायु, भूमि और जैव विविधता की दृष्टि से व्यापकता लिये हुए देश है। इसमें जहां पर्वत, वन, बंजर भूमि, रेगिस्तान जैसे क्षेत्र हैं तो वहीं समुद्रीय तटीय क्षेत्र के बाद ईईजेड (एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन) है, जिसका क्षेत्रफल देश के जमीनी क्षेत्र से भी अधिक है। इन क्षेत्रों के प्राणी एवं वानस्पतिक संबंधी जैव विविधता को समृद्ध करने तथा इनका सदुपयोग बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि औषधीय, सुगंधित पौधे और अकाष्ठीय वन उत्पाद के व्यापार में लगे बिचौलियों द्वारा और इनके मूल्य संवर्धन के माध्यम से उद्यमियों द्वारा अच्छी आय अर्जित की जाती है। यह जरूरी है कि इनके संग्राहकों को समुचित जानकारी और प्रशिक्षण दिया जाए, जिससे उनके आय में वृद्धि हो।  राज्यपाल ने कहा कि देश में नागरिकों की सबसे अधिक जीवन प्रत्याशा केरल राज्य की है, क्योंकि वहां के खान-पान और जीवन पद्धति में परम्परागत औषधीय एवं मसालों का उपयोग किया जाता है। उन्होंने कहा कि यह जरूरी है कि हम अपने परम्परागत आयुर्वेद, सिद्धा, यूनानी जैसे परम्परागत ज्ञान पर अनुसंधान करें और उनके वैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर नये दवाईयों एवं मौलिक्यूल को ईजाद करें। उन्होंने कहा कि इन दवाईयों का निर्यात तथा दवाईयों के वैश्विक व्यापार में हिस्सेदारी बढ़ाने और पूरे विश्व में स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए यह जरूरी है कि इन उत्पादों की कड़ाई से टेस्टिंग हो, गुणवत्ता के उच्च स्तर का निर्धारण हो और वैज्ञानिक रूप से इनका डाक्यूमेंटेशन किया जाए। कार्यशाला में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आई.सी.ए.आर.) के महानिदेशक एवं कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान विभाग, नई दिल्ली के सचिव डॉ. एस. अयप्पन ने कहा कि यह कार्यशाला मील का पत्थर साबित होगी। केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सचिव श्री एन. सान्याल ने कहा कि वर्तमान में औषधीय, सुगंधित पौधे और अकाष्ठीय वन उत्पाद के क्षेत्र में अलग-अलग विभाग कार्य कर रहे हैं। उनमें समन्वय बढ़ाने की जरूरत है तथा इनके समग्र विकास के लिए व्यवस्थित रोडमेप बनाने की जरूरत है। प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव एवं कृषि उत्पादन आयुक्त श्री अजय सिंह ने कहा कि औषधीय, सुगंधित पौधे और अकाष्ठीय वन उत्पाद के विकास के लिए व्यापक संभावनाएं हैं और इसके लिए प्रगतिशील किसानों तथा इससे जुड़े औद्योगिक क्षेत्रों को भी सम्मिलित किये जाने की जरूरत है। कार्यक्रम के प्रारंभ में विश्वविद्यालय के कुलपति श्री एस. के. पाटिल ने कार्यशाला के उद्देश्यों की जानकारी दी और बताया कि विश्वविद्यालय को औषधीय, सुगंधित पौधे और अकाष्ठीय वन उत्पाद की दृष्टि से सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाया गया है। उन्होंने बताया कि प्रदेश के 14 लाख परिवारों का जीवन अकाष्ठीय वनोत्पादों पर आधारित है। इनको संरक्षित करने के साथ-साथ इनके प्रोसेसिंग एवं वेल्यूएडिशन किये जाने की जरूरत है साथ ही साथ नागरिकों का कौशल विकास करने, इनके उत्पादन के लिए बीज तैयार करने, पोस्ट हॉर्वेस्टिंग पर ध्यान देने और बायोकेमिकल विश्लेषण करने आदि की जरूरत है। 