Tuesday, April 7th, 2020

कांग्रेस को अब समलैंगिक समुदाय के 'वोट बैंक' का सहारा!!!!

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दिल्ली,

समलैंगिक संबंधों को अपराध ठहराने वाली धारा 377 पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से  कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी खासी निराश हैं। कांग्रेस अध्यक्ष ने इस मामले  में बयान जारी कर कहा है कि दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला सही था। हमेँ हर किमत पर मानवाधिकारों का सम्मान करना चाहिए। समलैंगिक सबंधोँ को अपराध की श्रेणी में बरकरार रखने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सोनिया की निराशा के बाद अब सरकार भी इस बारे में अध्यादेश लाने पर विचार कर रही है। इस पूरे मसले पर सोनिया गांधी ने अफसोस जतलाते हुए कहा है कि, ''मुझे दुख है कि सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक संबंध पर दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया। दिल्ली हाईकोर्ट ने हमारे संविधान में निहित बुनियादी मानव अधिकारों का उल्लंघन करने वाले एक दकियानूसी, दमनकारी और अन्यायपूर्ण कानून को हटा दिया था।  हमारे संविधान की उदारवादी विरासत है जो पूर्वाग्रह और किसी तरह के भेदभाव से निपटने का संदेश देता है। हमें अपनी संस्कृति पर गर्व है जिसका नज़रिया हमेशा से समावेशी और सबको साथ लेकर चलने वाला रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने हमें एक अलग रास्ता सुझाया है। मुझे उम्मीद है कि संसद इस मुद्दे का समाधान करेगी और सभी नागरिकों को मिलने वाले जीवन व स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार को बनाए रखेगी, जिसमें इस फैसले से सीधे तौर पर प्रभावित होने वाले लोग भी शामिल हैं।

कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने भी इस मुद्दे पर गुरूवार को कहा है कि सरकार को इस मामले पर त्वरित कार्र्वाई करनी होगी। हमारे सामने अभी सभी रास्ते खुले हैं और हम उन सभी विकल्पोँ पर विचार करके कोई कदम उठायेंगे। सिब्बल ने कहा कि दो वयस्क लोगोँ के बीच आपसी रज़ामंदी  से समलैंगिक सबंध बनाने को अपराध के दायरे से बाहर लाना ही होगा।  दूसरी ओर वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने भी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ बोलते हुए कहा कि इस फैसले से हम दोबारा 1860 में पहुंच गये हैं। उन्होने कहा कि फैसला देने वाली पीठ को मामले को एक पांच सदस्यीय पीठ को सौपना चाहिये था और ये भी कहा कि हमें कानून की व्याख्या करते समय थोड़ा उदार होना चाहिये। ये क़ानून 1860 में बना था और धारा 377 को जब लागू किया गया था तब समाज में मनोविज्ञान, मानव विज्ञान और जैनेटिक्स आदी का ज्ञान काफी कम  था। लेकिन आज 2013 में मानवीय मनोविज्ञान, मानवीय मनोचिकित्सा और जेनेटिक्स के बारे में हमारी जानकारी ज़्यादा है और आज सामाजिक और नैतिक मूल्य बदल गये हैं,ये फैसला पूरी तौर पर दक़ियानूसी है। गौरतलब है कि, बुधवार को उच्चतम न्यायालय ने दो वयस्कोँ के बीच आपसी सहमती से बने यौन संबंधोँ को अपराध की श्रेणी में रखा था। लेस्बियन,गे, बाइसेक्श्युअल और ट्रांसजेंडर (एल जी बी टी) समुदाय को इस फैसले से करारा झटका देते हुए उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस बहुचर्चित फैसले को खारिज कर दिया था जिसके तहत समलैंगिक यौन संबंध बनाने को अपराध नहीं माना गया था। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर क़ानून में संशोधन करने की ज़िम्मेदारी पूरी तरह से संसद पर डाल दी है।

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