–  तनवीर जाफ़री –

 
भारतवर्ष को कृषि प्रधान देश कहा जाता है। इस कथन से प्रत्येक भारतवासी भली भांति परिचित है। परन्तु इन दिनों देश के किसानों पर क्या गुज़र रही है जिनके  ख़ून पसीने व कड़ी मेहनत के दम पर विश्व में भारत की पहचान कृषि प्रधान देश के रूप में बानी हुई है? अपनी अधिकारों की लड़ाई लड़ते हुए इस घनी धुंध,कोहरे व शीत लहरी का सामना करते हुए लाखों की तादाद में अन्नदाता दिल्ली के चारों ओर डेरा जमाए हुए है तथा अब भी देश के  तमाम राज्यों से प्रतिदिन हज़ारों की संख्या में किसान दिल्ली की ओर कूच कर रहा है। यह आंदोलन केवल दिल्ली तक ही सीमित नहीं है बल्कि हरियाणा,पंजाब व चंडीगढ़ सहित अनेक इलाक़ों में सैकड़ों जगहों पर किसान मुख्य मार्गों पर लंगर लगाकर, लोगों के वाहनों को रुकने की विनती कर राहगीरों को अपनी मांगों से परिचित कराकर इसे किसान आंदोलन के बजाए जन आंदोलन का रूप दे रहे हैं। ‘किसान नहीं तो भोजन नहीं’ ‘No Farmers-No Food’ लिखी हुई तख़्तियां हाथों में लिए किसान व उनके शिक्षित युवा परिजन अनेक व्यस्त रेड लाइट पर नज़र आ रहे हैं जो आम लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। परन्तु सरकार के पास उनकी मांगों को पूरा करने के बजाए किसानों के बारे में समय समय पर तरह तरह की परिभाषाएँ गढ़ने के सिवा और कुछ नहीं। दूसरी ओर किसान अपने बारे में हर तरह की ‘अपमान जनक परिभाषा’ सुनने के बावजूद पूरी विनम्रता व साहस का परिचय देते हुए अपनी मुख्य मांगों अर्थात कृषि अध्यादेश वापस लिए जाने की मांगों के प्रति अडिग नज़र आ रहा है।

                                           इन असाधारण परिस्थितियों में दो बातें साफ़ तौर पर दिखाई दे रही हैं। एक तो यह कि नरेंद्र मोदी सरकार जो 2014 से ही अपने कठोर फ़ैसलों के लिए अपनी पहचान बना चुकी है भले ही उनके परिणाम घातक या हानिकारक क्यों न रहे हों। वह कृषक अध्यादेश, मतदान के बजाए ध्वनि मत से पारित कराने के अपने फ़ैसले से पीछे हटकर अर्थात इन क़ानूनों को वापस लेकर ‘सरकार की कमज़ोरी’ का सन्देश नहीं देना चाहती। अपने क़दम पीछे हटाकर सरकार अन्य विवादित क़ानूनों के विरुद्ध किसी अन्य आंदोलन को न्यौता भी नहीं देना चाहती। सीधे शब्दों में अब यह अध्यादेश सरकार के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका है। सरकार के इस रवैये से यह भी साफ़ नज़र आता है कि उसे किसानों की शंकाओं का ठोस समाधान करने व उन्हें पूरी तरह उनकी फ़सल के यथोचित मूल्य व उनकी ज़मीनों की सुरक्षा की पूरी गारंटी  देने से ज़्यादा दिलचस्पी उन कॉर्पोरेट घरानों के हितों को साधने में है जो बड़े  नियोजित तरीक़े से देश में सैकड़ों बड़े अनाज भण्डारण केंद्र बना चुके हैं। यहाँ तक कि कई भण्डारण केंद्रों में वे अपनी निजी रेल लाइन तक पहुंचा चुके हैं।उधर दूसरी तरफ़ किसान भी सरकार व कॉर्पोरेट घरानोंकी इस मिली भगत को भांप चुके हैं तभी वे इन नए कृषि अध्यादेशों  को वापस लेने से कम में किसी बात पर राज़ी नहीं हैं और संशोधन आदि का विरोध कर रहे हैं।

