Wednesday, December 11th, 2019

जजों कीई नियुक्ति का नया क़ानून - भारतीय जनतंत्र का काला दिवस

आम नागरिक की रक्षाआई एन वी सी ,
दिल्ली , भारतीय सुराज दल ने मोदी सरकार द्वारा तैयार किया गया नैशनल जुडिशल अपोइन्टमेंट  बिल, २०१४ ध्यान पूर्वक देखा है, जो सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों  की  नियुक्ति के लिए वर्त्तमान कॉलेजियम व्यवस्था को हटा कर एक नयी व्यवस्था बनाने का प्रयास कर रहा है. भासुद ने पाया है कि यह क़ानून निहायत खतरनाक है, और भारतीय जनतंत्र के भविष्य के लिए अच्छा नहीं है. कार्यपालिका द्वारा किये जा रहे अत्याचार, भ्रष्टाचार और  अनाचार के विरुद्ध भारत की जनता के लिए एक ही आशा का द्वार खुला था – भारत की निर्भीक न्यायपालिका का द्वार. यह क़ानून अप्रत्यक्ष रूप से उस द्वार को बंद करने जा रहा है, क्योंकि इस क़ानून के प्रभावी होते ही भारत की न्यायपालिका की निर्भीकता खतरे में पड़ जाएगी. इमरजेंसी के दौरान स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी के पद चिह्नों पर चलते हुए मोदी सरकार दूसरे दलों के साथ मिल कर एक प्रतिबद्ध और कमजोर न्यायपालिका बनाने की ओर बढ़ रही है. यह क़ानून न्यायिक नियुक्ति आयोग में दो ‘सम्मान्य व्यक्तियों’ (‘सम्मान्य न्यायविदों’नहीं) के वेश में दो राजनीतिक सदस्य ला सकता है, जो राजनितिक सदस्यों की संख्या आयोग में तीन कर देगा, क्योंकि क़ानून मंत्री पहले से ही इस आयोग के सदस्य होंगे. क़ानून की धारा ५ (२) यह कहती है कि आयोग के दो सदस्य मिल कर किसी भी व्यक्ति की नियुक्ति के प्रस्ताव को वीटो कर सकते हैं. जाहिर है कि आयोग के तीन में दो ‘सम्मान्य’ राजनीतिक सदस्य कभी भी एक निर्भीक और ईमानदार व्यक्ति के खिलाफ वीटो लगा सकते हैं, जिससे वह एक सुप्रीम कोर्ट का जज या भारत का मुख्य न्यायाधीश बनने से वंचित रह जा सकता है. साधारणतः उच्च न्यायालय का कोई जज सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनाने हेतु या सर्वोच्च न्यायालय का कोई जज भारत का मुख्य न्यायाधीश बनने की दृष्टि से यह नहीं चाहेगा कि वह किसी भी राजनेता के विरुद्ध कोई कठोर निर्णय दे, चाहे वह राजनेता पक्ष का हो या विपक्ष का, क्योंकि आयोग के दो स्वतंत्र ‘सम्मान्य’ व्यक्तियों की नियुक्ति में अब प्रधानमंत्री या प्रतिपक्ष के नेता की प्रत्यक्ष भूमिका होगी. नए क़ानून की धारा ६ भी इतनी ही खतरनाक है, क्योंकि आयोग राज्य के राज्यपाल और मुख्यमंत्री की अनुशंसा ले कर ही किसी को हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने में पहल करेंगे. यह धारा यह सुनिश्चित करेगी कि अब निम्न न्यापालिका के जज जो उच्च न्यायालय में जज के रूप में पदासीन होना चाहते हैं, राज्य के राजनेताओं के विरुद्ध कड़े निर्णय न दें, क्योंकि मुख्यमंत्री या राज्यपाल उन्हें उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बनने से रोक सकते हैं. कहीं इशरत जहां और टू-जी जैसे मामलों में अपराधियों को न्यायपालिका के कहर से बचाने के लिए तो यह सब नहीं किया जा रहा है? आज जब आम नागरिक कार्यपालिका के कदाचार और अनाचार से त्रस्त है, इस क़ानून के प्रभावी होने के बाद उस आम नागरिक की रक्षा करने में अधिकांश माननीय न्यायाधीश शायद कतराने लगेंगे. अर्थात न्यायपालिका को कमजोर और जीहजूरिया बनाने के लिए जमीन तैयार कर ली गयी है. हो सकता है कोलेजियम व्यवस्था सर्वांगपूर्ण या ‘परफेक्ट’ नहीं हो, मगर यह नयी व्यवस्था उससे भी अधिक खराब है. सर में दर्द हो तो सर काट कर तो नहीं फेंक देते; दर्द को ठीक करने की गोली देनी पड़ती है. सरकार को कोलेजियम व्यवस्था को ही सुदृढ़ और पारदर्शी बनाने के लिए क़ानून बनाना चाहिए. दल को आशा है कि हमारे माननीय न्यायाधीश अपनी निर्भीकता नहीं छोड़ते हुए भारत के आम नागरिक की रक्षा करेंगे, मगर अब यह नया क़ानून उनके लिए एक चुनौती जरूर प्रस्तुत करेगा. अगर नया क़ानून पास हो गया तो भारतीय सुराज दल उस दिन को काला दिवस के रूप में मनायेगा.

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