Saturday, November 16th, 2019
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जिला प्रशासन पहुंचा कोर्ट, मांगी मोहलत - मामला कोच फैक्ट्री के लिए अधिगृहीत की गई 400 एकड़ जमीन का

 - प्रस्तुत किया आवेदन, दी प्रकरण की जानकारी images (2)आई एन वी सी ,

भोपाल, कोच फैक्ट्री के निर्माण के लिए तीस साल पहले अधिगृहीत की गई 400 एकड़ जमीन के मामले में कुर्की की कारर्वाई से बचने अब जिला प्रशासन ने एडीजे कोर्ट की शरण ले रहा है। सोमवार को कोर्ट में एक आवेदन लगाकर किसानों को मुआवजे की राशि दिलाने के लिए समय मांगा है। सूत्र बताते हैं कि आवेदन में बताया गया है कि इस मामले में सेंट्रल रेलवे से राशि उपलब्ध कराने के लिए नोटिस भेज दिया गया है। इसके अतिरिक्त किसानों को दी जाने वाली राशि को लेकर भी रेलवे प्रशासन से लगातार चर्चा चल रही है। रेलवे से जैसे ही राशि प्राप्त होगी, किसानों को उपलब्ध करा दी जाएगी। ऐसी स्थिति में जिला प्रशासन को इस राशि को उपलब्ध कराने के लिए समय दिया जाए। इधर किसानों ने वकील  बीएल रघुवंशी ने इस बात की पुष्टि की है। उनका कहना है कि मंगलवार को जिला प्रशासन के तहसीलदार व अन्य अधिकारी कोर्ट में एक आवेदन प्रस्तुत करके आए हैं। जिसकी सुनवाई 23 जनवरी को पूर्व निर्धारित पेशी के समय होगी। --------- चल संपत्ति कुर्क की जाने करेंगे मांग - किसानों के वकील श्री रघुवंशी ने बताया कि एडीजे कोर्ट के आदेश के बाद भी न्यायालय के अमले को कुर्की करने से रोका जा रहा है। अधिकारी वाहन लेकर निकल जाते हैं। वाहन रोकने पर एफआईआर दर्ज कराई जाती है। इन सभी बातों से एडीजे कोर्ट को आगामी पेशी में अवगत कराया जाएगा। यही नहीं न्यायालय की कायर्वाही में बाधा डालने तथा कोर्ट की आदेश की अवमानना करने संबंधी आवेदन भी प्रस्तुत किया जाएगा और न्यायालय से मांग की जाएगी कि वह जिला प्रशासन के अधिकारियों पर भी कारर्वाई करें। इसके अतिरिक्त कोर्ट से गुहार लगाई जाएगी कि वह इस बार चल संपत्ति को कुर्क करने के आदेश दें, ताकि कलेक्टर कार्यालय में ताला लगा दिया जाए और पूरी संपत्ति कुर्क हो सके। ----------- अब रेलवे को ला रहे समाने - कोच फैक्ट्री के लिए दी गई जमीन, जिला प्रशासन ने किसानों से अधिगृहण करके दी थी। जब 2004 में एडीजे कोर्ट से जमीन की अतिरिक्त राशि देने के लिए फैसला हुआ, उस समय कोर्ट में केवल जिला प्रशासन ही पार्टी थी। जिला प्रशासन के अधिकारियों ने भी रेलवे को इस मामले में पार्टी बनाना उचित नहीं समझा था। अब जिला प्रशासन के उपर कुर्की जैसी आफत आई, तब कहीं जाकर अधिकारी रेलवे को इस मामले में सामने ला रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि कोर्ट में दिए जा रहे आवेदन में बताया जा रहा है कि किसानों की जमीनों का अधिगृहण रेलवे के लिए किया गया था। एडीजे कोर्ट के फैसल के बाद राशि को लेकर रेलवे को राशि उपलब्ध कराने कई बार नोटिस दिए गए हैं। एक नोटिस वतर्मान में भी दिया गया है। इसके आधार पर जमीन के अतिरिक्त मुआवजे की राशि को शीघ्र उपलब्ध कराए जाने को लेकर चर्चा चल रही है। --------------- यह भी हो सकती है कायर्वाही - प्रशासनिक सूत्रों की माने तो अधिग्रहित जमीन का मुआवजा प्रकरण मामले में रेलवे जल्द ही अपना फैसला नहीं देता है तो जिला प्रशासन दूसरे तरीके से राशि पाने की कोशिश कर सकता है। यह तरीका रेलवे पर कायर्वाही करने को लेकर भी हो सकता है। सूत्र बताते हैं कि इसके तहत जिला प्रशासन किसानों को दी जाने वाली मुआवजा राशि जमा करने के लिए रेलवे को पहले एक नोटिस जारी करेगा। इसके बाद ाी राशि जमा नहीं करने पर रेलवे को आरसीसी के तहत नोटिस जारी किए जाएंगे। इसमें राशि जमा कराने के लिए समयसीमा तय होगी। उस समयावधि के बाद भी राशि जमा न होने पर कुर्की की कायर्वाही तक की चेतावनी दी जाएगी। इसके बाद भी मामला नहीं सुलझता है तो प्रशासन या तो रेलवे की संपत्ति की कुर्की के आदेश दे सकता है या फिर अधिगृहीत जमीनों का डी-नोटिफिकेशन कर  किसानों को जमीन वापस दिलाने की प्रक्रिया शुरू कर सकता है। --------------- यह है मामला -  सन 1983-84 में प्रदेश सरकार के निर्देश पर जिला प्रशासन ने भोपाल रेलवे को कोच फैक्ट्री स्थापित करने के लिए करीब 420 एकड़ जमीन किसानों से अधिगृहीत करके दी थी। करारिया, भानपुर व छोला क्षेत्र के करीब 44 किसानों की यह जमीन थी, जिसका भू-अर्जन कर मुआवजा भी दिया गया। इसमें किसानों से एक एकड़ से लेकर 21 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई थी। इन जमीनों का मुआवजा भी 18 हजार रुपए प्रति एकड़ असिंचित व 28 हजार रुपए प्रति एकड़ सिंचित के हिसाब से दिया गया। मुआवजा कम दिए जाने की मांग को लेकर 18 किसानों ने सिविल कोर्ट में जिला प्रशासन केखिलाफ केस लगा दिया। कोर्ट ने वर्ष 2004 में अपना निर्णय सुनाते हुए 1200 रुपए प्रति एकड़ असिंचित व 1800 रुपए प्रति एकड़ सिंचित केहिसाब से किसानों की अतिरिक्त राशि (मुआवजा)   देने के निर्देश दिए। इसके बाद जिला प्रशासन ने किसानों को रेलवे के पास भेज दिया। रेलवे ने अपना मामला न होने की बात कहते हुए किसानों को वापस जिला प्रशासन के पास भेज दिया।

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