ढाई हजार एकड़ ज़मीन का मामला – अफसर नहीं चाहते मर्जर के मर्ज का इलाज हो

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admin-ajaxआई एन वी सी ,
भोपाल ,
जिला प्रशसन सहित राज्य शासन के जिम्मेदार अफसर नहीं चाहते कि भोपाल में मर्जर एग्रीमेन्ट के नाम पर विवादित की गई लगभग ढाई हजार एकड़ भूमि को सुलझने दिया जावे। उनका उद््देश्; साफ प्रकट होता है कि मर्जर का मर्ज बना रहा तो सरकारी तंत्र पर उनके दखल और प्रभाव का दबदबा कायम रखने का उनका अपना निहितार्थ बना रहेेगा। इसलिए ये अफसर सरकार चलाने वाले राजनैतिक लोगों को भी इस मर्ज का इलाज ढूँढने पर उनके विरुद्ध भ्रष्टाचार जैसी कार्यवाही का डर दिखाकर उसे उलझाये रखना चाहते हैं। दरअसल ये अफसर सरकारी तंत्र में अपने वजूद, मनमानी और जबर्दस्ती थोपने की नीति पर राजनीतिक एवं लोकतांत्रिक ताकत को हावी नहीं होने देना चाहते। इसलिए उपरोक्त अफसरों ने मर्जर विवाद पैदा करके आम जनता को दाव पर लगाकर उसे राहत और सुरक्षा देने की बाजाए उन्हें अपने निजी फायदे के लिए हथियार बनाकर इस्तेमाल किया है।
अधिवक्ता जगदीश छावानी ने आज जारी अपने बयान में उपरोक्त तथ्यों का हवाला देते हुए जानकारी दी कि उनसे पिछले एक सप्ताह में बैरागढ़ सहित प्रभावित क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोगों ने मुलकात करके आग्रह किया है कि वे पूर्व की भांति मर्जर एग्रीमेंट के मुद््दे को आधार बनाकर जनता के हितों की सुरक्षा के लिए पुन: लड़ाई के लिए आगे आऐं। जिस पर अधिवक्ता जगदीश छावानी ने उनसे कहा है कि जब तक मर्जर मामले को सुलझाने के लिए सभी प्रभावित लोग एकजुट होकर एक ही मंच से बिना किसी स्वार्थ के अपने हक के लिए लड़ाई नहीं लडऩा चाहेंगे तब तक वे अपने अधिकारों को न तो संरक्षित कर पाएंगे और न ही अपनी सम्पत्तियों की सुरक्षा कर सकेंगे। क्योंकि मर्जर मामले पर आए दिन क्षेत्रिय नेताओं द्वारा जारी बयान इस मामले को और भी पेचीदा बना रहे हैं इससे विवाद की वास्तविकता को दबाने में अफसरों को मदद मिल रही है। वहीं क्षेत्रीय नेता सिर्फ अपने प्रचार-प्रसार में इजाफा के लिए ही बयान जारी करते हैं लेकिन लोगों को न्याय मिले ऐसा वे भी नहीं चाहते।
उल्लेखनीय है कि जिला कलेक्टर की कोर्ट ने पिछले वर्ष 4 जून को मर्जर एग्रीमेंट से संबंधित स्वप्रेरणा निगरानी प्रकरणों को अधिकार क्षेत्र से बाहर होने के कारण निरस्त कर दिया था और इस आदेश के साथ नामांतरण और एनओसी सहित भवन अनुज्ञा पर लगी रोक भी समाप्त हो गई थी। बावजूद इसके जिला प्रशसन भोपाल ने अधोषित रुप से नामांतरण और एनओसी जारी करने पर रोक लगा रखी है। अफसर बैरागढ़ सहित उन आठ क्षेत्रों की भूमियों के नामांतरण एवं एवं एनओसी जारी करने के आवेदन ही नहीं ले रहे हैं जिनको स्वप्रेरणा प्रकरणों में शामिल किया गया था। राजस्व अधिकारी आवेदन यह कहकर लेने से इंकार कर रहे हैं कि प्रकरण राज्य शासन के समक्ष विचाराधीन हैं इसलिए वे आवेदन नहीं ले सकेत हैं। प्रभावितों 8ारा इन अधिकारियों से राज्य शासन के प्ररकण का हवाला देकर और शासन स्तर पर किसी तरह के स्थगन होने के आधार पर आवेदन निरस्त करने का आग्रह किया जाता है किन्तु वे इस पर भी राजी नहीं हैं।
अधिवक्ता जगदीश छावानी का कहना है कि जिले के अधिकारियों को पता है कि राज्य शासन स्तर पर वर्तमान में किसी भी तरह की कोई सुनवाई नहीं हो रही है और न ही कोई स्थगन है। यदि ऐसा कुछ होता तो शासन स्तर से प्रभावितों को अपना पक्ष रखने के लिए कोई न कोई नोटिस या सूचना जारी होती जो कि अभी तक नहीं हुई है। चूँकि जिला प्रशसन के वरिष्ठ अफसरों सहित राजस्व अधिकारी किसी तरह की कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते हैं क्योंकि वे चाहते हैं कि आम जनता के प्रकरण को जिला स्तर पर राजस्व कार्यलय में संज्ञान में लेने की बजाए आम जनता सीधे स्वयं शासन स्तर पर एप्रोच करे ताकि प्रभावित आम जनता एकजुट होने की बजाए अलग-अलग और अकेले ही अपने प्रकरण लड़े और अपनी सम्पत्ति को स्वयं ही विवादित बताएं ताकि जिला प्रशसन को किसी भी तरह का रिकार्ड उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी न उठानी पड़े। इस तरह से आम जनता अपने आप कमजोर पड़ जावेगी।
