डॉ. यशस्विनी पाण्डेय की कविताएँ

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 टिप्पणी : यशस्विनी पाण्डेय की कविताएँ  गुलमोहर के फू लों की तरह  हैं।  इनमें नई गंध हैं , कुम्हार के गढ़े हुए नये प्याले का कच्चापन हैं।  समय के धूप में पककर ये और मजबूत होंगी, इन कविताओं को पढ़कर ये बात पाठक समझ पाएंगे।  कवयित्री के पास न भाषा की जादूगरी हैं न ही शब्दों की चालाकी। भविष्य में इनके लेखन में मजबूती आएगी यह विश्वास है। शुभकामनाओं के साथ नित्यानन्द गायेन

डॉ. यशस्विनी पाण्डेय की कविताएँ

पहले लिखते थे चिट्ठियां सबको

लिखावट सजा -सजा के
तुम भी सहेज के रखते थे उन्हें
जैसे सहेज के रखता है कोई
अपने जमीं -जायदाद के कागज
गुम हो गई हैं लिखावट अब
पोस्टकार्ड नही आते
न बैरन चिट्ठियां
न नए साल के कार्ड आते हैं
दिल ,फूल ,आई लव यू लिखे
और तमाम शेरो -शायरी
जो थे भी वो कूड़ा समझ के
फेंक दिया
और तुम्हारे तो इस डर से
की पढ़ न ले कोई
हमारी लम्बी -लम्बी बातें
शायद ३६  पेज रहा होगा
हाँ, इससे कम तो नही
जो शायद अब बेतुकी लगें
अब लिखना भी हो पाये या नही
वो हड़बड़ाई ,प्यार की अंगड़ाई
बिखरे लिखावट के
वो ३६  पेज

प्यार तुम्हारा जैसे चक्रवात

मानस में आंधी
गर्म हवा ऊपर मस्तिस्क में
आधी देह जलाती
ठंडी हवा नीचे
पैरों को जैसे सुन्न करती हुई
आधी देह निश्चेत
इस व्यास में समूचा अस्तित्व मेरा
बह चला,उड़ चला,रुक न सका
कहीं टोर्नेडोज तो नही तुम ?
हाँ ,शायद वही
सबसे आक्रामक तूफ़ान
बिना चेतावनी दिए
कभी भी कहीं भी
अंतस में
वाह्य में भी
अंतर इतना ही
उसका प्रभाव दृश्य
तुम्हारा अदृश्य

 गुलमोहर के फूल की तरह

होंठ उसके
नहीं नहीं और भी कुछ
या गुलाब  के एक पंखुड़ी ,
मूंगा ,जामुनी रंग , सूरज की तीखी रौशनी
या क्या पता नहीं ?
पर कुछ तो अलौकिक
उदात्तीकरण में मै
होठों के पास
सफ़ेद रेत समंदर के तुम्हारे गाल
नाक जैसे पेंगुइन निकलती  है
दोनों तरफ से उछल के
बीच में आकर स्थिर
जब हँसते  तो जैसे
लहरें उफ़न के फिर शांत हो गयी हों
उन होंठो के बीच
उफ़ ये जीभ ,
जैसे ढलती साँझ
या समंदर में नाव
जो जिन्दा कर दें
या मार दें /
फेफड़ों का फूलना
और ह्रदय की गति
अचानक  तेजी  से बढ़ रही है
तुम्हारी दो आँखें
दो सूरज के दहकते गोले
बिना देखे ही जलाये
प्यास जगाये
बस गिरने वाली स्थिति
चूम लिया मैंने तुमको
तुम चकित हुई
क्या हुआ तुम स्त्री हो ?
मै भी हूँ स्त्री
तुम्हारी तरह ही
बस तुम्हारी दिव्यता का शिकार
कोई पशु नहीं
पशुओं से परहेज नहीं
मुझसे कैसा ?
परमात्मा की बनाई सबसे
विलक्षण,अनुपम ,सत्यम ,सुंदरम मधुर कृति
खोलो द्वार भाग्य के
एक स्त्री का ऐसा प्रेम पाना
मार्ग है स्वर्ग का
जीवित होकर //

