Friday, April 10th, 2020

कैसे बचे बाद्य, तालमेल ही नहीं विभागों के पास -फैल है खूफिया तंत्र

1हेमंत पटेल , आई एन वी सी , भोपाल, बाद्यों की लगातार मौत जारी है, लेकिन इनकी सुरक्षा में लगे विभाग ही आपस में उलझे हुए हैं। इसका एक कारण वन विभाग प्रबंधन, वाइल्ड लाइफ कंजरवेशन और सूचना प्रौद्योगिकी सेल में आपसी तालमेल न होना भी है। इस वजह से न तो वन्य प्राणियों की सुरक्षा हो पा रही है, न ही वनों की कटाई रुक रही है। सूत्रों के अनुसार सूचना प्रौद्योगिकी सेल ने करोड़ों रुपए खर्च कर बाघों और वनों की सुरक्षा  के लिए सॉ टवेयर में कई एप्लीकेशन बनाए, लेकिन सामंजस्य के अभाव में इसका फायदा नहीं मिल रहा है। इधर संबंधित विभाग के अधिकारी अपनी जि मेदारियां एक दूसरे पर डालकर अपनी जि मेंदारी से बच रहे हैं। गौरतलब है कि वन अपराधों पर लगाम लगाने व विभागीय कार्यप्रणाली में पारदशिर्ता लाने वर्ष 2006 में सूचना प्रौद्योगिकी सेल का गठन हुआ था। उधर चालीस लाख की लागत से वायरलैस सेट भी खरीदे गए थे। वन विभाग न तो बाघ के शिकार पर रोक लगा पा रहा है, औ र नहीं शिकारियों पर लगाम। अभी हाल ही में एक बाघ का शिकार हुआ है। जिस पर प्रशासन पर्दा डालने का प्रयास कर रहा है। इधर इस संबंध में सूचना प्रौद्योगिकी सेल के अफसरों का कहना है कि उनकी तकनीक से 16 राज्यों का वन विभाग लाभ ले रहे हैं, तो मप्र क्यों नहीं ले सकता है। उधर अफसरों का कहना है कि वन विभाग सूचना तकनीक का फायदा हीं नहीं लेना चाहता है। इसी तरह तकनीकों को विस्तार भी नहीं दे रहा   है। उधर वाइल्ड लाइफ और प्रबंधन के अधिकारियों का कहना है कि उन्हें सूचना प्रौद्योगिकी सेल के सॉ टवेयर में किसी एप्लीकेशन की जानकारी ही नहीं तो उसका विस्तार कैसे करेंगे। इसी तरह अब वाइल्ड लाइफ ने सूचना प्रौद्योगिकी सेल की सेवाएं न लेते हुए वन्य प्राणियों की सुरक्षा के लिए डब्ल्यूआईआई की सेवाएं लेने का निर्णय लिया है। वन विभाग के अफसरों के मुताबिक सूचना प्रौद्योगिकी सेल केवल तकनीक उपलब्ध कराने व प्रशिक्षण देने का काम कर सकता है। उसका क्रियान्वयन और विस्तार संबंधित विभाग को ही करना होगा। वहीं पीसीसीएफए का कहना है, वन क्षेत्रों में बाघ व वन के संरक्षण के लिए किसी प्रकार की तकनीक की न तो कोई ट्रेनिंग दी गई है और न ही उपलब्ध कराई गई है। ऐसे में सुरक्षा और विस्तार की बात कैसे की जाए? -1 साल में 15 बाघ शिकार बीते एक साल में पंद्राह बाघों का शिकार हो चुका है। दूसरी ओर वन्य प्राणियों की मौत पर विभाग की लापरवाही लगातार जारी है। बावजूद इसके कोई भी कार्रवाई करने को तैयार नहीं है। जबकि केंद्र से राज्य सरकार को बाघ संरक्षण के लिए करोड़ों रुपए लगातार मिल रहे हैं। -राजधानी भी असुरक्षित वन विभाग के कलियासोत वन क्षेत्र में भले ही वन विभाग लाख सुरक्षा के दावे करता हो, लेकिन यहां भी वन प्राणियों का शिकार हो चुका है। इस वन में बाघ और तेदुंआ होने की पुख्ता खबर है। पर वन विभाग की सुरक्षा व्यवस्था चौपट है। पूर्व कलेक्टर निकुंज कुमार श्रीवास्तव ने कुछ बाद्यों के मूव मेंट के दौरान इस क्षेत्र में भारी वाहनों के प्रवेश पर रोक लगा दी थी। उनके जाते ही स्थिति जस की तस हो गई है। विभाग का मुखबिर तंत्र भी शिकार किए जाने को लेकर पूरी तरह फेल हो चुका है।

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