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Friday, January 22nd, 2021

'चाणक्य' का सन्यास, राहुल का राज !

प्रकाश नारायण सिंह**,,

राजनीति के 'चाणक्य', यूपीए सरकार के संकटमोचन और राहुल गांधी की प्रधानमंत्री बनने की राह में रोड़े, प्रणब दादा रायसीना हिल्स पहुंच गए। 'चाणक्य' ने उचित समय पर चली चतुर चाल और राष्ट्रपति पद झोली में आ गया। संगमा को समर्थन देकर विपक्ष ने दादा पर बहुत भरोसा किया है। इधर कांग्रेस अब युवराज के तिलक की तैयारी में जुट गई है। अब देखना ये है कि दादा किसका साथ कहां तक देते हैं।

प्रणब मुखर्जी की उम्मीदवारी से पहले ही राहुल को पीएम बनाने की स्क्रिप्ट तैयार हो चुकी थी। इसके तहत ही सलमान खुर्शीद, दिग्विजय सिंह जैसे कई कांग्रेसी नेता राहुल गांधी द्वारा बड़ी जिम्मेदारी उठाने का डॉयलॉग डिलीवरी करने लगे थे। पार्टी का हर नेता युवराज की बांसुरी पर ताता थैया करने को लालायित दिखने लगा। कांग्रेसी रणनीतिकार दादा को रायसीना हिल्स पहुंचाने से ज्यादा राहुल गांधी को 7, रेसकोर्स पहुंचाने के लिए मुलायम और जेडीयू को मैनेज करने में जुटे थे। इनको पता है कि यूपीए-2 की हालत खस्ती है। राहुल गांधी के नेतृत्व में यूपीए-3 बनाने के लिए राज्य के मजबूत दलों को अपने पाले में लाना जरूरी है। इसीलिए मुलायम को करोड़ो का पैकेज देकर मैनेज किया गया तो जेडीयू को भरोसे का पैकेज थमाया गया है। सच ही कहा गया है कि घर फूटे तो गंवार लुटे। विपक्ष की फूट का फायदा कांग्रेस लगातार उठाती जा रही है। अभी तक इसमें सफल भी होती दिख रही है। एनडीए को मजबूत रखने की जिम्मेदारी सबसे बड़े घटक दल भाजपा की है। भाजपा के तार हर वक्त झनझनाते ही रहते हैं। दिल्ली में दल का दिल लगता ही नहीं है। जब देखो, हर फैसले के लिए नागपुर के नाक में दम किए रहते हैं। दिल्ली के भाजपा के नेताओं को आपस में लड़ने से फुर्सत ही कहां है कि सत्ता पर हमलावर हों। रही सही कसर क्षेत्र के क्षत्रपों ने निकाल दिया है। नितिन गडकरी के अध्यक्ष बनने से पहले कुछ सालों तक भाजपा और संघ के बीच बाद-विवाद होता रहा। गडकरी के अध्यक्ष बनने के बाद राज्य के क्षत्रप अपनी-अपनी राग अलापते रहते हैं। भाजपा केंद्रीय नेताओं को अपने आगे झुका देना इनकी फितरत हो चुकी है। राजस्थान में वसुंधरा राजे ने गुलाब चंद कटारिया की जागरण यात्रा को रोकवा दी तो गुजरात में नरेंद्र मोदी ने संजय जोशी को बाहर का रास्ता नपवा दिया। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने उमा भारती को मध्यप्रदेश वापसी का मौका नहीं दे रहे हैं। कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी के भीतर सबसे कद्दावर नेता बी एस येदियुरप्पा तमाम घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद तभी अपने पद से अपनी शर्तों पर अपने मनचाहे प्रत्याशी सदानंद गौड़ा को मुख्यमंत्री बनवा कर हटे। केंद्रीय नेतृत्व हर मुद्दे पर कमजोर दिखा। जब भाजपा अपना घर नहीं संभाल सकती है तो घटक दल अपना-अपना ढ़ोलक बजाएंगे। मजबूत विपक्ष की भूमिका अन्ना हजारे और बाबा रामदेव लोग जैसे निभा रहे हैं। आम लोगों की नजर में भी सरकार की विरोध का नेतृत्व अब इन्हीं लोगों के हाथों में दिख रहा है। अब सवाल विपक्ष के सामने है कि क्या सरकार के गिरती साख का फायदा वह उठाना चाहता है? सत्ता वापसी के लिए उसकी क्या रणनीति है। राहुल गांधी को आगे करके अपने नेता का ऐलान कर देगी लेकिन भाजपा कब आपसी खींचतान से बाहर निकलकर अपने नेता का ऐलान करेगी? जब विपक्ष पस्त हो तो ऐसे उचित मौके पर ही कांग्रेस के रणनीतिकार राहुल गांधी को लॉन्च करना चाहते हैं। युवाओं की अहम भागीदारी से यूपी में अखिलेश यादव ने डंका बजा दिया। अन्ना हजारे के साथ युवाओं की भागीदारी ने भी राहुल गांधी का रास्ता साफ कर दिया है। कांग्रेस अब राहुल गांधी को युवा चेहरा पेश करते हुए युवाओं को रिझाएगी। कांग्रेस के इतिहास पर नजर डालें तो गलतियों का ठीकरा गैर गांधी परिवार पर फोड़ने की परंपरा है। इसी परंपरा के तहत मनमोहन सिंह की बलि चढ़ाई जाएगी। मंहगांई, भ्रष्टाचार का ठीकरा पीएम पर फोड़ते हुए राहुल गांधी को भविष्य के पीएम के रूप में पेश किया जाएगा। विकीलीक्स के मुताबिक अक्टूबर, 2006 में गांधी परिवार के करीबी राशिद अल्वी ने कहा था, 'भले ही राहुल गांधी की पब्लिक अपील न हो और वे राजनैतिक तौर पर नौसिखिए हों लेकिन सोनिया गांधी उन्हें प्रधानमंत्री जरूर बनाएंगी।'

यदि हम इतिहास पर नजर डालें तो इंदिरा गांधी भी पहले मंत्री बनी फिर प्रधानमंत्री। राहुल गांधी के पास ऐसा कोई तजुर्बा नहीं है। विपक्ष इसे हथियार के रूप में प्रस्तुत कर सकता है। सरकार और पार्टी पर दिवालियापन इस कदर हावी है कि वह अपनी ही सरकार के चुनाव जिताऊ कार्यों तक का ठीक से प्रचार नहीं कर पाती, लोगों का भरोसा नहीं जीत पाती। दरअसल, कांग्रेस का असल संकट नेतृत्व का है। उसे एक नए ऊर्जावान नेता की जरूरत है। जो पार्टी और सरकार को नए आईने में उतार सके। कार्यकर्ताओं में जोश भर सके। आम जनता से 'कनेक्ट' स्थापित करे। यह भरोसा दे सके कि देश सुरक्षित हाथों में है। उसे राजनीतिक मैनेजर नहीं, लीडर चाहिए। क्या राहुल गांधी इस शून्य को भर पाएंगे?

*Disclaimer: The views expressed by the author in this article are his own and do not necessarily reflect the views of  INVC.

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