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Thursday, June 24th, 2021

किसानों को खेती संकट में से बाहर निकालने के लिए मोदी के सीधे दखल की मांग

Prakash SIngh Badal INVC NEWSआई एन वी सी न्यूज़
चंडीगढ़, पंजाब के मुख्यमंत्री स. प्रकाश सिंह बादल ने आज पंजाब के किसानों को मौजूदा कृषि संकट से निकालने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के सीधे दखल की मांग की है। मोदी को लिखे एक पत्र में मु यमंत्री ने उनको अवगत करवाया कि पंजाब हमेशा ही देश के लिए खाद्य सुरक्षा यकीनी बनाने में अग्रणीय भूमिका अदा करता रहा है और गत् तीन दशकों से केन्द्रीय पूल में 40-50 प्रतिशत गेहूं तथा 30 -35 प्रतिशत चावल का योगदान डालता रहा है। उन्होंने कहा कि पंजाब के किसान अपने व्यवसाय के प्रति इतने समर्पित हैं कि देश के भूगौलिक क्षेत्र का दो प्रतिशत तथा देश की जनसं या का इससे भी कम हिससा होने के बावजूद पंजाब राष्ट्रीय खाद्य भंडार में अन्य राज्यों से अधिक योगदान डालता है इसलिए ही राज्य को देश के अन्न दाते के तौर पर जाना जाता है। स.बादल ने कहा कि गत् तीन दशकों के दौरान राष्ट्रीय खाद्य पूल में राज्य द्वारा 35-40 प्रतिशत धान और 45-50 प्रतिशत गेहूं का योगदान डाला जाता है। मुख्यमंत्री ने आगे बताया कि इसलिए राज्य और राज्य के किसानों को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है और किसानों को अपने दो प्राकृतिक सत्रोतों-मिट्टी की उपजाऊ शक्ति और पानी की कुर्बानी देनी पड़ी है। स. बादल ने कहा कि किसानों को खाद्य पदार्थों और गैर वाजिब मूल्यों के कारण बड़े वित्तीय नुकसान भी झेलने पड़े हैं क्योंकि केन्द्र सरकार द्वारा उपभोक्ता कीमतों को गरीबों की पहुंच में रखने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि राज्य के किसान केन्द्र सरकार के इस ने क लक्ष्य की सराहना और समर्थन करते हैं तथा इस भार झेलने में सरकार की समर्था का एक ही कारण पंजाब के किसानों द्वारा डाला गया भारी योगदान है। मुख्यमंत्री ने कहा कि केन्द्र में समय समय पर बनती सरकारों ने देश के अन्न दाते को भिखारी बना कर रख दिया है। इसका कारण यह है कि खाद्य पदार्थों जैसे कृषि उत्पादों की कीमतें और कृषि से संबंधित अन्य अह्म वस्तुएं जैसे कि खाद, कीटनाशक दवाइयां, मशीनरी तथा लेबर आदि की लागतों के बीच बहुत अंतर है। इसमें किसान की जमीन की लागत को बतौर पूंजी निवेश के तौर पर गणना नहीं की जाती। उन्होंने कहा कि अनाज जैसे खेती उत्पादों की कीमतें तो गणना कर ही बढ़ती है जोकि खेती लागतों में लगातार बढ़ोतरी होती रहती है। उन्होंने कहा कि खेती उत्पादन का न्यूनतम समर्थन मूल्य यकीनन मंडीकरण के बावजूद प्रतिशत के हिसाब से बढ़ता है जबकि खेती लागतों के मूल्यों में कई गुणा बढ़ोतरी हो जाती है। उन्होंने कहा कि मंहगाई के हिसाब से न्यूनतम समर्थन मूल्य में होते परिवर्तन वास्तव में गलत दिशा में जाते हैं जिससे असल कीमतें नीचे की तरफ जा रही हैं जबकि लागतों की कीमतें बहुत अधिक मंहगाई के स्तर पर पहुंच जाती हैं। गत् दो वर्षों के दौरान वर्ष 2014 और 2015 की खरीफ में सूखे जैसी स्थिति पैदा होने और वर्ष 2014-15 के दौरान रबी सत्र में बेमौसमी बारिश से कपास की फसल को बहुत क्षति हुई जिससे पहले ही संकट में से गुजर रही लघु एवं माध्यम किसानों की आर्थिकता को बड़ा धक्का लगा है । इसी कारण देहाती क्षेत्रों में किसानों पर ऋण का बोझ भी भारी हो गया है जिससे किसान भाईचारे में बैचेनी पैदा होने स्वाभाविक है। आर्थिक कारणों से किसान की आत्म-हत्याओं  ने इस समस्या ने और गहरा रूप धारण कर लिया है।  