11 विशेषज्ञों ने ऑडियो-विडियो प्रदर्शन दिया | कार्यशाला में अलग-अलग क्षेत्रों के 11 विशेषज्ञों ने औषधीय, सुगंधित पौधे और अकाष्ठीय वन उत्पाद पर ऑडियो-विडियो प्रदर्शन दिया तथा लगभग दस-दस मिनट में इन क्षेत्रों के विकास करने पर अपनी बात कही। इसके अलावा कुलपतिगणों, अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों और जानकारों ने भी अपनी बात कही। प्रदेश के राज्यपाल श्री शेखर दत्त ने लगभग पांच घंटे चले इस कार्यशाला में स्वयं पूरे समय उपस्थित रहकर वक्ताओं के विचार सुने। प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज के महाप्रबंधक श्री ए. के. सिंह ने छत्तीसगढ़ के परिप्रेक्ष्य में औषधीय, सुगंधित पौधे और अकाष्ठीय वन उत्पाद पर अपनी बात कही। उन्होंने राष्ट्रीय वन नीति 1988, 1964 में किया गया तेंदूपत्ता का राष्ट्रीयकरण, 2006 का वन अधिकार अधिनियम आदि की जानकारी दी। राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड, नई दिल्ली के सी.ई.ओ. श्री जितेन्द्र शर्मा ने भारत के औषधीय पौधों पर अपनी बात कही और कहा कि वर्तमान समय में एक बार फिर से हर्बल चिकित्सा पद्धतियों की ओर लोगों का रूझान बढ़ा है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ के इस सेंटर को उनके बोर्ड द्वारा हर संभव सहयोग दिया जाएगा। कॉमनवेल्थ एग्रीकल्चर ब्यूरेक्स इंडिया (सी.ए.बी.आई.) साउथ एशिया, नई दिल्ली के प्रादेशिक निदेशक डॉ. रवि क्षेत्रपाल ने कहा कि अकाष्ठीय वनीय उत्पादों तथा सुगंधित पौधों से जुड़ी जानकारी जनसामान्य तक सरल शब्दों में उपलब्ध कराई जाने की आवश्यकता है। इसके साथ ही वनीय उत्पादों के संग्रहण के लिये स्थानीय लोगों में कौशल का विकास, मार्केट लिंकेज एवं अधोसंरचना पर भी ध्यान देने की जरूरत है। केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा आयुष विभाग, नई दिल्ली के संयुक्त सचिव श्री बाला प्रसाद ने औषधीय पौधों के माध्यम से बेहतर आजीविका विषय पर कहा कि बाजार में औषधीय पौधों की मांग तेजी से बढ़ी है लेकिन इनकी उपलब्धता में कमी बाधा के रूप में उभर कर सामने आती है। औषधीय पौधों के समुचित दोहन के लिए वन प्रबंधन के माध्यम से सुनियोजित कार्य योजना बनाई जा सकती है, वहीं दूसरी ओर कृषि जैसे माध्यमों से इनके उत्पादन भी बढ़ावा देने की जरूरत है। फार्मास्यूटिकल टेक्नोलॉजी विभाग, जाधवपुर विश्वविद्यालय, कोलकाता के संचालक डॉ. पुलोक मुखर्जी ने कहा कि औषधीय पौधे सभी के लिए प्रकृति का उपहार है। परम्परागत भारतीय औषधीय पर अनुसंधान को बढ़ावा देने की जरूरत है साथ ही हमें इनसे निर्मित दवाइयों की गुणवत्ता, सुरक्षा संबंधी पहलुओं एवं मानकीकरण पर भी ध्यान देने की जरूरत है। सुगंध एवं सुरस विकास केन्द्र, कन्नौज, उत्तरप्रदेश के संचालक श्री एस. वी. शुक्ला ने सुगंधित