Monday, April 6th, 2020

गांधी बनाम गोडसेः हिंदू बनाम धर्मान्ध हिंदू

- अरुण तिवारी -
 
गांधी बनाम गोडसे यानी हिंदू बनाम धर्मान्धहिंदू। जरा सोचिए, गोडसे भी हिंदू था और गांधी भी हिंदू; पक्का सनातनी हिंदू; रामराज्य का सपना लेने वाला हिंदू; एक ऐसा हिंदू, मृत्यु पूर्व जिसकी जिहृा पर अंतिम शब्द ’राम’ ही था; बावजूद इसके नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी को हिंदूवाद की राह में रोङा माना और हत्या की।
क्यों ?
क्योंकि गांधी का हिंदूवाद सिर्फ किसी एक व्यक्ति, जाति, संप्रदाय, वर्ग या राष्ट्र विशेष से नहीं, बल्कि ’विश्व का कल्याण हो’ और ’प्राणियों में सद्भावना रहे’ के ऐसे दो नारे से परिभाषित होता था, पूजा-पाठ के बाद जिनका उद्घोष कराना हिंदू पुजारी आज भी कभी नहीं भूलते। गोडसे का राष्ट्रवाद, ऐसा धर्मान्ध और संकीर्ण हिंदूवाद था, जिसमें मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं थी; जबकि गांधी के हिंदू होने का अर्थ, मुसलमानों से घृणा करना नहीं था। जो अपनी जङों को छोङकर नहीं जाना चाहते थे, गांधी उन मुसलमानों को भारत से खदेङे जाने के पक्ष में नहीं थे।
दरअसल, गांधी के हिंदू होने का अर्थ था, सर्वधर्म समभाव् में विश्वास। गांधी के ’रामराज्य’ का मतलब था, एक ऐसा राज्य, जिसमें राजकुमार राम को भीलनी के झूठे बेर खाने में आनंद की अनुभूति हो। ’गांधी जी का जंतर’ याद कीजिए। स्पष्ट होता है कि समाज के सबसे कमज़ोर यानी अंतिम जन का कल्याण’ ही प्रत्येक निर्णय, योजना व कार्यों का सर्वमान्य पैमाना ही गांधी जी के ’रामराज्य’ की आधारशिला थी। दुःखद है कि आज काधर्मान्ध हिंदू राम का मंदिर तो बनाना चाहता है, लेकिन राजा राम के आदर्शों को आगे रखकर अपने कर्मकाण्ड का आकलन करना नहीं चाहता।
यह सच है कि इसी मत भिन्नता ने गोडसे के हाथों, गांधी की हत्या कराई। किंतु सोचने की बात है कि यह कैसा मजहबी अन्धापन है, जो अपने ही मजहबी हाथों से अपने ही मजहब के एक दूसरे अनुयायी की हत्या करा देता है ?  ’तकसीम-ए-हिंद मेरी लाश पर होगा’ -गौर कीजिए कि किसी हिंदूवादी ने यह कहने वाले मौलाना आज़ाद की हत्या नहीं की। इस से यह भीसमझ लेना चाहिए कि हिंदू धर्मान्धों की सिर्फ जुबां पर इसलाम विरोध है, निशाना कहीं और है।
गांधी-गोडसे के इस दुःखद प्रसंग को सामने रखकर यह भी समझजा सकता है कि भारत के कुछ कट्टरपंथी संगठन, यदा-कदा भारत को जिस हिंदू राष्ट्र को बनाने का सपना दिखाते रहते हैं, वह कैसा होगा। इसका अनुमानआप गत् वर्षकुछ धर्मान्धों द्वारा बुलन्दशहर में गोवंश अवशेषों की आड़ में की गई एक पुलिस इन्सपेक्टर सुबोध की हत्या से भी लगा सकते हैं।
कहा गया कि इन्सपेक्टर सुबोध की हत्या इसलिए की गई, चूंकि वह अखलाक मामले की निष्पक्ष जांच कर रहे थे। क्या हम उसे महज् एक दुर्घटना कहकर मुंह फेर सकते हैं अथवा विचार करने की ज़रूरत है कि हम कैसा भारत बनाने की ओर बढ़ रहे हैं ? क्या आज हम एक ऐसा भारत नहीं है, जिसके युवा एक ओर तो आधुनिकतम सूचना प्रौद्योगिकी के कपाट खोलकर उसमें पूरी दुनिया को अपने से जोड़ लेने को बेताब है, दूसरी तरफ कुछेक खुदगर्जों की तंगदिली का आलम यह है कि वे गैर मजहबी की खिलाफत के जुनून में अपने मजहब के अनुयायी को भी बर्दाश्त नहीं करना चाहते ?
ऐसी हिंदू धर्मान्धता के जातीय कनेक्शन और धुव्रीकरण के अनुभवों के आइने में आज देखें, तो कभी पटेल आंदोलन, गुर्जर आंदोलन, मराठा आरक्षण, सांई प्रकरण, और कभी मुसलिम कौम को आतंकी ठहराने अथवा कभी कश्मीर में पाकिस्तान समर्थक नारों को हवा देते रहने का मकसद अंततः हिंदू वोटों का धुव्रीकरण ही है। यह बात और है कि कालांतर में ये सभी हवायें मिलकर, खुद खोदी खाई में गिरने का एक कारण बन जाने वाली हैं।
ऐसा न हो, इसलिए जरूरी है कि हम अगङे-पिछङे के भेद से बाहर निकलें। इसके बगैर, मजहबी धर्मान्धता से निजात फिलहाल नामुमकिन लगती है। बीते चुनाव के दौरान कट्टरता परओवैसी-योगी की जुगलबंदी और कट्टर हिंदूवादी योगी जी द्वारा हनुमान जी को दलित बताने पर भीम सेना प्रमुख द्वारा दलितों से यह आह्वान करना कि वे सभी हनुमान मंदिरों पर कब्जा कर लें; इन प्रकरणों के संदेश क्या हंै ? जरा सोचिए।
हालंकि यह सच है कि विकास की सीढ़ी चढ़कर भारत को दुनिया की बङी आर्थिक ताक़त बना देने को बेताब युवा वर्ग, ख्ुाली आंखों वालों के अन्धेपन से निजात पाना चाहता है; हिंदू-मुसलिम जैसी मजहबी धर्मान्धता से भी और जातीय अन्धेपन से भी। किंतु आज अगङी व अनारक्षित कही जाने वाली जातियों में न सिर्फ राजनैतिक अस्तित्व को लेकर जिस कदर बेचैनी है; वे जातीय सम्मान, रोजगार गांरटी और आर्थिक सुरक्षा को लेकर भी जिस असुरक्षा के भाव से गुजर रही हैं; दूसरी ओर, आरक्षण ने पिछङे, दलित और आरक्षण प्राप्त अल्पसंख्यकों को जिस तरह एकजुट कर दिया है; लगता नहीं कि कट्टरता से निजात मिलेगी। स्पष्ट है कि विकास और जाति के साथ धर्म की राजनीति के काॅकटेल का प्रयोग अभी जारी रहने वाला है।

