कौरव कुल परम्परा से आहत देश

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images (1)संजय कुमार आजाद**

‘‘यह जाहिर तौर पर सच बोलने का समय है, पूरा सच, स्पष्ट रूप से और निर्भीक होकर। हमारे देष की जैसी भी स्थिति हो, पर हम ईमानदारी से नहीं डिग सकते। यह महान देष सहेगा जैसे इसने अब तक सहा है, पर यह पुनर्जीवित होगा, फिर समृद्धि को प्राप्त करेगा। मैं सबसे पहले वही कहूँगा जो मेरा दृढ़ विष्वास, एकमात्र चीज जिससे हमें डरना चाहिए वो डर ही है-एक अनाम, अतार्किक, अनुचित आतंक जो बदलाव लाने वाले प्रयासों को पहले से कमजोर कर देता है।’’ वर्षों पूर्व वह विचार फ्रेंकलिन डी. रुजवेल्ट ने व्यक्त किया था और उनका यह भविष्यवाणी भारत के वर्तमान संदर्भ में सटीक बैठता है।

आगामी लोकसभा-2014 का महाभारत का पांचजन्य फँूका जा चुका है और महाभारत के इस लोक संग्राम में सत्ता रूपी कौरवों के क्षत्रपों ने जो विसात बिछाई, वह कौरव कुल परम्परा को भी मात देती नजर आ रही है। हस्तिनापुर की भांति हीं आज इन्द्रप्रस्थ इन कौरव परंपरा से आहत है और अपना उद्धार के लिए तड़प रही है। केन्द्रीय नेतृत्व धृतराष्ट्र से भी दो कदम आगे बढ़कर मानस पुत्रों के अनैतिक कार्यों का गंधारी के साथ समर्थन कर रहे हैं। लोकतंत्र के रक्षा हेतु 2014 का महाभारत में हम आम नागरिक क्या भीष्म पितामह की भांति अपना मान-सम्मान-स्वाभिमान का दलन होने देंगे?

इन परिस्थितियों में फ्रेंकलिन डी. रुजेल्ट का उपरोक्त पंक्तियों पर हमें गहन दृष्टिपात करना चाहिए। आज भारत का लोकतंत्र ‘लोक’ से जुदा है और वंष से जुड़ा है। विभिन्न स्वहित साधक क्षत्रपों से घिरा है जिसमें लोक सम्पत्ति को अपने कब्जे में रख सामन्तवादी परम्परा का शुरुआत कर रखा है। ये क्षेत्रीय क्षत्रपों का कुनवा जिस कुल परम्परा का शुरुआत कर रखा है उससे तो लोकतंत्र शर्मसार है। भारतीय चिंतन दर्षन में ‘सब मिल बांट खाओ’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की महत्ता रही है। जनकवि कबीरदास ने कहा है-‘‘साईं इनता दीजिए, जामे कुटुम्ब समाय, मैं भी भूखा ना रहूँ साधु ना भूखा जाय।’’ इसी धरती पर शासन करने वाले सम्राट अपनी सारी सम्पत्ति प्रजा हित के लिए लगा देते थे। वैसे महान कुल परम्परा का परित्याग कर जिस भोग विलास की शैली का वरण किया इन क्षत्रपों ने कर रखा है क्या इसके लिए हमसब भी दोषी नहीं हैं ? आज जिस भोंड़ी दिखावा का नंगा नाच इस लोकतंत्र में किया जा रहा है उससे राजतंत्र भी शर्मसार है। कौरव कुल परम्परा के पालकी ढ़ोने वालों ने जिस निर्लज्जता के साथ ‘लोकतंत्र’ को परिभाषित कर रखा है, संविधान और संवैधानिक संस्थाओं का क्षरण कर रखा है वह चारण परिपाटी का पराकाष्ठा है। संविधान की धज्जियां उड़ाते हुए ‘सत्ता के ऊपर सत्ता’ का जिस विभत्स व घिनौना चेहरा काम कर रहा है वह नादिरषाही प्रवृति का ही परिवर्तित रूप है।

