kedar kashyap invc newsआई एन वी सी न्यूज़
दिल्ली,
छत्तीसगढ के स्कूल शिक्षा मंत्री श्री केदार कश्यप ने कहा है कि हर राज्य की अपनी अलग परिस्थिति व चुनौतियां है। नई शिक्षा नीति में पाठ्यक्रम निर्धारण के समय राज्यों की आवश्यकताओं को पर्याप्त स्थान दिया जाना चाहिए। वे आज नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित नई शिक्षा नीति पर राज्यों के साथ परामर्श बैठक में बोल रहे थे। उन्होंने स्कूली शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण बनाये जाने की दिशा में महत्वपूर्ण सुझाव दिये। उन्होंने कहा कि, छत्तीसगढ के दूरस्थ आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में बालिका शिक्षा के साथ-साथ अनुसूचित जाति व जनजाति के बच्चों को शिक्षा की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए इन क्षेत्रों में आवासीय विद्यालयों की स्थापना काफी कारगर सिद्ध होगी। बैठक में केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री श्रीमति स्मृति ईरानी व राज्यों से आये शिक्षा मंत्री भी उपस्थित थे।

श्री कश्यप ने कहा कि, आरंभिक शिक्षा में बच्चों की सीखने की प्रक्रिया जितनी रूचिकर सुगम एवं व्यावहारिक होगी, बच्चों का उपलब्धि स्तर उतना ही उत्तम होगा। उन्होंने आरंभिक शिक्षा पर सुझाव देते हुए कहा कि, बच्चों के आयु अनुरूप प्रत्येक विषय के सूचकांक बनाये जाये और उस आधार पर लक्ष्यों को प्राप्त किया जाये। उन्होंने कहा कि, छत्तीसगढ जैसे आदिवासी बाहुल्य , वनांचल क्षेत्रों में माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक शिक्षा के नामांकन, ठहराव एवं शाला त्यागने को रोकने हेतु माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक शिक्षा को पूर्णत निःशुल्क करते हुए कौशल आधारित व रोजगार उन्मुख शिक्षा को बढ़ावा दिया जाना जरूरी होगा। साथ ही शिक्षा को उनके पहुंच की बनानी होगी। जिसमें उन्हें विषय के चुनाव की स्वतंत्रता हो। स्कूल शिक्षा प्रणाली सुधार पर उन्होंने कहा कि वर्तमान में शिक्षा परीक्षा केन्द्रित हो गई है। परीक्षा पास करना शिक्षा का लक्ष्य नहीं हो सकता। शिक्षा, ज्ञानार्जन, सीखना, जीवन मूल्यों का विकास , कौशलों के विकास व उनका मूल्याकंन/आकंलन भययुक्त एवं सहज पद्धतियों से हो। उन्होंनेे कहा कि, वार्षिक परीक्षा के स्थान पर सेमेस्टर में मूल्याकंन उचित होगा।
श्री कश्यप ने शिक्षकों के शिक्षा को भी और अधिक सुदृढ़ किये जाने की आवश्यकता बताई। ग्रामीण क्षेत्रों में साक्षारता विकास के लिए ग्रामीणों , माहिलाओं विशेषकर अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों के लिए केवल साक्षरता बढ़ाये जाने के स्थान पर उनके लिए सम्पूर्ण शिक्षा नीति बनाये जाने को आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि सूचना, संचार प्रौद्योगिकी विषय को प्रारंभ से ही स्कूली शिक्षा में जोड़ देना चाहिए। साथ ही विज्ञान, गणित, अंग्रेजी अध्ययन-अध्यापन को प्रोत्साहित करने हेतु योजनाएं बनानी होगी। मूल्य, शारिरिक शिक्षा, कला एवं हस्तकला, जीवन कौशलों का विकास आरंभिक शिक्षा से ही पाठ्यक्रम का अंग हो, इसके लिए विशेष व्यवस्था भी करनी होगी। विद्यालयों के मानक निर्धारण के संम्बध में उन्होंने कहा कि, विद्यालय अपने मानक, शिक्षा का अधिकार कानून के परिप्रेक्ष्य में स्वयं तैयार करें एवं उन मानकों को प्राप्त करने हेतु स्थानीय स्तर पर ही योजना बनाकर कार्य करें। विद्यालय प्रबंधन का आंकलन इस पर निर्भर हो कि वह बच्चों को सीखने का कितना अच्छा वातावरण प्रदान कर सकता है। भाषाओं के विकास पर उन्होंने कहा कि, बच्चे की आंरभिक शिक्षा उसकी मातृभाषा या समझ की भाषा में ही होना चाहिए। साथ ही स्थानीय बोली भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने के लिए स्थानीय बोलियों में भी पाठ्यक्रमों को तैयार कर शिक्षकों को भी इस दिशा में ठोस प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

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