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Saturday, September 19th, 2020

**ज़ुबान व काम पर नियंत्रण चाहती है आवाम

**नरेन्द्र सिंह राणा
लोकतंत्र में जनता ही असली मालिक होती है। यह बात नेता व अफसर जानते हैं लेकिन मानते नहीं है। देश के सबसे बड़े प्रान्त उ0प्र0 में विधानसभा चुनाव हो रहें है। सभी दलों ने अपनी पूरी ताकत चुनाव में झोंकी हुई है। भाजपा और कांग्रेस दो रा"ट्रीय पार्टियां तथा सपा और बसपा देा क्षेत्रीय दल इस बार जनता को यह बताने में दिन रात एक किए हुऐ हैं कि उनकी दाल में कुछ काला नहीं हैं। हमने ऐसा किया, हम ऐसा करेंगे बस हमें मौका तो दीजिए। आम आदमी उनकी ज़ुबान पर यकीन करने को तैयार नहीं है। जनता पूछना चाहती है कि यदि तुम्हारी दाल में कुछ भी नहीं है काला तो आम आदमी का मंहगाई से कैसे निकला दिवाला। चरम पर कमर तोड़ मंहगाई की मार, भयंकर भ्र"टाचार, नौजवान बेरोजगार, बहन बेटियों से होता बलात्कार, ग़रीब को रोज पीटता थानेदार, वि'व में सर्वाधिक बच्चे भारत में कुपो"ाण के ि'ाकार, सर्वत्र मचा हाहाकार, यह कैसा राजनीतिज्ञों का जनता से प्यार। लुटता-पिटता व आत्महत्या को नित मजबूर होता किसान, रातो रात माला माल होते अफसर नेता यह कैसा कमाल जो जनता को करते रहे है हलाल, नही करते और न ही करने देते मलाल, बस यही है आज का जनताजनार्दन का सवाल। इन सवालों से बचते घूम रहे है पार्टियों के युवराज चाहतें है बस राज।
सभी जानते है कि जीभ में हड्डी नही होती लेकिन 'ारीर की सम्पूर्ण हडि्डयां तुड़वाने की ताकत उसमें होती है। जीभ ही खाती है और मार तथा जेल की सलाखों के पीछे भी पहुंचाती है। भोजन व जेल का मजा भी चखाती है।
भारतीय दर्शन ने वि'व का मार्गदर्शन किया है। सर्वे भवन्तु सुखिना, सर्वे सन्तु निराम्या का महामंत्र हमने ही दुनिया को दिया है। सत्य बोलना, कम बोलना, उसे तोलना यही है धर्म सत्ता व परम सत्ता का संदेश।
त्रेता युग में मर्यादा पुरु"ाोंत्तम भगवान श्रीराम जब लीला करते-करते चित्रकूट पहुंचे तो उन्होने हर हाल में कैसे सम्मानपूर्वक व प्रिय होकर जिया जाता है उसकी ि'ाक्षा जन्मानस को देने हेतु लक्षमण से कहा कि हे लक्षमण हम महलों में रहना तो जानते है क्योंकि अयोध्यापति राजा द'ारथ के बेटे है महलों में पैदा हुए लेकिन अब वनवास में 14 व"ाz रहना है तो यहां के तौर तरीके भी आने चाहिए। उन्होने लक्षमण से कहा कि करुणावतार (भगवान ि'ाव)
उल्लेखनीय है कि करुणा पे्रम से भी आगे का पग है।
वन में रहते है अत: हमें उनसे मार्गदर्शन लेना चाहिए। लक्षमण जी ने पूछा भईया भोेले बाबा इस समय कहां मिलेंगे\ प्रभु श्रीराम ने कहा कि अनुज तुम इस पहाड़ के पार उस पहाड़ पर जाओ वही भगवान ि'ाव मिलेंगे उनसे कहना और पूछना कि हम 14 व"ाz तक वन में कैसे रहे। आज्ञानुसार लक्षमण जी उस पहाड़ पर पहुंचे। पूरा दिन पहाड़ पर भगवान ि'ाव को खोजते रहे लेकिन भगवान ि'ाव नही मिलें। लक्षमण जी लौटनें लगे तेा उनके मन में विचार आया कि भगवान श्री राम ने कहा ि'ाव यहां है तो राम का वचन सत्य होता है। अत: मुझे पुन: खोजना होगा त्रिपुरारी को रात होने को थी। उन्हें बाबा वि'वनाथ नही मिले लक्षमण जी लौट रहे थे तभी एक साधु दिखायी पड़ा वह कुछ अजीब सी मुद्रा में खड़ा थां उसने एक हाथ से अपनी ज़ुबान पकड़ रखी थी और दूसरे हाथ से अपने लगोंट को पकड़े था। लक्षमण जी ने उस साधु को कुछ मानसिक पीड़ित सा समझा और वापस भगवान श्री राम के पास चित्रकूट पर्वत पर आ गए। श्री राम ने पूछा भईया लक्षमण क्या कहा भालेनाथ ने\ लक्षमण जी ने पूरा दिन खोजने पर भी भोलेबाबा के न मिल पाने की बात बतायी। प्रभु श्री राम ने पूछा कि वो किसी और रुप में भी हो सकते है क्या तुम्हे कोई और नही मिला वहा कोई तो मिला अथवा दिखा होगा। तब लक्षमण जी ने कहा वापसी में एक साधु अजीब सी मुद्रा में