लोकतंत्र रूपी सूर्य को भले ही वर्तमान कौरव कुल परम्परा रूपी सत्ता के अल्हड़ बादलों ने ढ़ंक कर अपने कुकर्मो को छिपाने का अनथक प्रयास कर रखा हो, किन्तु कब तक? कब तक लोकतंत्र रूपी सूर्य के रष्मियों को ढ़के रखेंगे। लोकतंत्र रूपी सूर्य के रष्मि रूपी जनता वर्ष 2014 में इन घने, काले, डरावने बादल को बेधकर इस सृष्टि को हरा-भरा करेगा इसमें रंच मात्र भी संदेह की गुंजाईष नहीं है। इन कौरव कुल परम्परा का लोकतंत्र में विनाष होना ही है ऐसा जनता का परम लक्ष्य है और भाट-चारणों की शैली को यह रास नहीं आ रहा है। फलस्वरूप राजकीय व परकीय गंठजोड़ से भारत के इस सद्गुण प्रवृति को ये कौरव कुल परम्परा के वाहक नष्ट करने को तुले हैं? जिसका एक घृणित चेहरा शांति और अहिंसा की धरती पटना में देखने को मिला। कौरव कुल के क्षत्रपों ने लाह के उस महल में पांडवों का नाष करने का पूरा इंतजाम कर रखा था। भारत में भगवान कण-कण में है। भारत की जनता तैमुर, चंगेज, औरंगजेब या अकबर जैसे रक्त पिपासु और नरभक्षियों का काल झेला है। जो शुद्ध नहीं थे वे उन आसुरी प्रवृतियों के दास बने किंतु जो सोना थे वे दमन के उस आग में और निखर कर निकले यह इतिहास हमारे आंखों के सामने है। जनता की आबाज जर्नादन सुनते हैं और हम सबने पटना के गंाधी मैदान में अपनी इसी आंखों से देखा। इस घटना में जनता के दिलो-दिमाग में उस विष्वास को और सुदृढ़ किया कि अब जल्द ही भारत का तपोभूमि जो भोग भूमि बना है, का उद्धार होगा। कौरव कुल परम्परा के क्षत्रयों ने जिस तरह विध्वंस का जाल बुना, उस विषम परिस्थिति में सारी बातें जानते हुए भी जो आत्मविष्वास, निर्भीकता, करूणा, धीरता, संवेदनषीलता, सहिष्णुता, वाक पटूता का परिचय दिया, वह अतुलनीय है मानवीय नहीं दैविक है। यही भारत जैसे सनातन राष्ट्र का खेवनहार होगा इसमें रंचमात्र भी संदेह नहीं रहा। ‘‘रोम जब जल रहा था, नीरो बंषी बजा रहा था’’ वही हाल इस समय सम्राट अषोक की पावन धरती का है? महात्मा बुद्ध के धरती ‘राजगृह’ में छप्पन भोगों में डूबा वह कौरव कुल परम्परा का क्षत्रय बिहार के संस्कार और संस्कृति को शर्मसार कर रहा था। वह असंवेदनषीलता की पराकाष्ठा को पार कर पूछता है-‘पसीना क्यों आ रहा था? पानी क्यों पी रहे थे?’ बिहार शर्मसार है कि विष्व को शांति, प्रेम और अहिंसा का पाठ बताने वाला भूमि पर ऐसे अमानवीय सत्ता की शासन है। ‘पसीना’ भगवान बुद्ध के उस करूणा का परिचायक और ‘पानी पीना’ उस धैयता का परिचायक था जिसे कभी महात्मा बुद्ध और महावीर ने मानव कल्याण के लिए दिया था। पटना के गांधी मैदान में वह अतुलनीय धैर्य का वाहक जान रहा था कि ब्लास्ट हो रहे हैं कुछ भी हो सकता है, लाखों देषभक्त जमे हैं थोड़ी सी चुक में पटना के सड़कों पर रक्त की नदियां बह सकती है किंतु देषभक्तों की वह विषाल समूह अपने उद्धारकर्ता के लिए बिहार के मान-सम्मान के लिए, बिहार की गौरवषाली अतीत के लिए शहीद होना स्वीकार किया इसके लिए बिहार के महान देषभक्त जनता नमन के पात्र हैं। गांधी मैदान की लोमहर्षक अमानवीय घटना की जितनी भी निंदा की जाए कम है किंतु इस घटना ने लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या भारत में लोकतांत्रिक तरीकों से विरोध करने के बजाय यह घृणित तरीका सही है?

