Sunday, July 5th, 2020

क्या विपक्ष में नेतृत्व का अकाल है?**

प्रकाश नारायण सिंह**,,

कहते हैं कि मजबूत विपक्ष ही सत्ता की हनक पर लगाम कस सकती है। लेकिन यहां आलम यह है कि विपक्ष ही एक-दूसरे की टांग तोड़ने में जुटा हुआ है। कभी राजा को सेनापति धमका रहे हैं तो कभी सहयोगी ही तैश दिखा रहे हैं। इसके बावजूद विपक्ष द्वारा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अक्सर 'कमजोर' होने का तमगा दिया जाता है। मीडिया भी पीएम को यही रसूख और इज्जत बख्शता है। सरकार का क्या हाल है? कैसी चाल है? यह किसी से छुपा नहीं है। लेकिन विपक्ष कौन है? कहां है? क्या कर रहा है?
राष्ट्रपति चुनाव, कन्नौज लोकसभा का उपचुनाव, महंगाई, भ्रष्टाचार, काला धन वापस लाने जैसे सभी मुद्दों पर विपक्ष दिग्भ्रमित दिखा। राष्ट्रपति चुनाव में भी एनडीए गठबंधन की गांठ कमजोर ही दिख रही है। राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष को उम्मीदवार के टोटे पड़ गए। आनन-फानन में चुनाव लड़ने के लिए ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की चिरौरी-विनती की गई, लेकिन इस लड़ाई से कलाम ने खुद को दूर रखा। एक बार फिर उम्मीदवार की खोज-बीन जारी हुई। विपक्ष के पास इस अहम चुनाव को लेकर कोई रणनीति ही नहीं थी। सच कहते हैं कि घर फूटे तो गंवार लूटे। इसी का फायदा उठाते हुए कांग्रेस ने हमलावर रुख अपना लिया है। शिवसेना और जेडीयू गठबंधन की गांठ को ढ़ीली कर रहे हैं। दीदी की दादागिरी को कांग्रेस ने मुलायम से मैनेज कर लिया तो विपक्ष की गांठ को ढ़ीली करने के लिए प्रणब दादा और कांग्रेस के रणनीतिकार लगातार घंटी बजा रहे हैँ। सरकार यहां सफल दिख रही है तो विपक्ष हार मान चुके खिलाड़ी की तरह बर्ताव कर रहा है। एनडीए को मजबूत रखने की जिम्मेदारी सबसे बड़े घटक दल भाजपा की है। लेकिन भाजपा के तार हर वक्त झनझनाते ही रहते हैं। दिल्ली में दल का दिल लगता ही नहीं है। जब देखो, हर फैसले के लिए नागपुर के नाक में दम किए रहते हैं। दिल्ली के भाजपा के नेताओं को आपस में लड़ने से फुर्सत ही कहां है कि सत्ता पर हमलावर हों। रही सही कसर क्षेत्र के क्षत्रपों ने निकाल दिया है। नितिन गडकरी के अध्यक्ष बनने से पहले कुछ सालों तक भाजपा और संघ के बीच बाद-विवाद होता रहा। गडकरी के अध्यक्ष बनने के बाद राज्य के क्षत्रप अपनी-अपनी राग अलापते रहते हैं। भाजपा केंद्रीय नेताओं को अपने आगे झुका देना इनकी फितरत हो चुकी है। राजस्थान में वसुंधरा राजे ने गुलाब चंद कटारिया की जागरण यात्रा को रोकवा दिया। गुजरात में नरेंद्र मोदी ने संजय जोशी को बाहर का रास्ता नपवा दिया। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने उमा भारती को मध्यप्रदेश वापस नहीं आने दिया। कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी के भीतर सबसे कद्दावर नेता बी एस येदियुरप्पा तमाम घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद तभी अपने पद से अपनी शर्तों पर अपने मनचाहे प्रत्याशी सदानंद गौड़ा को मुख्यमंत्री बनवा कर हटे। इसके बावजूद अब एक बार फिर नाराज चल रहे हैं। केंद्रीय नेतृत्व हर मुद्दे पर कमजोर दिखा। जब भाजपा अपना घर नहीं संभाल सकती है तो घटक दल अपना-अपना ढ़ोलक बजाएंगे। ऐसे हालात में विपक्ष और मजबूत विपक्ष के बीच में गहरी खाई बन गई। जिसे कभी अन्ना तो कभी बाबा रामदेव भर रहे हैं। सरकार के खिलाफ आम जन काफी गुस्से में है। लेकिन इन्हें विपक्ष पर भी भरोसा नहीं है। यह बात अपने ब्लॉग में लालकृष्ण आडवाणी ने भी जाहिर की थी। काला धन वापस लाने का मुद्दा लालकृष्ण आडवाणी ने सबसे पहले उठाया, लेकिन सरकार पर दबाव बाबा रामदेव ने बनाया। भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी सरकार को विपक्ष ने नहीं, अन्ना जैसे समाजसेवी ने नाको चने चबवाया। क्या अपने इसी रणनीति के सहारे लोकसभा-2014 का सपना भाजपा देख रही है? दिल्ली पर राज करने का रास्ता उत्तर प्रदेश से जाता है। यह बात कांग्रेस और सपा बखूबी समझरही है। दोनों आपस में नूरा-कुश्ती करते हुए खुद को मजबूत करने की लगातार कोशिश कर रहे हैं। त्रिशंकु लोकसभा में मुलायम अपनी राजनीतिकी रोटी अभी सेंकने की कोशिश में जुट गए हैं। प्रणब दादा की दावेदारी का समर्थन तो फिलहाल यही संकेत दे रहा है। जरूरत अब भाजपा को चिर-निद्रा से जगने के साथ ही साथ संगठन को मजबूत करने की है। इनको आपसी दावेदारी समाप्त कर सामूहिक जिम्मेदारी की तरफ कदम बढ़ाना होगा। वरना, आम जन के सामने तो यही सवाल रहेगा कि क्या विपक्ष में नेतृत्व का अकाल है?
*Disclaimer: The views expressed by the author in this article are his own and do not necessarily reflect the views of  INVC.

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