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Tuesday, October 27th, 2020

कृषक आंदोलन:सरकार की विश्वसनीयता पर संदेह ?

 - तनवीर जाफ़री - 

 

अपने 22 वर्षों पुराने तथा एन डी ए के संस्थापक सहयोगी रहे अकाली दल के विरोध  बावजूद केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा आनन फ़ानन में संसद के दोनों सदनों में देश के किसानों से संबंधित तीन कृषक अध्यादेश  विवादित तरीक़े से पारित करा दिए गए। नतीजतन अकाली  दाल ने न केवल अपने कोटे की खाद्य प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर बादल को मोदी मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दिलवाया बल्कि एन डी ए से समर्थन वापस लेने की घोषणा भी कर डाली। परन्तु सरकार यही कहे जा रही है कि नए कृषि क़ानून किसानों के जीवन में ख़ुशहाली के नए रास्ते खोलेंगे। सरकार अध्यादेश रुपी इस क़ानून को किसानों के हित में उठाया गया एक ऐतिहासिक क़दम बता रही है। परन्तु देश का किसान इन नए कृषि क़ानूनों को न केवल किसान विरोधी बता रहा है बल्कि इसे किसानों के लिए 'मौत का फ़रमान ' की संज्ञा भी दे रहा है। विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति से यह अनुरोध भी किया है कि वे इस दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर न करें। इसी क़ानून के विरोध में गत 25 सितंबर को देश के कई बड़े राज्यों में किसानों ने व्यापक  आंदोलन किये। रेल व सड़कें जाम की गईं। बाज़ार बंद कराए गए। देश के  सौ से अधिक श्रमिक संगठनों के आवाह्न पर 'अन्नदाता' सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए। जब से नये कृषि विधेयक की चर्चा छिड़ी थी उसी समय से किसानों द्वारा इसका विरोध देश के अनेक भागों में शुरू कर दिया गया था। किसानों के तेवरों को देखकर यह अंदाज़ा भी लगाया जा सकता है कि किसान आंदोलन की यह आग शायद अभी थमने वाली भी नहीं है ।

                                           केंद्र सरकार ने किसानों के विरोध के प्रत्युत्तर में किसानों की समस्याओं व उनकी शिकायतों का वाजिब हल निकालने का आश्वासन देने के बजाए यह कहना शुरू किया कि विपक्षी पार्टियाँ किसानों को गुमराह कर रही हैं। किसान उनके द्वारा कृषक क़ानून के संबंध में फैलाये जा रहे झूठ व भ्रांतियों के बहकावे में आकर इस क़ानून का विरोध कर रहे हैं। सरकार ने लगभग पूरे देश के समाचार पत्रों में इसी आशय का संपूर्ण पृष्ठ का एक विज्ञापन भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चित्र के साथ प्रकाशित कराया जिसमें किसानों व विपक्षी दलों की शंकाओं को 6 बिंदुओं में 'झूठ' शीर्षक के साथ काली पृष्ठभूमि में प्रकाशित किया गया तथा ठीक इसका सामने के भाग में 'सच' शीर्षक से इनका सकारात्मक पक्ष या यूँ कहें कि सरकारी पक्ष रखा गया है। इस पूरे पृष्ठ के विज्ञापन का मुख्य शीर्षक है "किसानों,झूठ से सावधान -कृषि विधेयक ने किया है तरक़्क़ी का प्रावधान" । 'स्वतंत्र किसान-सशक्त किसान' नारे के साथ जारी इस विज्ञापन के अंत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक कथन भी प्रकाशित है जिसमें मोदी जी फ़रमाते हैं कि- "21 वीं सदी में भारत का किसान बंधनों में नहीं,खुलकर खेती करेगा।21 वीं सदी का किसान जहाँ मन किया वहाँ फ़सल बेचेगा और जहाँ ज़्यादा पैसे मिले वहीँ पर फ़सल बेचेगा"।

