संजय कुमार

स्वतंत्रता के बाद योजना अवधि के दौरान जल संसाधनों के विकास के प्रारंभिक चरण में मुख्य उद्देश्य जल संसाधनों को तेजी से काम में लाना था। तदनुसार, राज्य सरकारों को सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण, जल विद्युत उत्पादन, पेय जल आपूर्ति, औद्योगिक और अन्य विविध इस्तेमाल जैसे विशिष्ट उद्देश्यों के लिए तेजी से जल संसाधन परियोजनाएं बनाने और विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। फलस्वरूप, उसके बाद की पंचवर्षीय योजनाओं में देशभर में  बांधों, बैराजों, जल विद्युत संरचनाओं, नहर नेटवर्क इत्यादि सहित अनेक परियोजनाएं अस्तित्व में आईं।

विशाल भंडारण क्षमताओं का सृजन भारत में जल संसाधन विकास में मील का पत्थर है। इन सृजित भंडारण कार्यों के कारण अब विभिन्न जगहों पर स्थित जल विद्युत औेर थर्मल पावर संयंत्रों के लिए आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कमान क्षेत्र में सुनिश्चित सिंचाई उपलब्ध कराना तथा अन्य विविध इस्तेमाल की ज़रूरतों को पूरा करना संभव हो गया है। बाढ़ की आशंका वाले जिन क्षेत्रों में भंडारण उपलब्ध कराया गया है वहां बाढ़ पर प्रभावी नियंत्रित होगा। इसके अलावा, देश के विभिन्न भागों में वर्ष भर पेय जल की आपूर्ति करना संभव हो गया हैं।

वर्ष 1951 में पहली पंच वर्षीय योजना की शुरूआत के समय, भारत की आबादी करीब 36 करोड़ 10 लाख थी और अनाज का वार्षिक उत्पादन 5 करोड़ 10 लाख टन था, जो पर्याप्त नहीं था। इस कमी को पूरा करने के लिए तब अनाज आयात करना अपरिहार्य था। इसलिए अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने को योजना अवधि में सर्वाधिक महत्व दिया गया और इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए विभिन्न बड़ी, मझोली और छोटी सिंचाई तथा बहुद्देशीय परियोजनाएं बनाई गर्इं। देश भर में अतिरिक्त सिंचाई क्षमता सृजित करने के लिए बाद की पंच वर्षीय योजनाओं में इन परियोजनाओं को कार्यान्वित किया गया। इस अभियान के साथ कृषि क्षेत्र में हरित क्रांति के कारण भारत अनाज की कमी से निजात पाकर मामूली रूप से अतिरिक्त अनाज उत्पादन में समर्थ हुआ। इस प्रकार कुल सिंचित क्षेत्र बिजाई क्षेत्र का 39 प्रतिशत और कुल कृषि क्षेत्र का 30 प्रतिशत हो गया। जैसा कि पहले बताया जा चुका है, बड़ी और मझोली परियोजनाओं की सम्पूर्ण क्षमता का आकलन 5 करोड़ 80 लाख हैक्टेयर लगाया गया है जिसमें से 64 प्रतिशत विकसित होने का अनुमान है।

पन विद्युत शक्ति
भारत में खासतौर पर उत्तरी और पूर्वोत्तर क्षेत्र में पन विद्युत शक्ति उत्पादन की,  असीम संभावना हैं। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के अनुमान के अनुसार,देश में 60 प्रतिशत लोड फैक्टर पर 84,000 मेगावाट का आकलन किया गया है, जो वार्षिक ऊर्जा उत्पादन का करीब 450 अरब यूनिट के बराबर है।

स्वतंत्रता के समय, 1362 मेगावाट की कुल संस्थापन क्षमता में से पन बिजली उत्पादन क्षमता 508 मेगावाट थी। तब से, यह क्षमता बढ़ाकर करीब 13,000 मेगावाट कर दी गई है। इसके अतिरिक्त निर्माणाधीन परियोजनाओं से अतिरिक्त 6,000 मेगावाट उपलब्ध है। मंजूर हो चुकी परियोजनाओं से करीब 3,00 मेगावाट क्षमता की अपेक्षा है। इस प्रकार इस्तेमाल में आ रही उपयोगाधीन कुल क्षमता करीब 22,000 मेगावाट है जो अनुमानित कुल ऊर्जा उत्पादन क्षमता का करीब एक चौथाई है।

