pop{ तनवीर जाफरी ** }
भारत सरकार द्वारा जारी किया गया ‘छोटा परिवार-सुखी परिवार’ का नारा जनसंख्या नियंत्रण के पक्ष में मात्र एक नारा ही नहीं बल्कि वास्तविकता भी है। इसमें कोई संदेह नहीं कि अधिक बच्चे किसी भी परिवार में न सि$र्फ सम्पत्ति के विभाजन का कारण बनते हैं बल्कि इनके पालन पोषण, शिक्षा दीक्षा, स्वास्थ्य तथा जीवन यापन हेतु सब कुछ एक अलग परिवार की भांति मुहैया करना अथवा बच्चों को इस योग्य बनाना कि वे आत्मनिर्भर होकर अपना जीवन यापन करें, यह सभी माता-पिता का नैतिक कर्तव्य भी होता है। परन्तु भारत जैसे विशाल देश की अधिकांशतय: $गरीब व निम्र मध्यम वर्ग की आबादी अपने इस दायित्व को पूरा कर पाने में स्वयं को असमर्थ पाती है। तीन चार दशक पूर्व तक जनसंख्या में तेज़ी से वृद्धि दर्ज की गई। परन्तु अब धीरे-धीरे भारतीय जनमानस में इस विषय को लेकर जागृति आने लगी है। अब लगभग प्रत्येक भारतीय चाहे वह किसी भी धर्म या सम्प्रदाय का क्यों न हो, यह महसूस करने लगा है कि अधिक जनसंख्या किसी भी $कीमत पर लाभकारी नहीं है बल्कि यह समाज व देश के लिए घातक है। आज हर $खासोआम इस बात को भली-भांति समझ चुका है कि यदि उसे अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा देनी है, उसके भोजन, कपड़े, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा अन्य जीवन संबंधी $जरूरी $खर्चों की उचित व्यवस्था करनी है तो उसे जनसंख्या वृद्घि पर नियंत्रण रखने के प्रति गंभीर होना पड़ेगा।
मंहगाई को लेकर आज पूरे विश्व में हाहाकार मची हुई है। अच्छे $खासे मेहनमकश परिवार के लिए दो वक़्त की रोटी जुटा पाना एक चुनौती के समान हो गया है। दैनिक उपभोग की वस्तुएं विशेषकर खाद्य सामग्री के भाव पूरी दुनिया में आसमान छू रहे हैं। इस बढ़ती हुई मंहगाई की वजह से अनेक  परिवारों ने अपने खान-पान व रहन-सहन में बदलाव लाना शुरु कर दिया है। जिन परिवारों में एक समय के भोजन में दो तीन तरह की सब्$िजयां बना करती थीं, वहां अब एक ही प्रकार की सब्$जी बनाकर काम चलाया जा रहा है। तीन रोटियों से पेट भरने वाले अनेकों परिवार अब मात्र 2 रोटी से अपना पेट भरने की आदत डाल रहे हैं। इस बढ़ती हुई मंहगाई की भी सबसे अधिक मार वही परिवार झेल रहा है जिसके पास आय के साधन तो अत्यन्त सीमित हैं परन्तु बच्चों की संख्या अधिक है। $जाहिर है ऐसे हालात में $गरीब व अधिक बच्चे वाले परिवारों के बेहतर भविष्य की कल्पना कैसे की जा सकती है?