                                          उपरोक्त विज्ञापन सामग्री भारत सरकार के अर्थात जनता के करों के सैकड़ों करोड़ ख़र्च कर 23 सितंबर के समाचार पत्रों में तब प्रकाशित करवाई गयी जबकि देश की अधिकांश किसान यूनियन्स सरकार के इस नए कृषक क़ानून को 'किसान विरोधी काला क़ानून' बताते हुए इसे वापस लिए जाने की मांग को लेकर 25 सितंबर को भारत बंद का आह्वान कर चुकी थीं। सरकार ने केवल विज्ञापन ही प्रकाशित /प्रसारित नहीं कराए बल्कि अनेक प्रमुख केंद्रीय मंत्रियों,कई भाजपा शासित राज्यों के मुख्य मंत्रियों व अपनी विचारधारा के सैकड़ों स्तंभकारों व लेखकों से इस विधेयक के पक्ष में तथा आंदोलनकारियों व उनके समर्थकों के विरोध में स्तम्भ व आलेख भी प्रकाशित करवाए। स्वयं प्रधानमंत्री ने इस क़ानून के पक्ष में मोर्चा संभाला और कई जगह इस विधेयक का पक्ष रखते सुने गए। ज़ाहिर है यह सारी की सारी क़वायद सिर्फ़ इसीलिये थी ताकि या तो किसान अपना आंदोलन वापस ले लें या यह आंदोलन कमज़ोर पड़ जाए अथवा देश की किसान शक्ति विभाजित हो जाए। 21 सितंबर को सरकार की ओर से ऐसा ही एक प्रयास यह भी  किया गया कि सरकार ने रबी की छह फ़सलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने की घोषणा भी कर दी। जबकि रबी फ़सलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा आम तौर पर सितंबर के बाद ही होती रही है। परन्तु  किसानों के 25 सितंबर के भारत बंद व देश के विभिन्न भागों में हो रहे किसान आन्दोलनों को शांत करने के मक़सद से सरकार ने संसद सत्र के दौरान ही इसकी भी घोषणा कर दी। अब किसानों के आंदोलन के बावजूद सरकार ने अपना दूसरा अभियान चलाने का फ़ैसला किया है जिसके तहत आगामी 15 दिनों तक भाजपा कार्यकर्ता किसानों से व्यक्तिगत जनसंपर्क कर उन्हें नए क़ानून के सकारात्मक पहलुओं का 'ज्ञान' देंगे तथा उनकी शिकायतों को भी सुनेंगे।

                                        उपरोक्त पूरे प्रकरण में क़ाबिल-ए-ग़ौर बात यह है कि जिस प्रकार सरकार विज्ञापन व आलेखों आदि के माध्यम से किसानों को समझाने पर इतनी ऊर्जा ख़र्च कर रही थी,देश के किसानों को नासमझ व दूसरे राजनैतिक दलों के बहकावे में आया हुआ बता रही थी इस क़वायद के बजाए वह अपनी ही सरकार के प्रमुख सहयोगी अकाली दल व उनकी खाद्य प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर बादल को यह बात क्यों नहीं समझा सकी कि यह क़ानून किसानों की तक़दीर बदलने वाला है ? बादल परिवार केवल राजनैतिक परिवार ही नहीं बल्कि इस परिवार की गिनती पंजाब के चंद गिने चुने बड़े व संपन्न किसानों में भी होती है। आम ग़रीब किसानों की तरह यह परिवार कम पढ़ा लिखा या अनपढ़ परिवार नहीं जिसे कोई राजनैतिक दल या नेता 'झूठ' बोलकर गुमराह कर दे ? यदि इस परिवार को ही इस किसान हितकारी क़ानून के फ़ायदे बताने का ज़िम्मा दिया गया होता तो शायद पंजाब हरियाणा में आंदोलन की तीव्रता इस क़द्र न होती जो 25 सितंबर को देखने को मिली ? खाद्य प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर बादल का मोदी मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देना,अकाली दल का एन डी ए से नाता तोड़ना और किसानों के साथ उनका खड़ा होना ही इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि यह क़ानून किसानों के हित में कम अहित में ज़्यादा नज़र आ रहा है। अच्छा होता कि किसानों को विज्ञापनों के माध्यम से संबोधित करने व विपक्षी दलों पर इस आंदोलन की भड़ास निकालने के बजाए अपने ही सहयोगी दलों व मंत्रियों तथा देश किसान संगठनों को विश्वास में लिया जाता।

                                         ऐसा प्रतीत होता है कि देश को मोदी सरकार की विश्वसनीयता के प्रति संदेह बढ़ता जा रहा है। नोट बंदी,जी एस टी,लॉक डाउन की घोर असफलता,अनियंत्रित मंहगाई,बढ़ती बेरोज़गारी,युवाओं व किसानों में पनपता असुरक्षा का वातावरण,क़ानून व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति,चौपट हो चुके उद्योग धंधे,तेल से लेकर खाद्यान्न तक में आग लगाती मंहगाई, सीमाओं पर बिगड़ते माहौल जैसी अनेक बातों ने निश्चित रूप से सरकार के वादों,नीतियों व कथनों के प्रति विश्वास कम और सरकार की विश्वसनीयता पर संदेह अधिक खड़ा कर दिया है।
 
 
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About the Author
Tanveer Jafri
Columnist and Author
Tanveer Jafri, Former Member of Haryana Sahitya Academy (Shasi Parishad),is a writer & columnist based in Haryana, India.He is related with hundreds of most popular daily news papers, magazines & portals in India and abroad. Jafri, Almost writes in the field of communal harmony, world peace, anti communalism, anti terrorism, national integration, national & international politics etc.
He is a devoted social activist for world peace, unity, integrity & global brotherhood. Thousands articles of the author have been published in different newspapers, websites & news-portals throughout the world. He is also recipient of so many awards in the field of Communal Harmony & other social activities.
Contact – : Email – tjafri1@gmail.com
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