किसानों की भागीदारी पर आधारित क्रियाशीलता अनुसंधान कार्यक्रम

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संजय कुमार

जल संसाधन मंत्रालय ने वर्ष 2007-08 के खरीफ मौसम से लेकर देश के शुष्क, अर्ध्द-शुष्क, पहाड़ी और तटवर्ती क्षेत्रों की सिंचित भूमि के लिए किसानों की भागीदारी पर आधारित क्रियाशीलता अनुसंधान कार्यक्रम (एफपीएआरपी) शुरू किया है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य प्रत्येक जल की बूंद से अधिकाधिक फसल और आय के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए प्रौद्योगिकियों को आसानी से दर्शाना है।
 
 कृषि विश्वविद्यालयों, आईसीएआर अनुसंधान संस्थानों, आईसीआरआईएसएटी, डब्ल्यूएएलएमआई और गैर-सरकारी संगठनों की मदद से देश भर में इस प्रकार की पांच हजार प्रदर्शनियां आयोजित की गयी हैं । चुनिंदा संस्थानों को किसान परिवारों के साथ मिलकर ऐसी प्रदर्शनियां आयोजित करने का दायित्व सौंपा गया है ताकि कृषि उत्पादन बढाने के लिए मान्य और उपलब्ध प्रौद्योगिकियों से उन्हें परिचित कराया जा सके । देश के लगभग 2300 गांवों को शामिल करते हुए 25 राज्यों में 60 संस्थानों द्वारा एफपीएआरपी कार्यक्रम चलाया जा रहा है।
 
 प्रत्येक कार्यक्रम कम से कम एक हेक्टेयर क्षेत्र को अपने दायरे में लेता है और उसे किसान परिवारों के साथ इस प्रकार की भागीदारी प्रक्रिया के साथ क्रियान्वित किया जाता है ताकि उन्हें इस कार्यक्रम के प्रति उनके स्वामित्व का बोध हो । मंत्रालय की ओर से इस कार्यक्रम के लिए अब तक कुल 24 करोड़ 46 लाख रुपये जारी किए गए हैं।
 
जल के बारे में जानकारी
 कृषि के लिए जल सबसे महत्त्वपूर्ण घटकों में से एक है । कृषि और अन्य प्रयोजनों के लिए जल की बढती मांग को देखते हुए जल के प्रभावकारी इस्तेमाल के लिए सृजित सुविधाओं को कारगर बनाने पर जोर देने की जरूरत है । पारंपरिक सिंचाई प्रौद्योगिकियों (खांचेदार, क्यारीनुमा और प्लावन) द्वारा पौधों को भूगर्भ जल वितरित किया जाता है जिसके कारण सामान्य तौर पर जल की काफी क्षति होने के साथ ही जल के एकसमान वितरण में बाधा उत्पन्न होती है । इसके अलावा सिंचाई प्रणाली में प्रौद्योगिकीय सुधारों के कारण उत्पादन में वृध्दि के अवसर भी आए हैं । ऐसा पाया गया है कि विशेषकर स्प्रिंकलर और ड्रिप सिंचाई प्रणाली जैसी आधुनिक सिंचाई प्रौद्योगिकियों के बल पर जल का इस्तेमाल अत्यधिक प्रभावकारी बन गया है । इन प्रौद्योगिकियों ने निम्न जल ग्रहण क्षमता (बालूई और चट्टानी मिट्टी) वाले क्षेत्रों के साथ ही निम्न गुणवत्ता वाली भूमि और ढालदार भूमि पर खेती के लिए अवसरों के नये द्वार खोल दिए हैं।
 
 एक अनुमान के अनुसार सिंचाई परियोजनाओं में जल के प्रभावकारी इस्तेमाल के मौजूदा स्तर को 10 प्रतिशत बढाने से मौजूदा सिंचाई क्षमता के बल पर 140 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि को सिंचाई के दायरे में लिया जा सकता है । नई परियोजनाओं के माध्यम से इतनी सिंचाई क्षमता बढाने के लिए जितने निवेश की जरूरत होगी उसकी तुलना में काफी कम धनराशि की जरूरत होगी।
 