स्मरण रहे कि भारत सहित विष्व के अनेक आतंकवादी संगठनों के एक से लेकर दस तक की संख्या में सिर्फ उसी व्यक्ति का नाम है। राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय खूफिया तंत्रों के अलर्ट के बावजूद भी सुरक्षा का जो मानक बिहार में दिया गया है वह बिहार सरकार को ‘हत्यारा’ साबित करता है। भारतीय लोकतंत्र में विचारों का मतभेद हो सकता है और होना चाहिए, मत भिन्नता लोकतंत्र की पुष्टता का प्रमाण होता है। लोकतंत्र के परिपक्वता का परिचायक है किंतु लोकतंत्र में जब व्यक्ति भेद आए तो वह कौरव कुल परम्परा का ही परिचायक है जो बिहार में देखने को मिला। अनेक अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के आंखों का किरकिरी वह उद्धारकर्ता अपनी जान की परवाह किए वगैर सतत राष्ट्र के पुर्ननिर्माण का ताना-बाना बुन रहा है और लोकतंत्र में उसे व्यापक सुरक्षा मिले यह शासन का प्रथम लक्ष्य होता है किंतु कौरव कुल परम्परा का चारण वर्तमान केन्द्रीय सरकार भारत की सर्वोच्च सुरक्षा प्रणाली पांच लोगों को दिया है उनमें पहला वर्तमान प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह, दूसरा पूर्व लोकप्रिय प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी और शेष जो तीन हैं उनमें श्रीमती सोनिया गांधी, पुत्र श्री राहुल गांधी, पुत्री श्रीमती प्रियंका गांधी बढ़ेरा। ‘क्या यह देष इसी कौरव कुल के रक्षण हेतु करों का भुगतान करती है? हमें सोचना होगा अपने अधिकार और कर्तव्य के प्रति सजग होना होगा? हम कर का भुगतान अपनी देष की प्रगति के लिए देते हैं ना कि कौरव कुल परम्परा के पोषण हेतु।’ सतत संवैधानिक संस्थाओं में क्षरण हो रही है। लोकषाही को वंषवाद को क्रूर पंजा ने जकड़ रखा है। क्या हमारी नियति इसी तरह से वंषवाद के जकड़ में रहकर जीना है? यदि ऐसी जिल्लत भरी वंषवादी कौरव कुल परम्परा के शोषण में ही जीना था तो फिर हमारे पूर्वजों ने शहीदी क्यों वरण किया था? क्या हमारी रगों में गुलामी की खून दौड़ रहा है? हम उस महान शहीदी परम्परा के कुल दीपक हैं जिन्होंने शहीदी स्वीकार किया किंतु दासता नहीं? यदि हम शहीदी परम्परा के कुल दीपक हैं तो आनेवाले समय में लोकतंत्र रूपी महाभारत में कौरव कुल परम्परा का विनाष हेतु अपने घरों से निकलकर, विषम, विकट परिस्थितियों में भी मतदान केन्द्र रूपी रणस्थल पर उपस्थित होकर ‘मत’ रूपी वाणों से संधान कर विजय प्राप्त करने को प्रतिबद्ध हो। ध्यान रखें इतिहास जब लिखी जाएगी तो इस पाप का वाहक हम भी होंगे। यदि हमने समय रहते इस कौरव कुल परम्परा का विनाष नहीं किया। हमें फ्रेंकलिन डी. रुजवेल्ट के उस विचार पर गंभीरता से सोचना चाहिए कि हम क्या थे और क्या हो गये। मुनी क्षमा सागर के शब्दों में- ‘देने के लिए, मेरे पास क्या है, सिवाय इस अहसास के, कि कोई, खाली हाथ, लौट न जाए।’

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sanjay-kumar-azad12**संजय कुमार आजाद
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निवारणपुर रांची 834002

मो- 09431162589
(*लेखक स्वतंत्र लेखक व पत्रकार हैं)
*लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं और आई.एन.वी.सी का इससे सहमत होना आवश्यक नहीं ।

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