तेल एवं उद्यमिता विकास पर कहा कि सुगंधित पौधों का अर्क या द्रव्य तेल एक महत्वपूर्ण कच्चा माल है। इन प्राकृतिक सुगंधित द्रव्यों का उपयोग इत्र, अगरबत्ती, धूपबत्ती सहित विभिन्न रूपों में किया जा सकता है। भारत इनकी उत्पादन की दृष्टि से विश्व में प्रमुख स्थान पर है। इससे इनके उत्पादन का दायरा और बढ़ाया जा सकता है। प्राकृतिक रेजिन एवं गोंद राष्ट्रीय संस्थान, रांची के संचालक डॉ. आर. रामानी ने कहा कि हमारा देश प्राकृतिक रेजिन एवं गोंद के बड़े उत्पादक देशों में से एक है। लाख रेजिन डाई एवं मोम का बड़ा स्रोत है। लाख उत्पादन में छत्तीसगढ़ का देश में दूसरा स्थान है। यहां लगभग 3250 टन लाख का उत्पादन प्रतिवर्ष होता है। उन्होंने इनके मूल्य संवर्धन के उपकरणों की जानकारी दी। केन्द्रीय औषधीय एवं सुगंध पौधा संस्थान, लखनऊ के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. डी. डी. पात्रा ने औषधीय पौधों का भविष्य एवं चुनौतियां विषय पर कहा कि औषधीय पौधों का कृषि में एक महत्वपूर्ण स्थान है और इनका बंजर एवं अनुपजाऊ भूमि में उत्पादन किया जा सकता है। सेन्ट्रल इंस्टीटयूट ऑफ पोस्ट हार्वेस्ट इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, लुधियाना के पूर्व डायरेक्टर डॉ. आर. टी. पाटिल ने कहा कि औषधीय पौधों के रूप में कच्चे माल का चयन एवं संग्रहण दोनों ही महत्वपूर्ण कार्य है। स्थानीय स्तर पर वनोत्पादों के स्टोरेज की सुविधा होनी चाहिए। काटको फूड टेस्ट एंड रिसर्च लेबोटरी, लुधियाना के वाइस प्रेसिडेंट तथा आर.आर.एल. जम्मू के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. एस. जी. अग्रवाल ने शहद पर अपना प्रदर्शन दिया और कहा कि खनिज से भरपूर शहद विभिन्न प्रकार के होते हैं। वर्तमान में भारत इसका विश्व में प्रमुख निर्यातक देश है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इकोलॉजी, नई दिल्ली कैम्प रायपुर के प्रेसिडेंट डॉ. डी. के. मरोठिया ने कहा कि अकाष्ठीय वनीय उत्पाद एवं सुगंधित पौधे हमारे पारिस्थितिकी को बेहतर बनाते हैं। वर्तमान में पर्यावरण से जुड़ी कई चुनौतियां, ग्लोबल वार्मिंग एवं अन्य रूपों में उभरकर सामने आ रही है। आयुष विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. टी.के. दाबके ने औषधीय आधारित दवाईयों के समुचित टेस्टिंग किये जाने तथा क्वालिटी को बनाये रखने पर जोर दिया। छत्तीसगढ़ कौंसिल ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के कार्यकारी संचालक प्रो. मुकुंद हम्बर्डे ने कहा कि उपयोगकर्ताओं को उत्पादों के संबंध में प्रमुख जानकारी होना जरूरी है। आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. जी. बी. गुप्ता ने बीमारियों के आधार पर रोगों को दूर करने वाले हर्बल का व्यवस्थित डाक्यूमेंटेशन बनाने पर जोर दिया। रामकृष्ण मिशन आश्रम नारायणपुर के स्वामी व्याप्तानंद महाराज, बस्तर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. चन्द्रा ने भी अपनी बात कही।

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