                                           ऐसे में चिंता का विषय यह कि वह मोदी सरकार जिसने अपने शासन के छः वर्षों  तक  निजीकरण को भरपूर बढ़ावा दिया है अनेक बंदरगाह,एयरपोर्ट,संचार,रेल,पेट्रोलियम,रक्षा जैसे अनेक क्षेत्रों को कारपोरेट्स के हवाले कर दिया है क्या सरकार वही स्थिति कृषि क्षेत्र की भी करना चाह रही है ? आख़िर ऐसी शंकाएं किसानों में इसीलिए तो पैदा हो रही हैं क्योंकि वह पिछले छः वर्षों से देख रही है कि किस तरह मोदी सरकार उद्योगपतियों के हित साधने में लगी है। पिछले पूरे वर्ष के दौरान ख़ास तौर पर कोरोना काल में जब भारत सहित दुनिया के अधिकांश देशों के उद्योग धंधे व्यवसाय आदि सब ठप पड़े थे भारत के सैकड़ों उद्योग बंद हो गए। उस दौरान भी भारत के सरकार के ‘कृपा पात्र’ दो उद्योग पतियों ने अपनी कमाई में कई गुना इज़ाफ़ा किया। मज़े की बात तो यह है कि उन्हीं दिनों में जब बेरोज़गार होकर करोड़ों मायूस लोग पैदल अपने अपने  घरों की सैकड़ों-हज़ारों किलोमीटर की यात्रा तय कर रहे थे उस वक़्त भी चतुर बुद्धि उद्योगपति व राजनीति के शातिर खिलाड़ी ‘आपदा में अवसर’ तलाश रहे थे। परन्तु  उस दौर में भी यही अन्नदाता देश में जगह जगह लंगर लगा कर इन बेघर व बेसहारा श्रमिकों को भोजन व अन्य सुविधाएँ मुहैया कराकर भारत के ‘कृषि प्रधान’देश होने के भरम की लाज रख रहा था।                                        

                                                 आज वही अन्नदाता जो कि देश की आधी आबादी से भी अधिक है,स्वयं अपने अस्तित्व के लिए चिंतित नज़र आ रहा है। तो दूसरी ओर हिंदुत्व के नाम पर देश के लोगों को गुमराह कर धर्म के नाम पर लोकप्रियता हासिल कर कर न केवल किसानों की अनदेखी की जा रही है व उनके अधिकारों का हनन किया जा रहा है बल्कि जिस बहुसंख्य समाज को ‘गर्व’ की झूठी अनुभूति कराई जा रही है उन्हें भी बेरोज़गारी व मंहगाई के मुंह में निरंतर धकेला जा रहा है। देश मात्र 70 वर्षों की आज़ादी के बाद यदि आत्म निर्भर बना है तो इसका पूरा श्रेय हरित क्रांति के इन्हीं अन्नदाता रुपी नायकों को ही जाता है न कि किसी एक दो कारपोरेट घरानों को।आज भी देश जिन रीढ़ की हड्डियों पर टिका है वे हैं भारत के किसान,मज़दूर,कामगार,मध्य व निम्न मध्य वर्ग के लोग। इनकी अवहेलना,अनदेखी वास्तव में देश की अनदेखी करना है। आश्चर्य की बात है कि स्वयं को लोक हितैषी बताने वाली सरकार संसद में किसानों व कामगारों के हितों में फैसले लेने के बजाए कारपोरेट जगत के हित में निर्णय ले रही है ? क्या इन्हीं कारपोरेट के हितों को साधने वाले कामों के लिए संसद को ‘लोकतंत्र के मंदिर’ का नाम दिया गया है ? इन हालात में जबकि देश का कृषक परेशान हो यह कैसे माना जाए कि भारत ‘कृषि प्रधान ‘ देश है ? आज देश नव वर्ष की ख़ुशियाँ तो ज़रूर मना रहा है परन्तु इस भयंकर शीत ऋतु में जिस तरह आए दिन धरने पर बैठा कोई न कोई किसान अपनी जानें गंवा रहा है कोई भी सच्चा भारतीय ऐसे दुःखद वातावरण में नव वर्ष के जश्न की कल्पना भी कैसे कर सकता है ? देश के लिए जश्न का अवसर तो उस समय होगा जबकि देश का प्रत्येक व्यक्ति संविधान में निहित अपने अधिकारों को हासिल कर रहा हो और स्वयं को सुरक्षित महसूस करे।

 

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About the Author

Tanveer Jafri

Columnist and Author

 

Tanveer Jafri, Former Member of Haryana Sahitya Academy (Shasi Parishad),is a writer & columnist based in Haryana, India.He is related with hundreds of most popular daily news papers, magazines & portals in India and abroad. Jafri, Almost writes in the field of communal harmony, world peace, anti communalism, anti terrorism, national integration, national & international politics etc.

 

He is a devoted social activist for world peace, unity, integrity & global brotherhood. Thousands articles of the author have been published in different newspapers, websites & news-portals throughout the world. He is also recipient of so many awards in the field of Communal Harmony & other social activities.

 

Contact – : Email – tjafri1@gmail.com –  Mob.- 098962-19228 & 094668-09228 , Address – Jaf Cottage – 1885/2, Ranjit Nagar,  Ambala City(Haryana)  Pin. 134003

 
 

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