ऐसे हालात में क्या हमें कश्मीर के बीते पंचायती चुनावों में एक मुसलिम बहुल गांव द्वारा एक हिंदू को प्रधान बना दिए जाने के सद्भाव से सबक लेने की ज़रूरत नहीं है ? क्या हम भूल जाएं कि अयोध्या के मंदिरों मंे फूल बेचने वाली ज्यादातर मालिने मुसलमान हैं और खड़ाऊं बनाने वाले कारीगर भी ? हम कैसे भूल सकते हैं कि अजमेर शरीफ की दरगाह में मन्नत मांगने हिंदू भी जाते हैं और मुसलमान भी।
याद कीजिए, गांव: बिसाहङा, जिला: गौतमबुद्ध नगर, उत्तर प्रदेश। एक पखवाङा पहले गोमांस की आङ में 50 वर्षीय मोहम्मद अखलाक की पीट-पीट कर हत्या। एक पखवाङा बाद ग्रामवासियों द्वारा बुलंद नारा और व्यवहार: रोटी भी एक, बेटी भी एक। गांव से बाहर जाकर बेटी की शादी का आयोजन पर विचार कर रहे हकीम मियां को गांव वालों ने रोका। पूर्ण सुरक्षा और अमन का भरोसा दिया। 11 अक्तूबर, 2017: बालिका दिवस। दिल्ली से 60 किलोमीटर दूर गांव बिसाहङा मंे बेटी के लिए साझी दुआ निकली; हाथ जुटे; शहनाई बजी; खानपान हुआ और साथ ही फिर प्रमाणित हुआ एक सत्य। घटनाक्रम, दो: सच, एक! गांव के एक हिंदू बूढे़ ने टी वी रिपोर्टर से कहा - ’’75 साल की उम्र होगी मेरी। हम में कभी फर्क न हुआ। मुसलमान और हम तो एक संगी रये; दुख मंे, सुख में। जो कोई फर्क होगो, तो तुम मीडिया वारेन या नेतान को होगो; हम तो जैसे पैले थे, वैसे ई अब है और रहिंगे।’’
यह बयान, सिर्फ बिसाहङा का सत्य नहीं है; यह भारत के आम हिंदू और मुसलमां का सच है। यह सच है उस सांस्कृतिक नींव का, जिस पर गांव बने और बसे: ’सह-जीवन और सह-अस्तित्व’; यानी साथ रहना है और एक-दूसरे का अस्तित्व मिटाये बगैर। यह सच इस बात का भी प्रमाण है कि आमजन के लिए धर्म, आस्था का विषय है, धार्मिक-राजतांत्रिक सत्ता के लिए वर्चस्व का, मीडिया के लिए रेटिंग व पूर्वाग्रह का और सत्ता के लिए वोट की बंदरबांट का।
इस सच को समाने रखकर हमें नहीं भूलना चाहिए कि जीवन संकट में हो तो हम बचाने वाले की न जात पूछते हैं और मजहब। आज चंद खुदगर्जों के कारण भारत की भारतीयता का अस्तित्व संकट में है। मेरा मानना है कि ’वसुधैव कुटुंबकम्’ के नारे में बसने वाली भारतीयता को बचाने की दृष्टि से भी और नया भारत बनाने की दृष्टि से भी, हमें न कभी कबीर को भूलना चाहिए और न उस निर्मल रघुबीर को;मर्यादा की पालना के कारण ही जिसे पुरुषों में उत्तम कहा गया। नये भारत की चादर जितनी निराकार, निर्विकार, निर्मल और निश्छल हो, उतनी बेहतर। क्या यह उचित नहीं होगा ?