घरेलू जल आपूर्ति
राष्ट्रीय जल नीति में सिंचाई, पन-बिजली, नौवहन और औद्योगिक तथा अन्य इस्तेमाल के बाद पेय जल आपूर्ति को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। बाद की पंच वर्षीय योजनाओं तथा बीच-बीच में वार्षिक योजनाओं में, जल आपूर्ति और स्वास्थ्य प्रणाली को तेजी से विकसित करने के प्रयास किए गए हैं। ”अंतर्राष्ट्रीय पेय जल आपूर्ति और सफाई दशक” के संदर्भ में, भारत सरकार ने दशक के आखिर यानी मार्च, 1991 तक शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में आबादी को 100 प्रतिशत जल आपूर्ति सुविधा उपलब्ध कराने, शहरी क्षेत्रों में 80 प्रतिशत सफाई सुविधाएं तथा ग्रामीण क्षेत्रों में 25 प्रतिशत सफाई सुविधाएं उपलब्ध कराने के मद्देनजर अप्रैल, 1981 में दशक कार्यक्रम शुरू किए।

हालांकि, वित्तीय और अन्य बाधाओं के कारण दशक के लिए तय किए गए मूल लक्ष्यों में कटौती करके इसे शहरी जल आपूर्ति के मामले में 90 प्रतिशत, ग्रामीण जल आपूर्ति के मामले में 85 प्रतिशत, शहरी स्वास्थ्य के मामले में 50 प्रतिशत और ग्रामीण स्वास्थ्य के मामले में 5 प्रतिशत कर दिया गया। इस नीति के अनुसार पेय जल के लिए स्वीकृत प्रावधान सभी जल संसाधन परियोजनाओं में लागू किए जाने हैं। भारत में ज्यादातर बड़े शहरों#शहरों की पेय जल की ज़रूरत नजदीकी क्षेत्रों में  मौजूद सिंचाई बहुद्देशीय स्कीमों के जलाशयों से और लम्बी दूरी के अंतरण के जरिए भी पूरी की जाती हैं। दिल्ली का टिहरी बांध से और चेन्नई का तेलुगू गंगा परियोजना के जरिए कृष्णा के जल से पेय जल प्राप्त करना कुछ विशिष्ट उदाहरण हैं।

नौवहन 
देश में अन्दरूनी जल मार्ग की नौवहन योग्य कुल लम्बाई 15,783 किमी है जिसमें से अधिकतम खंड उत्तर प्रदेश में आता है। उसके बाद पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, असम, केरल और बिहार का नंबर आता है। नदी प्रणालियों में गंगा में सबसे अधिक नौवहन योग्य लम्बाई है। उसके बाद गोदावरी, ब्रह्मपुत्र और पश्चिम बंगाल की नदियां आती हैं। जलमार्ग देश के भीतरी स्थानों तक पहुंचने में विशेष रूप से फायदेमंद होते हैं। इसके अलावा, वे परिवहन लिए के सस्ता माध्यम उपलब्ध कराते हैं जो प्रदूषण मुक्त होते हैं और उनमें संचार संबंधी बाधाएं भी नहीं होतीं। जलमार्ग यातायात संचालन 1980-81 में 1 लाख 10 हजार टन था जो 1994-95 में बढ़कर 3 लाख 30 हजार टन हो गया।

ऊर्जा संरक्षण के लिहाज से भी देश के भीतर जल परिवहन का विकास बहुत महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय जलमार्गों के रूप में – गंगा-भगीरथी-हुगली, ब्रह्मपुत्र, मांडवी ज़ुआरी नदी और गोवा में कुम्बारजुआ नहर, महानदी, गोदावरी, नर्मदा, सुन्दरबन क्षेत्र, कृष्णा, तापी और पश्चिम तट नहर नामक दस जलमार्गों की पहचान की गई है।

गंगा-भगीरथ-हुगली और ब्रह्मपुत्र को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया जा चुका है। फरक्का नौवहन लॉक परिवहन के लिए खोला जा चुका है इस प्रकार कोलकाता के साथ गंगा की ऊपरी धारा में परिवहन की मंजूरी मिल गई है। राष्ट्रीय जलमार्गों के नेटवर्क के साथ 10 नदी प्रणालियों के इस क्षेत्र में नौका के जरिए यात्रियों को लाने ले जाने और माल ढुलाई प्रति वर्ष 3 करोड़ 50 लाख टन होने की संभावना है। नौवहन के लिए अधिक जल का इस्तेमाल नहीं होता है क्योंकि सिर्फ टर्मिनल भंडारण परियोजनाओं के बिंदु पर ही जल की बर्बादी होती है।