उन्होंने कहा कि किसान तो चाहे अपनी शिकायतों का प्रगटावा शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक ढंग से करते हैं परंतु कुछ ऐसी घटनाएं भी सामने आई हैं कि उनकी मौजूदा स्थिति का राजनीतिकरण किया जा रहा है और इसको इस दिशा में ले जाने के लिए भी यत्न किए गए जोकि अमन शांति और सद्भावना के मूल्यों के बिल्कुल विपरीत हैे। उन्होंने कहा कि किसी भी समाज में अमन शांति और स्थिरता के लिए आर्थिक न्याय और बराबर बांट को यकीनी बनाना ही मूल आधार है और जब देश के अन्न दाते के हितों की बात हो तो इसको दोहरे प्रयास द्वारा यकीनी बनाने की आवश्यकता है। इन सभी चुनौतियों का हल कृषि को योगय एवं लाभप्रद व्यवसाय बनाकर ही किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि कृषि उत्पादन के न्यूनतम समर्थन मूल्य को लाभप्रद बनाने तथा यकीनन मंडीकरण  के बिना किसानी को पटरी पर लाने के लिए और कोई राह नहीं अपनाया जा सकता। पंजाब सरकार द्वारा भारत सरकार के पास लगातार पहुंच कर इस गंभीर समस्या के हल के लिए अपील की जाती रही है कि केन्द्र द्वारा राष्ट्रीय किसान आयोग के चेयरमैन डा. एम एस स्वामीनाथन द्वारा दिए फार्मूले को अपनाया जाए। धान और गेहूं के समर्थन मूल्य की तरह यह सुझाव दिया गया था कि मक्की, कपास और ऐसी फसलों के मामले में भी डेफीशेंसी प्राईज़ पेमेंट मकैनिज़म लागू किया जाना चाहिए तािक किसानों को लाभप्रद समर्थन के रूप में बाजिव मूल्य मिल सकें। मु यमंत्री ने मौसम की मार से फसलों के हुए नुकसान के लिए किसानों को मुआवजा एवं पुनर्वास के लिए व्यापक तौर पर फसली बीमा लागू करने की वकालत की। उन्होंने कहा कि यह भी आपके ध्यान में कि भारत सरकार के कृषि मंत्रालय द्वारा किसानों एवं विशेष तौर पर हरित क्रांति वाले राज्यों के किसानों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ऐसे उचित बीमा स्कीम भी तैयार नहीं की गई। किसानों के घाटे की भरपाई के लिए उनको ना केवल खेती लागतों के लिए मुआवजा देने की जरूरत है बल्कि आय में पड़े घाटे की पूर्ति की जाए। प्लाट के आधारित खेती बीमा स्कीम की जानी चाहिए और इसको केन्द्रीय फंडों से लागू किया जाए। मु यमंत्री ने कहा कि कृषि लागतों तथा फसल के मूल्य में पड़ी दरार ने किसानी आर्थिकता को धक्का पहुंचाया है  । उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में वित्तीय संस्थानों से लिये कर्जे को वापिस करने में असमर्थ हैं। भारत सरकार के अनुमान अनुसार वर्ष 2013  में बैंकों का किसानों द्वारा 52438 करोड़ रुपये का बकाया है जिस में जनतक सैक्टर के बैंकों का 38700 करोड़ रुपये और सहकारी बैंकों का 13738 करोड़ रुपये का कर्जा शामिल है। इसके अतिरिक्त किसानों द्वारा अपनी घरेलू एवं समाजिक जरूरतों की पूर्ति के लिए आढ़तियों सहित गैर वित्तीय स्त्रोतों से उधार उठाया जाता है। इस गंभीर समस्या को उठाते हुये मुख्यमंत्री ने कहा कि लघु एवं मध्यम किसानी और खेती मज़दूरों को यकमुश्त ऋृण माफी के रूप में राहत मुहैया करवाने की फ ौरी जरूरत है। उन्होंने कहा कि यह भी सच है कि इस समस्या को नज़र अंदाज करना भविष्य में अपनी राष्ट्रीय आर्थिकता और देश की अन्न सुरक्षा को खतरे में डालने के तूल है।

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