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परिचय -:
अरुण तिवारी
लेखक ,वरिष्ट पत्रकार व् सामजिक कार्यकर्ता
 
1989 में बतौर प्रशिक्षु पत्रकार दिल्ली प्रेस प्रकाशन में नौकरी के बाद चौथी दुनिया साप्ताहिक, दैनिक जागरण- दिल्ली, समय सूत्रधार पाक्षिक में क्रमशः उपसंपादक, वरिष्ठ उपसंपादक कार्य। जनसत्ता, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, अमर उजाला, नई दुनिया, सहारा समय, चौथी दुनिया, समय सूत्रधार, कुरुक्षेत्र और माया के अतिरिक्त कई सामाजिक पत्रिकाओं में रिपोर्ट लेख, फीचर आदि प्रकाशित।
 
1986 से आकाशवाणी, दिल्ली के युववाणी कार्यक्रम से स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता की शुरुआत। नाटक कलाकार के रूप में मान्य। 1988 से 1995 तक आकाशवाणी के विदेश प्रसारण प्रभाग, विविध भारती एवं राष्ट्रीय प्रसारण सेवा से बतौर हिंदी उद्घोषक एवं प्रस्तोता जुड़ाव। इस दौरान मनभावन, महफिल, इधर-उधर, विविधा, इस सप्ताह, भारतवाणी, भारत दर्शन तथा कई अन्य महत्वपूर्ण ओ बी व फीचर कार्यक्रमों की प्रस्तुति। श्रोता अनुसंधान एकांश हेतु रिकार्डिंग पर आधारित सर्वेक्षण। कालांतर में राष्ट्रीय वार्ता, सामयिकी, उद्योग पत्रिका के अलावा निजी निर्माता द्वारा निर्मित अग्निलहरी जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के जरिए समय-समय पर आकाशवाणी से जुड़ाव।
1991 से 1992 दूरदर्शन, दिल्ली के समाचार प्रसारण प्रभाग में अस्थायी तौर संपादकीय सहायक कार्य। कई महत्वपूर्ण वृतचित्रों हेतु शोध एवं आलेख। 1993 से निजी निर्माताओं व चैनलों हेतु 500 से अधिक कार्यक्रमों में निर्माण/ निर्देशन/ शोध/ आलेख/ संवाद/ रिपोर्टिंग अथवा स्वर। परशेप्शन, यूथ पल्स, एचिवर्स, एक दुनी दो, जन गण मन, यह हुई न बात, स्वयंसिद्धा, परिवर्तन, एक कहानी पत्ता बोले तथा झूठा सच जैसे कई श्रृंखलाबद्ध कार्यक्रम।
 
साक्षरता, महिला सबलता, ग्रामीण विकास, पानी, पर्यावरण, बागवानी, आदिवासी संस्कृति एवं विकास विषय आधारित फिल्मों के अलावा कई राजनैतिक अभियानों हेतु सघन लेखन। 1998 से मीडियामैन सर्विसेज नामक निजी प्रोडक्शन हाउस की स्थापना कर विविध कार्य।
 
संपर्क -: ग्राम- पूरे सीताराम तिवारी, पो. महमदपुर, अमेठी,  जिला- सी एस एम नगर, उत्तर प्रदेश ,  डाक पताः 146, सुंदर ब्लॉक, शकरपुर, दिल्ली- 92 Email:- amethiarun@gmail.com . फोन संपर्क: 09868793799/7376199844
 
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