अधिवक्ता जगदीश छावानी का कहना है कि इन जिम्मेदार अफसरों को प्रभावित क्षेत्रों के लोगों की नब्ज पता है कि उनमें अपने हितों की सुरक्षा करने के लिए एकजुट होने का माद््दा बिल्कुल भी नहीं है अपितु सरकारी स्तर से डर दिखाने पर वे किसी भी कार्यवाही का सामना करने की बजाए उससे बचने के लिए अपने निजी खजाने को खोलने के लिए तैयार हो जावेंगे क्योंकि इस मर्ज से सबसे अधिक प्रभावित कोई वर्ग या समुदाय है तो वह है सिन्धी भाषी अर्थात बैरागढ़ क्षेत्र जहां सबसे अधिक सिंधी भाषी वर्ग रहता है। जगदीश छावानी का कहना है कि मर्जर का मर्ज एक मात्र निजी भूमि को हड़पने के लिए तैयार किया गया एक फार्मूला है जिसके जरिए आम जनता का शोषण करके उनसे धनराशि वसूली जा सके। यही नहीं इसकी आड़ में सरकार के समर्थक वे प्रभावशाली भू-माफिया जो सस्ते में लोगों की भूमि को हड़पने का इरादा रखते हैं उन्हें भी लाभ पहुँचाया जाकर आम जनता को अपनी जमीनें बचाने के लिए घुटने टेकने के लिए मजबूर किया जा सके। इसलिए जिम्मेदार अफसरों ने पहले योजनाबद्ध तरीके से बिना किसी योग्य कारण के मर्जर एग्रीमेंट को भूत के रुप में पैदा करके उसका मर्ज बनाया और उससे सरकार चलाने वालों को तर्क देकर सपने दिखाए गए कि जिन क्षेत्रों की भूमियों को इस मर्ज के दायरे में लाया गया है वहां के रहवासी इतने भीरु हैं कि वे सरकार की किसी भी कार्यवाही का विरोध नहीं करेंगे और उल्टा वे अपनी निजी सम्पत्ति को चोरी व अपराध करके लेने के तथ्य को स्वीकार करके उससे सुलझने के लिए भारी धनराशि देने के लिए तैयार हो जावेंगे। इसी तरह इस मर्ज की आड़ में निजी जमीनों को सरकारी करके उन्हें सरकार चलाने वालों के समर्थक प्रभावशाली भू-माफियाओं को लीज पर देकर उनसे भी लाभ बटोरने का खेल खेला जा सकता है और साथ-साथ उन लोगों की जमीनों को हथियाने का एक हथकंडा तैयार होगा जिनके पास बड़ी मात्रा में जमीनें हैं और जिनकी कीमतें आज करोड़ों रुपयों में हैं।
जगदीश छावानी के अनुसार इस प्रकार सराकारी अफसरों का उद््देश्; है कि यदि भोपाल में मर्जर का मर्ज बनाए रखा गया तो इस विवाद के जरिए न सिर्फ राज्य पर शासन करने वाले राजनीतिक दलों को अपितु आम जनता को इसके डर से उलझाए रखा जा सकता है और साथ में वे अपने दबाव को कायम भी रख सकते हैं। इससे कोई भी राजनीतिक दल मर्जर के मर्ज से आम जनता को राहत पहुँचाने की बात भी नहीं करेगा। अन्यथा कोई कारण नहीं था कि मर्जर एग्रीमेन्ट को आधार बनाकर भोपाल की जिन भूमियों को वर्ष 2007 के विवादित किया गया उनसे राज्य शासन को आज तक किसी भी तरह का कोई आर्थिक नुकसान नहीं हुआ उल्टा भारी राजस्व के रुप में लाभ ही मिलता रहा है। दिनांक 13 अप्रेल को मुख्यमंत्री निवास पर आयोजित चेतीचांद उत्सव कार्यक्रम से सिंधी समुदाय को न सिर्फ आशा अपितु विश्वास था कि मुख्यमंत्री की ओर से मर्जर के मर्ज को समाप्त करने सहित सिन्धी भाषियों को पट्टे के मसले का निराकरण करने का कोई हल निकाला जावेगा। किन्तु उक्त कार्यक्रम में किसी तरह की कोई घोषणा तो नहीं हुई उल्टा यह कहकर निराश किया गया कि चुनाव नजदीक हैं इसलिए कोई घोषणा नहीं की जा सकती है। जबकि सत्य तो यह है कि 13 अप्रेल के पष्चात मुख्यमंत्री निवास पर कई वर्ग और समुदाय की पंचायत आयोजित की गई किन्तु उन कार्यक्रमों में घोषण करने के लिए अफसरों ने मुख्यमंत्री को पूरी छूट दे दी और उसमें चुनाव जैसा कोई बहाना भी आड़े नहीं आया।

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