औद्योगिक इस्तेमाल
पानी की पर्याप्त उपलब्धता औद्योगिक विकास की बुनियादी जरूरत है। दूसरे सिंचाई आयोग ने 1972 में अपनी रिपोर्ट  में देश में औद्योगिक उद्देश्यों के लिए कुल मिलाकर 50 अरब घन मीटर (बी. सीयू. एम) पानी के प्रावधान की सिफारिश की है। हालांकि, हाल ही में किए गए आकलन से इंगित होता है कि 2000 AD के दौरान औद्योगिक इस्तेमाल के लिए करीब 30 अरब घन मीटर पानी की जरूरत होगी जबकि 2025 तक यह बढ़कर 120 अरब घन मीटर हो जाएगी।

देश के अंदर मत्स्य पालन
 जल संसाधन विकास कार्य के मुख्य उद्देश्यों के अलावा, अन्य विविध क्षेत्रों में भी विकास हुआ है जिनमें, देश के भीतर मत्स्य उत्पादन के क्षेत्र में विकास का महत्वपूर्ण स्थान है। वर्ष 1950-51 के दौरान, देश के भीतर कुल मत्स्य उत्पादन 2 लाख 20 हजार टन था जो 1994-95 तक बढ़कर 20 लाख 8 हजार टन हो गया। भारत अब मत्स्य उत्पादन करने वालों में दुनिया में सातवें स्थान पर है और देश के भीतर मत्स्य उत्पादन करने वालों में चीन के बाद भारत का स्थान दूसरा है। राज्यों में, पश्चिम बंगाल सबसे बड़ा मत्स्य उत्पादक है जिसके बाद आंध्र प्रदेश और बिहार की बारी आती है। ये तीनों राज्य मिलकर देश के भीतर कुल मत्स्य उत्पादन का करीब 50 प्रतिशत उत्पादन करते हैं जबकि पश्चिम बंगाल अकेला ही कुल उत्पादन का एक तिहाई उत्पादन करता है।

जल विकास और स्वास्थ्य
मानव जीवन के लिए जल बेहद जरूरी है, लेकिन अच्छी तरह व्यवस्था न की जाए तो यह टायफाइड, हैजा, दस्त, मलेरिया, फ़ाइलेरिया, शिस्टोसोमियासिस इत्यादि बीमारियों के वाहक के रूप में मानव स्वास्थ्य के लिए समस्याएं भी पैदा करेगा। तथापि, जल विकास परियोजनाओं ने देश में मानव स्वास्थ्य के विकास में सकारात्मक योगदान दिया है।

मानव स्वास्थ्य के लिए होने वाले फायदों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण है आहार में सुधार, जो रेशेदार आहार का उत्पादन बढ़ने का परिणाम है। फल एवं सब्जियां उगाने के नए अवसर और फार्म से उत्पादित आहार के लिए खरीदने की शक्ति बढ़ी है। मत्स्यपालन के विकास और घरेलू पशुधन के लिए चारे-पानी की बेहतर सुविधाओं के कारण अन्य पौष्णिक सुधार हुए हैं जिससे आहार और आय में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है। जल विकास परियोजनाओं के विकास ने देश को न केवल बाढ़ और सूखे से छुटकारा पाने में समर्थ बनाया है बल्कि तेजी से बढ़ती आबादी के लिए पर्याप्त भोजन और रेशे भी उपलब्ध कराएं हैं।
 
देश के ज्यादातर भाग अब जल की कमी का सामना कर रहे हैं इसके मद्देनजर जल विकास परियोजनाओं ने मानव उपभोग के लिए सुरक्षित जल उपलब्ध कराने की सुविधा उपलब्ध कराई है।

देश में कार्यान्वित प्राय: सभी परियोजनाएं घरेलू उद्देश्यों के लिए पानी उपलब्ध कराती हैं यद्यपि ऐसा करना प्राथमिक रूप से कुछ परियोजनाओं का उद्देश्य नहीं था। करीब 80 से 90 प्रतिशत वर्षा सिर्फ मानसून के दौरान ही होती है, इसलिए घरेलू इस्तेमाल के लिए पानी को जमा करना अत्यावश्यक हो गया है। आबादी वाले इलाकों को बेहतर जल निकासी और अच्छी सफाई के जरिए साफ एवं स्वच्छ रखने में जल आपूर्ति से भी मदद मिली है। इस प्रकार जल आपूर्ति ने स्वास्थ्य सुधार में योगदान दिया है।

(लेखक भारत सरकार में अधिकारी हैं)

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