Wednesday, October 23rd, 2019
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जाट आरक्षण - हम इसका हल चाहते हैं

महाधिवक्ता बलदेव राज महाजनआई एन वी सी न्यूज़ हरियाणा , हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल ने कहा कि जाट आरक्षण का मुद्दा वर्षों पुराना मुद्दा है। हम इसका हल चाहते हैं। यह एक सामाजिक मुद्दा है, इसका राजनितिकरण नहीं किया जाना चाहिए। सदन के सदस्यों को इसके समाधान के लिए सकारात्मक सुझाव देने चाहिए और इस पर न्यायालय की रोक हटावाने के लिए आगे बढऩा चाहिए।  मुख्यमंत्री आज विपक्ष के नेता श्री अभय सिंह चौटाला व अन्य सदस्यों द्वारा विधानसभा सत्र में जाट आरक्षण पर दिए गये स्थगन प्रस्ताव, जिसे बाद में अध्यक्ष द्वारा ध्यानाकर्षण प्रस्ताव में स्वीकार कर लिया था, पर चर्चा के दौरान बोल रहे थे। हालांकि विधानसभा कार्यवाही प्रक्रिया नियम 174 सी और डी के तहत ऐसे मुद्दों पर सदन में चर्चा नहीं की जा सकती, जो भारत के किसी भी न्यायालय में लम्बित हों। बाद में अध्यक्ष द्वारा इस ध्यानाकर्षण प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया गया। सदन में मामले पर अब तक के कानूनी पक्ष की जानकारी देने व हरियाणा सरकार की ओर से सदन में जबाव देने के लिए महाधिवक्ता श्री बलदेव राज महाजन को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था। उन्होंने सदन को अवगत करवाया कि 27 जुलाई, 2015 को पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा लगाई गई रोक के विरूद्ध हरियाणा सरकार सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अवकाश याचिका दायर करने की प्रक्रिया पर कार्य कर रही है। श्री महाजन ने बताया हरियाणा सरकार ने न्यायमूर्ति (सेवानिवृत) केसी गुप्ता की अध्यक्षता में दिसम्बर 2012 में जाटों को पिछड़ा वर्ग श्रेणी में शामिल करने के लिए एक सदस्यीय आयोग का गठन किया था। विभिन्न प्रक्रियाओं को पूरा करते हुए आयोग ने बिश्नोई, जाट, जट सिक्ख, रोड़ व त्यागी समुदाय के लोगों को विशेष पिछड़ा वर्ग समुदाय में शामिल करने की सिफारिश की थी। आयोग की सिफारिशों पर हरियाणा सरकार ने इन समुदाय के लोगों को विशेष पिछड़ा वर्ग में शामिल करने के लिए 24 जनवरी, 2013 को अधिसूचना जारी थी। उन्होंने बताया कि अधिसूचना अनुसार पिछड़ा वर्ग को पहले से ही उपलब्ध 27 प्रतिशत आरक्षण को छेड़े बिना ऊपर वर्णित वर्गों के लिए भी सरकार/सरकारी उपक्रमों और स्थानीय निकायों में नौकरियों के साथ-साथ शिक्षण संस्थानों में दाखिले में 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया था। विशेष पिछड़ा वर्ग को लाभ प्रदान करने के लिए मानदण्ड वहीं होंगे, जो राज्य में पिछड़ा वर्गों के लिए लागू हंै और इस सम्बन्ध में सरकार द्वारा समय-समय पर अन्य दिशानिर्देश जारी किए गए हैं। बाद में 15 जुलाई, 2014 के दिशानिर्देशों के माध्यम से विशेष पिछड़ा वर्ग को श्रेणी-1 एवं श्रेणी-2 की सीधी भर्ती में पांच प्रतिशत और श्रेणी-3 और श्रेणी-4 के पदों में 10 प्रतिशत एवं शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए भी 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया। श्री महाजन ने सदन को अवगत करवाया कि 4 मार्च, 2014 को हरियाणा सरकार की सिफारिशों पर राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा जाटों को केन्द्र सरकार की पिछड़ा वर्ग की सूची में शामिल किया गया जिसे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राम सिंह एवं अन्य बनाम भारतीय संघ शीर्षक की याचिका (सिविल) क्रमांक 274/2014 में  दिनांक 17-3-2015 को दिए अपने निर्णय के माध्यम से इस अधिसूचना को रद्द कर दिया गया। महाधिवक्ता ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का सार में कहा गया है कि ‘‘जहां तक हरियाणा का सम्बंध है, ऐसा प्रतीत होता है कि शैक्षणिक रूप से पिछड़ेपन को इसका आधार माना गया है। इसी प्रकार, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के लिए भी, ओबीसी सूची में जाटों को शामिल करने के लिए शैक्षणिक पिछड़ेपन के साथ-साथ इस तथ्य को भी ध्यान रखा गया कि जाट, गुज्जरों से पिछड़े हैं जिन्हें केन्द्र की ओबीसी सूची में पहले ही शामिल किया जा चुका है। इसी प्रकार, ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में भी शैक्षणिक पिछड़ेपन को आधार माना गया है और राजस्थान के सम्बन्ध में भी यही स्थिति है। यद्यपि मध्यप्रदेश, गुजरात और बिहार राज्यों को भी रद्द अधिसूचना के आधार पर केन्द्र की ओबीसी सूची में शामिल किया गया है, लेकिन 2 मार्च, 2014 को मंत्रिमण्डल की  कार्य सूची में इन राज्यों के मामलों पर स्पष्ट रूप से विचार नहीं किया गया । हालांकि, मंत्रिमण्डल से प्रत्येक राज्य के लिए अपनी राय को रिकॉर्ड में रखने की अपेक्षा नहीं की जाती, परन्तु जब ऐसा कुछ राज्यों के लिए किया जाता है, अन्य राज्यों के किसी उल्लेख का न होना इस निष्कर्ष का मजबूत आधार होगा कि जिन राज्यों का कार्य सूची में कोई उल्लेख नहीं मिला, वास्तव में मंत्रिमण्डल द्वारा उन पर विचार ही नहीं किया गया ...। उक्त वर्णित विभिन्न कारणों से, हम केन्द्र सरकार द्वारा दी गई इस राय से सहमत नहीं हो सकते कि इन नौ राज्यों में जाट एक पिछड़ा समुदाय है और सम्बन्धित राज्यों के लिए अन्य पिछड़ा वर्गों की केन्द्रीय सूची में शामिल होने का पात्र है। इसके विपरीत, एनसीबीसी द्वारा किया गया विचार अच्छे एवं स्वीकार्य कारणों से पर्याप्त रूप से पुष्टï है जो केन्द्र सरकार द्वारा आगे की परिणामी कार्यवाही करने के लिए एक मजबूत एवं उचित आधार प्रदान करता है। उक्त परिस्थिति में हम दिनांक 4-3-2014 की अधिसूचना को उचित नहीं मान सकते। तदनुसार, बिहार, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, राष्टï्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, राजस्थान के भरतपुर एवं धोलपुर जिलों, उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखण्ड राज्यों के जाटों को केन्द्र की अन्य पिछड़ा वर्ग सूची में शामिल करने वाली उक्त अधिसूचना क्रमांक-63 दिनांक 4-3-2014 खारिज की जाती है। ’’ कुछ निजी याचिकाकर्ताओं ने भी माननीय पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में  सिविल रिट याचिकाएं दायर करके राज्य सरकार की उन अधिसूचनाओं को चुनौती दी है जिनमें जाट समुदाय को सरकारी नौकरियों के साथ-साथ सरकारी संस्थाओं में प्रवेश के लिए आरक्षण दिया गया था। दिनांक 27.7.2015 के आदेश के अनुसार विशेष पिछड़ा वर्ग आरक्षण पर राज्य ने केवल रोक लगाई है, उसे रद्द नहीं किया गया है। सरकार ने महाधिवक्ता के परामर्श पर राज्य में शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश एवं भर्तियों के लिए दिशानिर्देश जारी किये हैं। जो पद विज्ञापित हो चुके हैं तथा जिनके लिए आवेदन फार्म भी प्राप्त किये जा चुके हैं,उनके लिए विशेष पिछड़ा वर्ग श्रेणी में आवेदन करने वाले उम्मीदवारों को अस्थाई प्रवेश पत्र इस शर्त के साथ जारी किये जा सकते हैं कि उनका अन्तिम परिणाम माननीय उच्च न्यायालय में लम्बित याचिकाओं पर अन्तिम निर्णय होने के बाद ही जारी किया जाएगा। इस उद्देश्य के लिए एचपीएससी/ एचएसएससी तथा भर्ती करने वाले अन्य विभागों द्वारा पहले जारी किये विज्ञापनों के सन्दर्भ में शुद्धिपत्र दिया जा सकता है। इन उम्मीदवारों पर, आयु में छूट का लाभ लेने वालों को छोडक़र, यदि अन्तिम न्यायिक निर्णय में यह अधिसूचना रद्द हो जाती है तो परीक्षा में सफल होने पर ऐसे उम्मीदवारों पर सामान्य उम्मीदवारों की सूची के अन्दर सामान्य रिक्तियों के समक्ष विचार किया जाएगा। यदि भर्ती प्रक्रिया समाप्त होने तक याचिका पर निर्णय नहीं आता है और परिणाम घोषित होने के लिए तैयार है तो उस स्थिति में विशेष पिछड़ा वर्ग के उन उम्मीदवारों,जिन्होंने आयु और फीस छूट का लाभ लिया है और मैरिट आधार पर सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के साथ प्रतिस्पर्धा की है,का परिणाम  याचिका का निर्णय आने तक रोका लिया जाएगा। यदि विशेष पिछड़ा वर्ग  आरक्षण की अधिसूचना रद्द हो जाती है तो इन विशेष पिछड़ा वर्ग उम्मीदवारों का परिणाम रद्द माना जाएगा क्योंकि वे आयु के आधार पर अयोग्य हो जाएंगे। विशेष पिछड़ा वर्ग के जिन उम्मीदवारों ने आयु छूट का कोई लाभ नहीं लिया है और सामान्य श्रेणी की रिक्तियों में मैरिट पर सफलता प्राप्त की है , उनका परिणाम घोषित करने में कोई अड़चन नहीं होगी। यदि याचिका निर्णय में विशेष पिछड़ा वर्ग अधिसूचना को कायम रखा जाता है तो विशेष पिछड़ा वर्ग उम्मीदवारों, चाहे उन्होंने आयु में छूट लाभ लिया है या नहीं,को उसी अनुपात में चयनित किया जाएगा जैसे कि अन्य आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों का चयन किया जाता है अर्थात जो उम्मीदवार सामान्य में सफल में हुए है उन्हें सामान्य/खुली रिक्तियों में तथा अन्य को विशेष पिछड़ा वर्ग कोटा में गिना जाएगा जैसेकि एससी/एसटी/ओबीसी रिक्तियों के लिए विधि सम्मत प्रक्रिया है। जो पद अभी तक विज्ञापित नहीं किए गये हैं, उन के लिए विभागों से माननीय उच्च न्यायालय का अन्तिम निर्णय आने तक रोस्टर के अनुसार विशेष पिछड़ा वर्ग के लिए निर्धारित पदों की संख्या की संशोधित मांग करने का निर्णय लिया गया है। इन पदों को निर्णय के अनुसार बैकलॉग के रूप में या सामान्य उम्मीदवारों के लिए ,जैसा भी मामला हो, पुन: विज्ञापित किया जा सकता है। विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों में विशेष पिछड़ा वर्ग के प्रवेश के  मामले में राज्य सरकार ने माननीय उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में अंतरिम उपाय के तौर पर काउंसलिंग प्रक्रिया के दौरान 10 प्रतिशत सीटोंं को विशेष पिछड़ा वर्ग के लिए खाली रखने का निर्णय लिया है। यह भी निर्णय लिया गया है कि संस्थानों में 90 प्रतिशत सीटें पूरी होने के पश्चात प्रशासनिक विभाग स्थिति पर पुन: विचार के लिए मामला सरकार को भेज सकता है।

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