दिखायी पड़ा manे उन्हे आवाज भी दी परन्तु वह कुछ नही बोले। उसने अपने एक हाथ से अपनी ज़ुबान पकड़े हुई थी और दूसरे हाथ से अपनी लंगोट को कसके पकड़े था। ´´जिनको प्राप्त करने के लिए योगीजन योग करते है तपस्वी तप करते है, हम संसारी लोग भी पूजापाठ का दिखावा करते हैं। उनके वि"ाय में विधेयराज राजा जनक ने क्या प्रार्थना की वह  श्री रामचरितमानस में बाबा गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है ´´कैहि विधि करहु राम तुम्हारी प्रसं'ाा- तुम मुनी महे'ा मन मानस हंसा-योगी करही योग जेहि लागी- कोह मोह ममता मद त्यागी- मनसहित जेहि जान न वाणी  तर्क न सकही सकल अनुमानी।´´ अर्थात क्रोध, मोह, ममता और मद छोड़कर योगी जिनके लिए योग करते हैं। हे राम मै किस प्रकार तुम्हारी प्रसं'ाा करु तुम तो मुनियों और महादेव के मन रुपी मानसरोवर के हंस हो। यहंा बाबा ने योगी की परिभा"ाा बतलाई हैं। इन पंक्तिएां के माध्यम से मुनियों तथा महादेव का मन मानसरोवर होता है उसी में राम नाम रुपी हंस रहता है।
ब्रह्म हो अकथनीय हो, सचिदानंद हो निगुर्ण हो निराकार हो मन सहित वाणी भी जिसे जान नही सकती वहां कोई तर्क नही चलता केवल और केवल अनुमान ही होता है। आप तीनो कालों में सदा एक रस रहते है। प्रभु श्रीराम मुस्कुराए और बोले हे लक्षमण वही तो भगवान 'ांकर थे और उन्होने इ'ाारे से हमें बताया कि ज़ुबान पर और अपने काम पर जो नियंत्रण रखेगा वह वन ही नही कही भी रहने योग्य है रह सकता हैं। सनातन भारतीय संस्कृति का यह महामंत्र इन अफसरों और नेताओं को समझ नही पड़ता तभी तो ये आज राजा से रंक, घर से बेघर, सुहागिन से विधवा आदि-आदि बने है।
कांग्रेस के नेताअों व मंत्रियों की ज़ुबान पर जरा गौर फ़रमाइए तो इनकी बदज़ुबानी से चुनाव आयोग खफा है। चुनाव आयोग उनके बयानो को आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन मानता है दो वरि"ठ केन्द्रीय मंत्रियों के बाद कांग्रेस के युवराज भी आचार संहिता की धज्जियां उड़ाने में पीछे नहीं रहे। चाहे बात भ्र"टाचार पर अंकु'ा के लिए स'ाक्त लोकपाल की मांग कर रहे रा"ट्र संत अन्ना हज़ारे के आंदोलन के समय की हो, आम जनता का पैसा लूटकर विदे'ाों में जमा करने की बात करने वाले बाबा रामदेव की हो, चुनाव 'ाांतिपूर्ण-नि"पक्ष व भयमुक्त हो इस कोि'ा'ा में सफल होते चुनाव आयोग की हो कांग्रेस के नेताओं व मंत्रियों का अहंकार सर चढ़कर बोल रहा है। एक 'ाब्द भी वो मंहगाई व कालेधन पर सुनने को तैयार नही है। याद दिलाते चले कांग्रेस प्रवक्ता ने अन्ना हज़ारे को सेना का भगोड़ा तक कह डाला था जब बात बिगड़ी तो माफ़ी मांगने लगे यही हाल इनके रा"ट्रीय महासचिव व उत्तर प्रदेश के प्रभारी का है कब क्या कह दे फिर पलट जाए आम बात है। भारत की आवाम संवैधानिक संस्थाओं पर आक्रमण करने की इस मानसिकता से सन्न है खफा है। जनता ने कभी किसी को माफ़ नहीं किया है बल्कि सही समय पर साफ़ किया है। इस बार भारत का आवाम ज़ुबान पर लगाम चाहता है। रही काम पर नियंत्रण की बात तो ये तो भोगवादियों के चाटुकार हैं इनके लिए तो ये सोचना भी आसमान के तारे गिनने जैसा होगा। काम पर नियंत्रण की बात तो बिरलों के नसीब में ही होती है।
परवाज साहब की गजल की दो लाइन तथा 'ोर के साथ आज के लेख की बात यहीं समाप्त।
आएगा लेके बाप दवा-भूख की जरुर
बैठा है इंतज़ार में बच्चा फकीर का
अपने ही ऑंसुओं से भरा जिसको शाम तक
क्यों लोग छीनते हैं, वो कासा फकीर का,
शेर 
मेरे देश  में जो असरदार घर है
अगर सच कहुं तो गुनाहगार घर हैं।
लेखक भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी हैं।
*Disclaimer: The views expressed by the author in this feature are entirely his own and do not necessarily reflect the views of INVC

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