उपरोक्त वास्तविकताओं के बावजूद कुछ साम्प्रदायिक एवं कट्टïरपंथी शक्तियां ऐसी भी हैं जो $गरीबी, अशिक्षा तथा जनसंख्या वृद्घि को सत्ता हासिल करने के एक कारगर हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहती हैं। जनसंख्या वृद्घि के मामले में सबसे बदनाम समुदाय मुस्लिम समाज को माना जाता है। इसका मुख्य कारण इस्लाम धर्म में पुरुष द्वारा एक से अधिक शादियां करने की छूट को माना जाता रहा है। कालान्तर में मुस्लिम जनसंख्या में विश्वस्तर पर हुई वृद्घि का एक कारण यह भी हो सकता है परन्तु आमतौर पर अशिक्षित मुस्लिम परिवार में ही अधिसंख्य बच्चों की संख्या देखने को मिलेगी। आम मुसलमान अपने प्रत्येक नवजात बच्चे को ‘अल्लाह की देन’ जैसे प्रचलित मुहावरे की आड़ में स्वीकार कर लिया करता था। परन्तु अब समय बदलने लगा है। बदलते समय के साथ-साथ इन्सानों की सोच में भी भारी बदलाव आने लगा है। अब आम मुसलमान यह महसूस करने लगा है कि उसका नवजात शिशु बेशक ‘अल्लाह की देन’ क्यों न हो परन्तु चूंकि उस नवजात बच्चे के जन्म का माध्यम अल्लाह ने ही स्वयं उसके माता-पिता को बनाया है, अत: उस शिशु के जीवन यापन का $िजम्मा भी उन्हीं माता-पिता का है। केवल मुसलमान ही नहीं बल्कि प्रत्येक समुदायों के अशिक्षित परिवारों में बच्चों की एक लम्बी $फौज देखी जा सकती है। अल्लाह अपनी रहमत स्वरूप बच्चे तो दे देता है परंतु उसका पालन-पोषण तो बहरहाल मां-बाप को ही करना है।
एशियाई देशों सहित दुनिया के कई हिस्सों में जनसंख्या नियंत्रण हेतु सरकार द्वारा अनेकों विशेष कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। कई देशों की सरकारों ने तो जनसंख्या नियंत्रण हेतु विशेष मंत्रालय गठित किए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ऐसे कार्यक्रमों को प्रोत्साहन देता है तथा उसके लिए विशेष धन मुहैया कराता है। परन्तु ठीक उसके विपरीत कई कट्टïरपंथी सम्प्रदायवादी संगठन ऐसे भी हैं जो जनसंख्या नियंत्रण जैसे लोकहित के कार्यक्रमों का विरोध कर रहे हैं। यह शक्तियां अपने समुदाय के धर्मान्ध अनुयाईयों को अधिक से अधिक बच्चे पैदा करने की सलाह दे रही हैं।
हमारे देश में कट्टïरपंथी हिन्दुत्ववादी संगठनों के कुछ $िजम्मेदार नेताओं द्वारा भारत में हिन्दू सम्प्रदाय के मध्य यह दुष्प्रचार किया जा रहा है कि भविष्य में भारत में मुसलमानों की बढ़ती जनसंख्या के चलते मुसलमान बहुसंख्या में हो जाएंगे तथा हिन्दु समुदाय अल्पसंख्यक हो जाएगा। यह नेता हिन्दू समुदाय के भोले-भाले, अशिक्षित व धर्मान्ध व्यक्तियों का आह्वïान कर रहे हैं कि वे अधिक से अधिक बच्चे पैदा करें ताकि हिन्दू समुदाय स्वयं को बहुसंख्यक के रूप में $कायम रख सके। नि:संदेह उनका यह आह्वïान मह$ज दुष्प्रचार पर आधारित है। भारत का अशिक्षित समाज चाहे वह किसी भी समुदाय का क्यों न हो, आमतौर पर उन्हीं अशिक्षित परिवारों में अधिक बच्चों की $फौज देखने को मिलेगी। मुस्लिम समुदाय में एक से अधिक शादियां करने जैसे व्यवहारिक दौर भी अब नहीं रहा। आज का नवयुवक एक ही शादी तथा शादी के उपरान्त बढऩे वाले आर्थिक $खर्चों को लेकर चिंतित दिखाई देता है। ऐसे में दो शादी करने का प्रश्र ही पैदा नहीं होता। परन्तु केवल धार्मिक दुर्भावना फैलाने हेतु यह बातें मात्र इस म$कसद के मद्देन$जर की जाती हैं ताकि संख्या वाले लोकतंत्र के खेल में बहुसंख्या के आधार पर सत्ता हासिल की जा सके।