 घास की बिछी गद्दियां

रंग उनका कुछ हरा कुछ पीला
थोड़ी दूर पर
सूरजमुखी का एक पौधा
एक फूल खिला सा
ताकता सूरज की ओर
आस पिए  ,प्यास लिए धुप की
सूरज भी उसी की तरफ
कुछ ठगा कुछ उगा सा
बादलों के झुरमुट को चीरने का
अनवरत प्रयास
दो चार कदम पर घर हमारा
देख रहे इस प्रणय क्रीड़ा को
प्रकृति द्वारा प्रदत्त उस घास की गद्दी पर
भेद न पाया सूरज
बादलों के इस व्यूह को
समय के इस चक्र को
अस्त हो गया थक के
मुरझा गयी सूर्यमुखी
नहीं रही वो पहले जैसी
ना बचा रहा सूर्य में उतना ताप
मैंने घबराकर पकड़ लिया तुम्हारा हाथ
कस के ,
तुमने देखा निश्चिंत भाव से
जैसे तुम कह रहे हो
मै भेदूंगा हर  व्यूह को
और रहोगी हर चक्रव्यूह  में तुम भी
जीवन के ……………………//

प्रस्तुति :
नित्यानन्द गायेन 
Assitant Editor
International News and Views Corporation

invc news डॉ. यशस्विनी पाण्डेय 

सम्पर्क – yashaswinipathak@gmail.com

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16 COMMENTS

  1. बहुत सुन्दर कविताएँ।पढ़कर मन मुग्ध हो गया।अंतर्मन को छूती हुई भावाभिव्यक्ति।मन में सदा के लिए अंकित हो जाये।

  2. suranmukhi wale kawita me aapne apne prem ko prkriti aur uske sadhno se apne prem ki tulna karte hue apne prem ki sthirta ka jo parichy diya hai wo hridy sprsshi hai

  3. शानदार ,तारीफ़ के लियें अलफ़ाज़ ही नहीं बचे हैं

  4. गुलमोहर के फूल की तरह…. डॉ. यशस्विनी पाण्डेय जी आपने इस कविता में जो कहानी कही हैं …वह …भूतकाल के किसी कोने में लाकर खडा कर देती हैं ! देर …बहुत देर तक बस उसी कोने में रहने का मन करने लगता हैं !

    मैं पहली बार इस न्यूज़ पोर्टल पर पढ़ने के आई हूँ …पहलीबार लगा की मैं इतनी देर क्यूँ आई !

  5. बहुत सुन्दर सबसे हटके।पहली कविता”पहले लिखते थे चिट्ठियां…पुरानी यादें ताज़ा कर देती हैं।मै तुम्हारे लिए बहुत खुश हूँ और तुम्हारी सफलता की कामना करती हूँ की एक दिन तुम्हारा नाम प्रसिद्ध कवियो में सुमार हो

  6. aapki sabhi kawitayen ek se bdhkar ek hain pahli kawita me aapne bdlte hue samay k sath chitthiyon ka gayab hona jis trh btaya hai wo aj ka kadwa sch hai
    2.dusri kawita me pyaar ki tulna tornedo se ki h jo ek nya bimb hai ..nya prtik hai ,,pyaar ka prbhaw tufan ki trh nhi dikhta na wo itna winashkari hota hai ,,,
    3.tisri kawita me manushy manushy ke prem ka smrthn kiya hai lingbhed ko mitakar pyaar to kisi se bhi kiya ja sakta hai ek chote shishu ko bhi chumne ka utna hi manhota hai jitna preysi ko premi ko
    4.suraj aur surajmukhi ke prem se apne prem ko sreshth btate hue hridy me hilor jga di aapne
    dhnywaad itni achhi kawita likhne ke liye aage bhi intjaar rahega

  7. आपकी कविता में सच में अलग तरह की गंध है एक स्त्री को लेकर जिस तरह खुल कर आपने अपने विचार व्यक्त किये वो सबके वश की बात नहीं ,लव ऑफ़ किस,किस ऑफ़ लव के झूठे पाखंड की लड़ाई में आपकी कविता जवाब है |

  8. गुलमोहर के फूल की तरह,,,Hello.This was extremely interesting, particularly since I was investigating for thoughts on this matter last couple of days.

  9. Great post but I was wondering if you could write a litte more on this topic? I’d be very grateful if you could elaborate a little bit further.

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