प्रौद्योगिकी
 एफपीएआरपी के अधीन प्रदर्शित की जा रही निम्नलिखित प्रमुख प्रौद्योगिकियां हैं जो उन्नत फसल के प्रयोगों, जल की बचत, भंडारण ढांचे के डिजाइन और कृषि उपकरणों आदि से संबंधित हैं –
 धान की फसल पर जोर देने वाली प्रणाली पर आधारित कृषि, बहुफसली कृषि, उन्नत फसल चक्र के माध्यम से जल के कारगर इस्तेमाल में सुधार, जैव-कृषि प्रौद्योगिकी, जल संवर्ध्दन गतिविधियां उदाहरण के लिए मत्स्यपालनफसल की विविधता और जल का बहुविध इस्तेमाल, उन्नत सिंचाई विधि–सूक्ष्म सिंचाई विधि (स्प्रिंकलर, ड्रिप), जल संभरण प्रौद्योगिकिया (कम लागत वाला वर्षा जल संभरण का लघु ढांचा, उदाहरण के लिए जलकुंड, भंडारण जलाशय, परिस्रवण जलाशय, चेक डैम, कुंए का संभरण आदि), जल निकासी के माध्यम से मिट्टी को सुधारना और मिट्टी तथा जल संरक्षण के उपाय इनमें शामिल हैं।
 
प्रभाव
 इन प्रदर्शनियों में जल की बचत से जुड़ी प्रौद्योगिकियां दर्शायी गयीं जो विभिन्न राज्यों में धान, गेहूं, सेव और मक्का जैसी विभिन्न फसलों पर आधारित हैं । एफपीएआरपी के अधीन प्रदर्शित इन प्रौद्योगिकियों के निष्पादन की तुलना सिंचाई की पारंपरिक विधि के साथ की गयी और जल की बचत और आय के रूप में प्रतिशत वृध्दि दर्ज की गयी । इसके द्वारा गेहूं में 20 प्रतिशत से 91 प्रतिशत, धान में 22 प्रतिशत से 50 प्रतिशत, चना में 22 प्रतिशत से 33 प्रतिशत, सब्जियों में 31 प्रतिशत से 40 प्रतिशत, मूंगफली में 15 प्रतिशत से 26 प्रतिशत, सोयाबीन में 33 प्रतिशत, मक्का में 8 प्रतिशत से 40 प्रतिशत, केले की फसल में 40 प्रतिशत से 50 प्रतिशत और नारियल में 65 प्रतिशत तक जल की बचत का संकेत मिला है । इनके बल पर गेहूं की पैदावार में 7 से 289 प्रतिशत, धान में 8 से 100 प्रतिशत, चना में 10-66 प्रतिशत, सब्जी में 10-230 प्रतिशत, मूंगफली में 16-18 प्रतिशत, सोयाबीन में 20-34 प्रतिशत, मक्का में 26-78 प्रतिशत और केले तथा नारियल की फसलों में क्रमश: 9 प्रतिशत और 24 प्रतिशत वृध्दि के संकेत मिले हैं।

 एफपीएआरपी के प्रदर्शों से इस बात के संकेत मिले हैं कि सिंचाई जल के इस्तेमाल की प्रभावोत्पादकता में सुधार लाने हेतु पर्याप्त संभावना है और इससे किसानों की उत्पादकता के साथ ही लाभोत्पादकता में भी वृध्दि होती है । विशेषकर स्प्रिंकलर और ड्रिप सिंचाई जैसी आधुनिक सिंचाई प्रौद्योगिकियों के बल पर फसल उत्पादन के लिए जल के इस्तेमाल की प्रभावोत्पादकता में वृध्दि होती है । इन प्रौद्योगिकियों ने किसानों के लिए अवसरों के नये द्वार खोल दिए हैं जिनके बल पर वे अधिक जल की जरूरतों वाली कम मूल्य की फसलों (जैसे – दलहन) के स्थान पर फलों, सब्जियों और तिलहनों आदि जैसी जल की कम जरूरतों के साथ अधिक मूल्य वाली फसलों की पैदावार कर सकते हैं ।

14 COMMENTS

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