कुछ वर्ष पूर्व भारत के केरल राज्य के रोमन कैथोलिक चर्च की ओर से इसी प्रकार का आह्वïान किया गया था। चर्च की ओर से कहा गया था कि- ‘ऐसा देखा जा रहा है कि $गरीब व्यक्ति आर्थिक परेशानियों के चलते अधिक बच्चे पैदा नहीं करते। परन्तु यदि $गरीब लोग अधिक बच्चे पैदा करेंगे तो रोमन कैथोलिक चर्च उनकी आर्थिक सहायता करेगा।’ चर्च ने जनसंख्या वृद्घि हेतु चलाए जाने वाले इस घातक कार्यक्रम हेतु बा$कायदा एक अलग विभाग भी गठित किया है। चर्च के अनुसार यह विभाग अधिक से अधिक बच्चे पैदा करने पर $गरीबों की सहायता तो करेगा ही साथ-साथ $गरीब परिवारों को अधिक से अधिक बच्चे पैदा करने हेतु प्रोत्साहित भी करेगा। यहां यह बात $गौरतलब है कि किसी भी समुदाय द्वारा जब भी जनसंख्या वृद्घि हेतु किसी भी समुदाय के परिवार को प्रोत्साहित किया जाता है तो इसमें प्रोत्साहन देने वाले तथाकथित धर्मगुरुओं अथवा साम्प्रदायिक संगठनों से जुड़े नेताओं द्वारा उन्हें सीधे तौर पर धर्म का ही वास्ता दिया जाता है। और जहां बात धर्म की आ जाए वहां स्वर्ग अथवा जन्नत जैसी परिकल्पनाएं अपने आप ही प्रकट हो जाती हैं। और यही धार्मिक भावनाएं जागृत करना इन साम्प्रदायिक संगठन चलाने वाले नेताओं का मुख्य उद्देश्य है।
आज भारत सहित दुनिया के अधिकांश देशों की सरकारें जनसंख्या नियंत्रण हेतु वृहद् पैमाने पर बड़े से बड़े $खर्चीले कार्यक्रम चला रही हैं, फिर सरकार की इन नीतियों का विरोध करने का अधिकार आ$िखर इन्हें किसने और क्योंकर दे दिया है। साम्प्रदायिकतावादी शक्तियां जोकि वास्तव में लोकतंत्र विरोधी होती हैं परन्तु यह ता$कतें अपनी तानाशाही सोच को तरह-तरह के धार्मिक व सामाजिक संगठनों के माध्यम से अपने धर्मान्ध अनुयाईयों पर थोपकर बहुमत का $खतरनाक खेल खेलना चाहती हैं। इस कार्य हेतु इन शक्तियों ने लोकतांत्रिक प्रणाली में विश्वास दिखाने वाले राजनैतिक दलों से भी समन्वय बना रखा है। यह साम्प्रदायिक शक्तियां चुनावों के समय स्वयं को बेन$काब करती हैं तथा अपने विचारों की पैरवी करने वाले राजनैतिक संगठन के पक्ष में मतदान कराने हेतु मतदाताओं को साम्प्रदायिक आधार पर प्रेरित भी करती हैं। ऐसे में $जरूरी है कि बच्चा पैदा करने जैसे अति व्यक्तिगत् मामलों को संबंधित परिवारों के विवेक पर ही निर्भर रहने दिया जाए। सत्ता को निशाना बनाते हुए $गरीब परिवारों के साथ उनकी आर्थिक स्थिति का म$जा$क उड़ाना $कतई अच्छा नहीं है। यदि प्रोत्साहन देना ही है तो किसी व्यक्ति को रो$जगार मुहैया कराने हेतु अथवा किसी बच्चे को शिक्षित बनाने हेतु प्रोत्साहित किया जाना चाहिए तथा उसकी आर्थिक सहायता की जानी चाहिए न कि बच्चे पैदा करने हेतु।  ऐसे आह्वïान करने वालों के विरुद्घ सख़्त कार्रवाई भी की जानी चाहिए क्योंकि ऐसे आह्वïान अनैतिक, घातक, अमानवीय तथा सरकार की जनसंख्या नियंत्रण नीति के विरुद्ध भी हैं।

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Tanveer Jafri**Tanveer Jafri ( columnist),(About the Author) Author Tanveer Jafri, Former Member of Haryana Sahitya Academy (Shasi Parishad),is a writer & columnist based in Haryana, India.He is related with hundreds of most popular daily news papers, magazines & portals in India and abroad. Jafri, Almost writes in the field of communal harmony, world peace, anti communalism, anti terrorism, national integration, national & international politics etc. He is a devoted social activist for world peace, unity, integrity & global brotherhood. Thousands articles of the author have been published in different newspapers, websites & news-portals throughout the world. He is also a recipient of so many awards in the field of Communal Harmony & other social activities.Contact Email : tanveerjafriamb@gmail.com
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*Disclaimer: The views expressed by the author in this feature are entirely his own and do not necessarily reflect the views of INVC.

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